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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, September 19, 2013

दिनेश कुकरेती की कुछ चमाटा मारतीं कविताएँ

मिल गया भ्रष्टाचार!
कवि :दिनेश कुकरेती

हमारे लाख मना करने पर भी
हमारे घर के चक्कर काटता हुआ
मिल गया भ्रष्टाचार
हमने डांटा : नहीं मानोगे यार
तो बोला : चलिए
आपने हमें यार तो कहा
अब आगे का काम
हम सम्भाल लेंगे
आप हमको पाल लीजिए
आपके बाल-बच्चों को
हम पाल लेंगे
हमने कहा : भ्रष्टाचार जी!
किसी नेता या अफ़सर के
बच्चे को पालना
और बात है
इन्सान के बच्चे को पालना
आसान नहीं है
वो बोला : जो वक्त के साथ नहीं चलता
इंसान नहीं है
मैं आज का वक्त हूँ
कलयुग की धमनियों में
बहता हुआ रक्त हूँ
कहने को काला हूँ
मगर मेरे कई रंग हैं
दहेज़, बेरोज़गारी
हड़ताल और दंगे
मेरे ही बीस सूत्री कार्यक्रम के अंग हैं
मेरे ही इशारे पर
रात में हुस्न नाचता है
और दिन में
पंडित रामायण बांचता है
मैं जिसके साथ हूँ
वह हर कानून तोड़ सकता है
अदलत की कुर्सी का चेहरा
चाहे जिस ओर मोड़ सकता है
उसके आंगन में
अंगड़ाई लेती है
गुलाबी रात
और दरवाज़े पर दस्तक देती है
सुनहरी भोर
उसके हाथ में चांदी का जूता है
जिसके सर पर पड़ता है
वही चिल्लाता है
वंस मोर
वंस मोर
वंस मोर
इसलिए कहता हूँ
कि मेरे साथ हो लो
और बहती गंगा में हाथ धो लो
हमने कहा : गटर को गंगा कहते हो?
ये तो वक्त की बात है
जो भारत वर्ष में रह रहे हो
वो बोला : भारत और भ्रष्टाचार की राशि एक है
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
हमारी ही देख-रेख है
राजनीति हमारी प्रेमिका
और पार्टी औलाद है
आज़ादी हमारी आया
और नेता हमारा दामाद है
हमने कहा : ठीक कहते हो भ्रष्टाचार जी!
दामाद चुनाव में खड़ा हो जाता है
और जीतने के बाद
उसकी अँगुली छोटी
और नाख़ून बड़ा हो जाता है
मगर याद रखना
दामादों का भविष्य काला है
बस, तूफ़ान आने ही वाला है
वो बोला : तूफ़ान आए चाहे आंधी
अपना तो एक ही नारा है
भरो तिज़ोरी चांदी की
जै बोलो महात्मा गांधी की
हमने कहा : अपने नापाक मुँह से
गांधी का नाम तो मत लो
वो बोला : इस ज़माने में
गांधी का नाम
मेरे सिवाय कौन लेता है
गांधी के सिद्धांतों पर चलने वालों को
जीने कौन देता है
मत भूलो
कि भ्रष्टाचार
इस ज़माने की लाचारी है
हमें मालूम है
कि आप कवि हैं
और आपने
कविता की कौन-सी लाइन
कहाँ से मारी है।



देश के लिये नेता

कवि :दिनेश कुकरेती
देश के लिये नेता
नेता के लिये अक़्ल
अक़्ल के लिये घी
घी के लिये मक्खन
मक्खन के लिये दूध
दूध के लिये गाय
गाय के लिये नोट
नोट के लिये वोट
वोट के लिये वोटर
वोटर के लिये मोटर
मोटर के लिये दौरा
दौरे के लिये भत्ता
भत्ते के लिये भाषण
भाषण के लिये जनता
जनता के लिये वादे
वादे के लिये माँग
माँग के लिये सिन्दूर
सिन्दूर के लिये नारी
नारी के लिये परिवार
परिवार के लिये बंगला
बंगले के लिये नगर
नगर के लिये प्रांत
प्रांत के लिये देश
देश के लिये नेता

बाज़ार का ये हाल है
कवि :दिनेश कुकरेती
 बाज़ार का ये हाल है
कि ग्राहक पीला
और दुकानदार लाल है
दूध वाला कहता है-
"दूध में पानी क्यों है
गाय से पूछो।"

गाय कहेगी-"पानी पी रहीं हूँ
तो पानी दूंगी
दूध वाला मेरे प्राण ले रहा है
मैं तुम्हारे लूंगी।"

कोयले वाला कहता है-
"कोयले की दलाली में
हाथ काले कर रहे हैं
बर्तन ख़ाली ही सही
हमारी बदौलत चूल्हे तो जल रहें हैं।"

कपड़े वाला कहता है-
"जिस भाव में आया है
उस भाव में कैसे दें
आपको हंड्रेड परसेंट आदमी बनाने का
आपसे फ़िफ्टी परसेंट भी नहीं लें।"

धोबी कहता है-
"राम ने धोबी के कहने से सीता हो छोड़ दिया
आप कमीज़ नहीं छोड़ सकते
सौ रुपल्ली की कमीज़ भट्टी खा गई
तो आप तिलमिला रहें हैं
इस देश में लोग ईमान को भट्टी में झोंककर
सारे देश को खा रहें हैं।"

मक्खन वाला कहता है-
"बाबूजी ये मक्खन है
खाने के नहीं, लगाने के काम में आता है
जो लगाना जानता है
ऊपर वाला उसी को मानता है।"

डॉक्टर कहता है-
"सोलह रुपये फीस सुनते ही
चेहरा उतर गया
जिस देश में पानी पैसे से मिलता है
वहाँ लोगों को
दवा जैसी चीज़ फोकट में चाहिए
आप जैसों के लिए सरकारी अस्पताल ही बेहतर है
जाइए, वहीं धक्के खाइए।"

अनाज वाला कहता है-
"आप खरीदते हैं, हम बेचते हैं
एक दूसरे को रोज़ देखते हैं
बड़े बाप का बेटा
जो देखाई नहीं देता
मगर संसार को तार रहा है
हम तो केवल डंडी मारते हैं।"

घी वाला कहता है-
"घी खाने का शौक़ है
तो डालडा ले जाइए
हमारे देश के औद्योगिक विकास का नमूना है
खाएंगे
तो हाथी की तरह फूल जाएंगे
घी तो घी, रोटी खाना भूल जाएंगे।"

कैलेंडर वाला कहता है-
"लोग समाजवाद को सड़कों पर ढूंढ रहें हैं
और समाजवाद हमारी दूकान में बंद है
एक बंडल खोलिए, दर्शन हो जाएँगे
भक्त और भगवान, भीखारी और धनवान
यहाँ तक कि नेता और इंसान
सबको एक ही बंडल में पाएंगे।
हमारे यहाँ का कैलेंडर
योगालय से भोगालय तक में मिल जाएगा
किसी अभिनेत्री का प्राइव्हेट पोज़ देख लेंगे
तो कलेजा हिल जाएगा।"

बिजली वाला कहता है-
"क्या कहा बिजली गोल है
भाई साहब, हमारे डिपार्ट्मेंट का आधार ही पोल है।"

ट्रक वाला कहता है-
"हमारा भी कोई कैरियर है
हर बीस मील के बाद एक बेरियर है
कार साइड माँगती है, और सरकार..
जाने दो बाबू, अपुन छोटे आदमी हैं
कोई सुन लेगा
तो चालान कर देगा।"

भिखारी कहता है-
"दाता! पाँच पैसे में तो ज़हर भी नहीं आता
जो आपका नाम ले खा लें
और ऐसे समाजवाद से छुट्टी पा लें।"

चोर कहता है-
"मुनाफ़ाख़ोर मुनाफ़ा खा रहें हैं
तो हम भी तिज़ोरियाँ तोड़-तोड़ कर
अधिकार और कर्तव्य को एक साथ निभा रहें हैं
किसी भी तिज़ोरी में झाँक कर देखिए
आत्मा हिल जाएगी
किसी न किसी कोने में पड़ी
लोकतंत्र की लाश मिल जाएगी।
अदालत को हमारा काला चेहरा दिखाई देता है
वकील का काला कोट नहीं दिखता
बाबूजी ये हिन्दुस्तान है, और यहाँ
फैसला गवाह लिखता है, जज नहीं लिखता।"

पाकिटमार कहता है-
"लोग दस-दस साल का इंकमटैक्स मारकर भी वफ़ादार हैं
हमने दस-पाँच रुपए मार दिए
तो पाकिटमार है
उन्हें फ़ौज़ की सलामी
हमें थानेदार का जूता
उनको बंगला, हमको जेल
बाबूजी, इसी को कहते हैं
छछूंदर के सर में चमेली का तेल।"

चश्मेवाला कहता है-
"ये लाल रंग का चश्मा ले जाइए
हिन्दुस्तान भी आपको रूस दिखाई देगा
और ये रहा, सात रंगों वाला चश्मा, मेड-इन अमेरिका है
इमरजैंसी हटने के बाद बुरी तरह बिका है
और ये रही स्पेशल क्वालिटी
लोकतंत्र का अजीब करिश्मा है
काँच का नहीं पत्थर का चश्मा है
एक बाद ख़रीद लो तो पाँच साल तक काम में आता है
हमारे देश का हर नेता इसी को लगाता है।"

विद्यार्थी कहता है-
"आप हमसे छह सवाल
तीन घंटे में करने को कहते हैं
गुरु जी! ये वो देश है
जहाँ एक हस्ताक्षर करने में चौबीस घंटे लगते हैं।"