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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Monday, April 2, 2018

ब्रिटिश काल में तीर्थ यात्रियों की सुविधाओं में सुधार और वर्तमान में श्रीनगर कोटद्वार मार्ग को राष्ट्रीय स्तर का पयटन मार्ग बनाने की आवश्यकता

Improvement in Tourist Facilities in British Uttarakhand 
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म-4 ) 
  -
उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -59
-
  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  59                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--165      उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 16 5

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
-- 

 
गढ़वाली  राजाओं व गोरखा शासन में मंदिरों को कर मुक्त मुवाफ़ी गाँव दिए गए थे।  गूंठ भूमि राजस्व से मंदिरों में पूजा व कर्मचारियों का वेतन प्रबंध होता था। इसके अतिरिक्त सदाव्रत गाँव भी थे जिनकी आय से श्रीनगर , जोशीमठ में यात्रियों हेतु मुफ्त भोजन व्यवस्था भी होती थी। 1816 में गढ़वाल के सहायक कमिश्नर ने सलाह दी थी कि गूंठ  या मंदिर गाँवों की आय का कुछ भाग यात्रियों की सुविधाओं हेतु प्रयोग होना चाहिए। 
  केदारनाथ के रावल द्वारा अमानत में खयानत से अधिकारियों ने रावलों या पुजारियों से सदाव्रत गाँवों से आय व उपयोग का अधिकार छीनकर स्वंतंत्र कमेटी 'लोकल एजेंसी 'बना दी।  सदाव्रत गाँवों की आय से हरिद्वार -बद्रीनाथ यात्रा मार्ग चौड़ा किया गया।  सदाव्रत गाँवों के राजस्व से यात्रिओं को मुफ्त भोजन व्यवस्था , यात्री चिकित्सा,  मरोम्मत कार्य में तेजी लायी गयी। मार्ग मरमत कार्य अब नियमित व सुचारु रूप से होने लगा था. 
  ट्रेल के उत्तराधिकारियों द्वारा सदाव्रत पट्टियों  की आय से निम्न मार्ग निर्मित हुए या उनका पुनर्निर्माण हुआ 
जोशीमठ -नीती 
अल्मोड़ा से लाभा -गढ़वाल 
श्रीनगर से नजीबाबाद मार्ग 
   1927 -28 में ट्रेल ने गाँव वालों से बेगार लेकर (मुफ्त मजदूरी ) हरिद्वार -बद्रीनाथ मार्ग निर्माण कार्य करवाया।  वह स्वयं भी मार्ग निर्माण निरीक्षण करता था।  1855 तक निम्न यात्रा मार्ग भी निर्मित हो चुके थे -
रुद्रप्रयाग से -केदारनाथ 
उखीमठ से चमोली 
कर्णप्रयाग से चांदपुर
 बेकेटभूव्यवस्था में गूंठ व सदाव्रत भूमि की विधिवत व्यवस्था की गयी थी।  डा डबराल ने लिखा है कि मंदिरों के साथ अन्याय भी हुआ।  कुछ मंदिरों की भूमि भी छीन ली गयी थी। 
     सदाव्रत गाँवों से बेकेट भूव्यवस्था में  वार्षिक राजस्व 100013 रुपयाथा।  सदाव्रत व गूंठ गाँव की संख्या 535 थी व 1863 में इन गाँवों का क्षेत्रफल 8074 बीसी नाली थ

   स्ट्रेचों की रिपोर्ट सलाह मानते हुए ब्रिटिश शासन ने सदाव्रती पट्टियों के सदाव्रत भूमि राजस्व  का उपयोग तीर्थयात्री मार्ग निर्माण , पुनर्णिर्माण  , तीर्थ यात्रियों हेतु औषधालय निर्माण , औषधि वितरण , पर होने लगा।  इन तीर्थ यात्री सुविधाओं से भारत के अन्य भागों में अपने आप उत्तराखंड छवि वृद्धि हुयी और तीर्थ यात्रियों की संख्या में वृद्धि होने लगी। 
         गाँवों में श्रमदान से मार्ग निर्माण में तेजी 
       तीर्थ यात्रा मार्गों में सुधार से प्रेरित हो गढ़वाल के अन्य क्षेत्रों में श्रमदान से ग्रामवासी मार्ग निर्माण करने लगे। ग्रामवासी अपने गाँव को लघु मार्गों द्वारा मुख्य यात्रा मार्ग से स्वयं जोड़ने लगे। 


    पौड़ी गढ़वाल पर्यटन में पिछड़ा जनपद है 
  पौड़ी गढ़वाल में स्वर्गाश्रम , लक्ष्मण झूला व श्रीनगर को छोड़ दें तो पौड़ी में धार्मिक पर्यटन नगण्य हैं।  यदि उत्तराखंड पर्यटन वृशि करनी है तो पिथौरागढ़ व पौड़ी जनपदों को को राष्ट्रीय स्तर का पर्यटन जनपद विकसित करने ही होंगे।  इसके लिए श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग को प्रसिद्धि आवश्यक है। 
      श्रीनगर -कोटद्वार रुट हेतु प्रवासियों का योगदान ही विकल्प है 
 यदि श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग को राट्रीय स्तर का पर्यटन मार्ग बनाना है तो श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग के गाँवों को विशिष्ठ पर्यटक क्षेत्र निर्मित करना होगा जिसमे प्रवासियों की भूमिका के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।  प्रवासी निम्न स्तर पर अपना योगदान दे सकते हैं 
१- वैचारिक स्तर पर अपने गाँव में विशिष्ठ पर्यटन आकर्षी प्रोडक्ट निर्माण 
२- ग्रामवासियों को तैयार करना - आजकल एक बीमारी फैली है कि हर भारतीय शासन से सब कुछ चाहता है किन्तु अपने योगदान के बारे मबौग सार देता है। प्रवासी यह जड़ता तोड़ सकते हैं 
3 -पर्यटन प्रोडक्ट निर्माण में निवेश कर प्रवासी अपनी भूमिका निर्धारित कर सके हैं। प्रवासी श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग पर रिजॉर्ट , म्यूजियम , बाल क्रीड़ा केंद्र , हनी मून हाऊसेज , हॉस्पिटल आदि खोल सकते हैं। 

Copyright @ Bhishma Kukreti  3/4 //2018 
ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
-

  
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; 

कुणिंद मुद्राओं में चित्रांकन और हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास

Kuninda Coinage aDesign  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -
  
193
                     

                                                हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 193                 

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  


         कुणिंद मुद्राएं ताम्र , रजत व कांस्य तीनों धातुओं में मिलते हैं। 
  कुणिंद मुद्राओं पर निम्न चित्रांकन विशेष हैं -
१- अग्रभाग में बौद्ध बेष्टनि युक्त विशाल बोधिबृक्ष , त्रिरत्न , पृष्ठ भाग में सूर्य 
२- अग्रभाग में मृग के सम्मुख नारी (शकुंतला ?) , चैत्य व पृष्ठ भाग में चैत्य , त्रिरत्न , धर्मचक्र , बौद्धवेष्ठिनी , बोधिबृक्ष , स्वास्तिक 
३- अग्रभाग में दाहिने हाथ में त्रिशूल व परुष लिए शिव ,शिव के बाएं  पहलू में बीघर चरम लटक रहा है। पृष्ठभाग में नाग , वृक्ष ,नक्षत्र , चैत्य 
४- बलभुति की मुद्रा में अग्रभाग में सिर तक दाहिना हाथ उठाये पुरुष की आकृति , पृष्ठभाग अस्पस्ट 
५- अल्मोड़ा से प्राप्त मुद्राओं में अग्रभाग में वेष्ठनीयुक्त वृक्ष के निकट जाता हुआ नंदी , , नाग , देव , या मानवाकृति।  पृष्ठ भाग में नणदीपाद व इन्द्रीयस्टी।  शिव दत्त की मुद्रा में वृक्ष व मृग अंकित पाए गए हैं 
६- भानवर्मा की मुद्रा - अग्रभाग में नाग , पृष्ठ भाग अस्पस्ट।  गढ़वाली की मुद्राओं में भानु की मुद्राओं में षडानन कार्तिकेय तथा त्रिशूलधारी शिव 
७- रावण मुद्रा - रावण की मुद्रा में अग्रभाग में त्रिशूलधारी शिव व पिष्टभाग में मेरु पर नणदीपाद 
कुणिंद गण की आरम्भिक मुद्राओं में ही कुणिंद नाम चिन्ह मिलते हैं 
८- कुणिंद की शेष मुद्राओं में नाम मिलते हैं 
  यौयेध मुद्राओं में नरेश का नाम नहीं मिलते हैं पर मूलभूमि का नाम मिलता है। 

भानु व रावण की मुद्राएं देहरादून में अधिक मिलीं हैं।  इन मुद्राओं में यौयेध चिन्ह बीर अंकित हैं। 
  ऐसा प्रतीत होता है कि कुणिंद व यौयेध  ाजाओं के मध्य मुद्राओं की अदला बदली होती थी या दोनों राज्यों में एक दूसरे की मुद्राएं चलतीं थीं। 



Copyright@
 Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018 
   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



      Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;    Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार  इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार  इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार  इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  इतिहास ;लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार  इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास; देवबंद सहारनपुर इतिहास , बेहत सहारनपुर इतिहास , नकुर सहरानपुर इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas

ब्रिटिश काल में कृषि भूमि विस्तार से आंतरिक समृद्धि

 Uttrakhand Turism in British Era 
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म -2) 
  -
उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -58
-
  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  58                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--164)       उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 16 4

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
-- 
   किसी भी क्षेत्र में आंतरिक समृद्धि पर्यटन हेतु आवश्यक है।  अफ़्रीकी देशों में आंतरिक समृद्धि न होने से वहां बहुत सी विभीषिकाएँ उतपन्न हो गयी हैं।  ब्रिटिश अधिकारियों ने सर्वपर्थम गढ़वाल-कुमाओं  में आंतरिक समृद्धि  ओर ध्यान दिया।  
  इतिहासकार विशेषकर किसी राजनैतिक मत से बंधे इतिहासकारों को ब्रिटिश काल का विश्लेषण एक कोण से देखना चाहिए कि  ब्रिटिश भारत में सेवा करने नहीं अपितु व्यापार करने आये थे।  इतिहासकारों को देखना चाहिए कि क्या ब्रिटिश व्यापार वृद्धि में सफल हुए कि नहीं।  
     कुमाऊं गढ़वाल पर भी ब्रिटिश ने व्यापारिक हित हेतु अधिकार किया था।  व्यापार उनका मुख्य उद्देश्य था।  ब्रिटिश शासन काल में ब्रिटिश प्रशाषकों ने बहुत से पग अपने व्यापार लाभ हेतु उठाये किन्तु वे पग जनहिकारी साबित हुए -
कृषि भूमि विस्तार -कुमाऊं -गढ़वाल पर अधिकार प्रारम्भिक काल में कि ब्रिटिश अधिकारियों ने पाया चूँकि जनता कृषि भूमि होते हुए भी खेती नहीं करते तो अनाज पैदा नहीं होता जिससे कर की आमद नगण्य ही थी।  ब्रिटिश अधिकारियों ने विभिन्न भूव्यवस्थाओं के बल पर जनता को जंगल काटकर कृषि क्षेत्र वृद्धि हेतु प्रोत्साहन दिया। गोरखा काल व दैवी प्रकोप के कारण जनसंख्या कम हो गयी थी।  ब्रिटिश अधिकारियों ने कृषि भूमि में बढ़ोतरी करवाई और कृषकों की आमदनी वृद्धि हेतु कई कदम उठाये -
 गढ़वाल में कृषि भूमि विस्तार निम्न प्रकार हुआ
(One acre = twenty nali or बीसी beesee)
Pargana--------------Nos. villages ----land in acres (1866)--------- land in 1896 acres/beesee
Barasyun---------------799---------------------25386--------------------50806
Chandkot----------------323---------------------10598--------------------21658
Mallasalan---------------566----------------------14088------------------29234
Tallasalan-----------------642---------------------14204------------------36864
Gangasalan----------------572--------------------20793-------------------54478
Devalgarh------------------478--------------------9386--------------------20734
Chandpur------------------538-----------------------12562------------------25834
Nagpur----------------------285-----------------------6066-------------------11899(only measured ones)
Badhan----------------------264-----------------------3761---------------------8179(only measured ones)
(डबराल उखण्ड का इतिहास -6 )
 कृषि भूमि वृद्धि व चिकित्सा सुविधाओं से जनसंख्या वृद्धि इस प्रकार हई
          The population increase was as under (Census Handbook of Garhwal, 1951) –
Pargana------1865----------1812--------1881---------1891----1896--------1921
Badhan-------16618---------21454------25692-------30732----30732-----37354
Barasyun------37463---------40707----54089----------63229----56465----65479
Chandpur------23460--------31381------34214-------40706------42046-----47394
Dashauli--------7117-----------12523----10043---------13775-----12135----15682
Nagpur----------29133---------31058----41537--------50907----48943----64904
Painkhanda-----5592---------6383-------8276---------5804-------9017-----8103
Chaundkot----17646------------22060----23403------26573-------26573----29205
Gangasalan-----32955----------40877----42318------47510-------49423------50464
Mallasalan--------32533--------38618---41126--------47594-------49423-----57725
Tallasaln----------275896---------36165---40238------51093-------35606-----44800
Bhabhar -----------------------------------------------------------------------300-----446
Others ----------------------------------------------------------------------------------20443
Total-------------248741-----------310282-----345629---407818-------398650—485186
 Gender wise Population statics is as under
Gender-------------1858-----------1872-----------1881---------1901-----------1911-------1921
Males --------------66170---------155745---------170755----211351---------235554---232863
Females -----------113299-----154530----------174874-------218079--------244087---252323
Children----------53851



Copyright @ Bhishma Kukreti  2/4 //2018 
ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
-

  
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; 

हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर में कुषाण व कुणिंद राज्य अवसान

(कुषाण युग में हरिद्वार , बिजनौर, सहारनपुर, Haridwar ,Bijnor , Saharanpur in  Kushan  Era
   )

    History of Kunind Era in Haridwar , Saharanpur  and  Bijnor 
          Ending of , Kushan &  Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  192                     
                                                हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 192                 

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  
               कुषाण  अवसान 
        मुद्राओं से सिद्ध होता है कि कुषाण  अवसान पश्चात पर्वतीय उत्तराखंड , हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर के कुणिंद राजा स्वतंत्र हो गए।  गोविषाण मुद्रा से सिद्ध होता है कि कुषाण नरेश वासुदेव की मृत्यु के बाद किसी कुषाण क्षत्रप एधुराया अधुजा  का दक्षिण उत्तराखंड के मैदानी भाग पर सत्ता थी।
      
   अनुमान लगाया जाता है कि 250  ईश्वी तक (जायसवाल , गुप्त एज ) कि सतलज पपूर्व , उत्तराखंड की दक्षिण सीमा भाग व मध्य देस में कुषाण साम्राज्य समाप्त हो चुका थ।  कुषाण साम्राज्य अवसान पर इतिहासकारों मध्य एकमत नहीं है।
यौधेय मुद्राओं की विशेषताएं 
यौयेध गण मुद्राओं के लेख निम्न प्रकार हैं  (डबराल - व कके दी बाजपाई ,इंडियन न्यूमिस्मैटिक स्टडीज पृ  26, कनिंघम क्वाइनेज ऑफ ऐन्शिएंट इण्डिया पृ 77 )
१- यौधेयना , यौधेयनि या यधे यनि 
२- यौधेय गणस्य जय (जय:) , वि , त्रि 
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण यौधेय 
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण देवस्य 
 ४- ब्रह्मण देवस्य भागवत 
५- स्वामी भागवत 
६- भागवत: यधेयन:
७- कुमारस  (कुमारस्य )
८- महाराजस 
९- बहुधानेक 
१०-भागवत स्वामीनो ब्राह्मण्य देवस्य कुमारस्य यौधेय गणस्य जयः 
११- यौधेयाना बहुधानेक 
 इतिहासकार जैसे अल्लन मानते हैं कि कुमार कोई नाम न होकर कार्तिकेय का नाम है और बहुधानेक यौधेय गणों का मूल स्थान है। 
 पूर्वोक्त  यौयेध  मुद्राओं में निम्न चिकतराकंन मिलते हैं -
१- वेष्ठनीयुक्त बोधिबृक्ष की ओर जाता हुआ नंदी 
२- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा वीर व मध्य में मयूर 
३- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ  आगे की ओर बढ़ाता खड़ा वीर 
४- दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा षडानन कार्तिकेय व कंधे के ऊपर रिक्त स्थान में एक छोटा पक्षी (संभवतः मयूर )
५- दाहिने हाथ में शूल युक्त षडानन कार्तिकेय 
६- हस्ती व नणदीपाद 
७- अग्रभाग में हाथ में शूल लिए षडानन कार्तिकेय ,   बाम भाग मयूर , पृष्ठ भाग में कुणिंद सम्राटों की मुद्राओं में अंकित मिहिर सामान देवमूर्ति 
 ८- ८-उपरोक्त गणराज्य की मुद्राएं हैं 
योयेध  वीर नाम से प्रसिद्ध था 
वीर मुद्रा में किसी शासक का नाम नहीं है 


                   यौधेयगण उत्थान 
     एक मतानुसार  (वकाटका , 2006 गुप्त एज ) कुषाण साम्राज्य पर सर्व प्रथम यौधेयगण ने आक्रमण किया। किन्तु बहुत से इतिहासकार इस मत को नहीं मानते हैं। वास्तव में कुषाण अवसान के कई कारण थे।
                 कुणिंद व यौधेय सहयोग 
        इन दिनों जो भी मुद्राएं मिलीं है वे इस युग पर रोचक प्रकाश डालती हैं। मुद्राएं यौधेय -कुणिंद की सहयोग कथा कहतीं हैं।  महाभारत में भी कुणिंद व यौधेयों के आपस में सहयोगी संबंध उल्लेख हैं। 
          मुद्राएं 
 कुणिंद -यौधेय सहयोग मुद्राएं 250 ईश्वी याने कुषाण अवसान से लेकर 457 ई गुप्त काल अभ्युदय की हैं वकाटका )।  ये मुद्राएं सुनेत लुधियाना , बेहट सहारनपुर ,स्रुघ्न , बिजनौर देहरादून , भाभर के निकट भैड़ गाँव गढ़वाल , अल्मोड़ा में मिली हैं (डबराल पृष्ठ 252 ) । लगता है यौधेय -कुणिंद संघ था और उनका राज्य पूर्वी हिमाचल से लेकर स्रुघ्न , सहरानपुर , हरिद्वार , भाभर की संकरी पट्टी से होते हुए काशीपुर अल्मोड़ा तक था। 
        यौधेय -कुणिंद मुद्राओं की विशेषताएं 
   यौधेय -कुणिंद सहयोग की मुद्राएं कुषाण अवसान से गुप्त काल उद्भव तक प्रसारित की गयीं। अल्लन अनुसार कुणिंद मुद्राएं दो प्रकार की मुद्राएं हैं प्रथम पहली सदी से पहले की व दूसरी सदी के बाद की मुद्राएं रजत मुद्राएं हैं अपने समय की सुंदर मुद्राओं में गिनी जाती हैं
         
यौधेय मुद्राओं की विशेषताएं 
यौयेध गण मुद्राओं के लेख निम्न प्रकार हैं  (डबराल - व कके दी बाजपाई ,इंडियन न्यूमिस्मैटिक स्टडीज पृ  26, कनिंघम क्वाइनेज ऑफ ऐन्शिएंट इण्डिया पृ 77 )
१- यौधेयना , यौधेयनि या यधे यनि 
२- यौधेय गणस्य जय (जय:) , वि , त्रि 
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण यौधेय 
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण देवस्य 
 ४- ब्रह्मण देवस्य भागवत 
५- स्वामी भागवत 
६- भागवत: यधेयन:
७- कुमारस  (कुमारस्य )
८- महाराजस 
९- बहुधानेक 
१०-भागवत स्वामीनो ब्राह्मण्य देवस्य कुमारस्य यौधेय गणस्य जयः 
११- यौधेयाना बहुधानेक 
 इतिहासकार जैसे अल्लन मानते हैं कि कुमार कोई नाम न होकर कार्तिकेय का नाम है और बहुधानेक यौधेय गणों का मूल स्थान है। 
 पूर्वोक्त  यौयेध  मुद्राओं में निम्न चिकतराकंन मिलते हैं -
१- वेष्ठनीयुक्त बोधिबृक्ष की ओर जाता हुआ नंदी 
२- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा वीर व मध्य में मयूर 
३- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ  आगे की ओर बढ़ाता खड़ा वीर 
४- दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा षडानन कार्तिकेय व कंधे के ऊपर रिक्त स्थान में एक छोटा पक्षी (संभवतः मयूर )
५- दाहिने हाथ में शूल युक्त षडानन कार्तिकेय 
६- हस्ती व नणदीपाद 
७- अग्रभाग में हाथ में शूल लिए षडानन कार्तिकेय ,   बाम भाग मयूर , पृष्ठ भाग में कुणिंद सम्राटों की मुद्राओं में अंकित मिहिर सामान देवमूर्ति 
 ८- ८-उपरोक्त गणराज्य की मुद्राएं हैं 
योयेध  वीर नाम से प्रसिद्ध था 
वीर मुद्रा में किसी शासक का नाम नहीं है
 प्राचीन मुद्राओं  (43-57 इश्वी में यौधेय गणकी आर्थिक दरिद्रता झलकती है.
158से 257इश्वी में भी यौधेय दरिद्रता झलकती है
ताम्र मुद्राएँ जिन पर कुषाण प्रभाव है उनकी भाषा प्राकृत संस्कृत से प्रभावित है।
257 से 457 तक की मुद्राओं में यौधेय गणस्य जय: अंकित है। कुनिंद मुद्राएँ 250ई के पश्चात नही मिलते हैं। 
कुणिंद   मुद्राओं में निम्न लेख मिलते हैं  (डबराल पृ -248 )
१- कदास (कादस्य )
२- कुणिंद
अगरजस (अग्रराजस्य )
२-राज्ञ बलभुतिस 
३- राज्ञ कुणिंदस अमोघभूतिस  (अमोघभूति स्य )
४- शिवदतस 
५-हरी द तस 
६- शिवपलितस 
७- मगभतस 
८- भगवतो छत्रेश्वर महात्मन 
९- भानवर्मन 
१०- रावण -रावणस्य , वणस्य
     कुणिंद मुद्राओं में चित्रांकन 
कुणिंद  मुद्राएं भारतीय  प्राचीन मुद्राओं में चित्रांकन में श्रेष्ठ मानी जाती हैं मुद्राओं में निम्न चित्रांकन मिलते हैं - 

कुणिंद मुद्राओं में   चित्रांकन  अगले भाग में 
   

( कुछ संदर्भ परमानंद गुप्ता , जियोग्राफी फ्रॉम एन्सिएंट इण्डिया पृ 32 से लिए गए हैं )
१- अग्रभाग में बौद्ध वेष्ठनी युक्त
 
        




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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



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