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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, September 4, 2013

सासु - ब्वारी पुराण

कवि -हरीश जुयाल 


एक बार हंसोड़ीख्यात मे एक दुखी किसान ने हास्य मुनि श्री हरीश जुयाल से पूछा - बल प्रभु सासूब्वारी पुराण की कथा सुनाइये प्लीज 
तब हास्य मुनि हरीश जुयाल ने निम्न कविताएँ सुनाई -


             ब्वारी जी 
सासुउवाच - 

ब्वारी हमरी बी ए. पास इंग्लिश बच्याती है ,
फ्रैंक इथगा बल पति देव  को  कच्याती है I
सासू जी को मम्मी कैती ससुर जी को डैडी जी,
जिठा जी को हेलो हेलो कर भट्याती है
 I
छ्वटि  म्वटि  मौ कि नहीं बड़ी मौ कि बेटी है ,
घास खुणै  जाती  है तो आईना बी ल्हिजाती है।  
छ्वीं लगाती न्युआर्क -लंडन  कि चुप नी होती है ,
काम काज करने में ल्व चुड़  पोड जाती है I
जन्दरी क्या रिटायेगी बाय गौड ये तो अब,
द्यूरै र -ननद अर म्यारू  चुफ्फा पकड़ के रिटाती है।  
ब्वारी जी से मत बच्याणा हमर  घर आने  फर,
घर्या भाषा  से तो उन्हें हेंसन आ जाती है
पेथण  है रिंगाल है की,  मत  छेडना हे .....
तड़कायेगी तो   साथ साख्युं तक डाऊ -पेन होता है 

           सासू  जी

ब्वारीउवाच -

सासू जी हमारी भयाराडी शेषनाग है,
तुम खुणे  त गौ है हम-खुणे  त मनखी बाघ है
गुरा खाए इसकी गिच्ची, भूली , कल से ईंका तो
बारामास रात दिन का ककड़ाट  है
बिगर बात गाल्ली देती मेरे भुला-बाप को,
यींकी  भी तो बेटी होगी , यीकू क्या दिमाग है
जै दिन से ब्यौ में मेरा डांस क्या देखा है
वै दिन से इसकी प्वटगि  प्वंड़ी  भारी आग है
द्युरे दगड बच्यां जाऊँ तो येंको रंग्डू  होता है ,
अपने आप लोगुं दगड करती मजाक भारी है
गौन्छी कुटरी , लुच्या कुमर , , लीसू सासु जी ,
गींठी  दाणी जैसी , कडा करेला कु साग है
इसको मैं बथाऊंगी जी, उनके  छुट्टी आने  फर ,
या बी चिता जायेगी कि ब्वारी डिप्टी साब है

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