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Thursday, April 17, 2014

Hardwick List of Garhwal Kings: South Asian History Review of Garhwal

History of Garhwal including Haridwar (1223- 1804 AD) –part -72     
                                            
 History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -317 

                       ByBhishma Kukreti (A History Research Student)

 Historians have five lists of Garhwal Kings-
1- List of Garhwal Kings by Hardwick
2- List of Garhwal Kings by Maularam
3- List of Garhwal Kings by a Pundit of Almora
4- List of Garhwal Kings by Beckett
5- List of Garhwal Kings by Williams

                 List of Garhwal Kings by Captain Hardwick


  Captain Hardwick got a list from King Pradyumanshah. It is said that Pradyumanshah told  to Hardwick that the list is as per court records.

SN---------King------------------------No. Ruling Years
1--------Bhogdatt to 14th King ------------900 Years (?)
15--------Ajeypal---------------------------50
16th ---------Vijaypal------------------------60
17th Lakpal--------------------------------55
18- Dehram or Dharampal--------------65
 19-Keram (Karam) Pal----------------70
20-Narayandev ----------------72
21-Harshdev -------------------45
22-Govinpal--------------------------------49
23-Ramdev----------------51
24-  Ranjeetdev -----------53
25-Indrasen-------35
26- Chandrasen-------------39
27-Mangalsen---------------32
28-Chudaman------------29
29-Chintaman--------------33
30-Puranman--------------27
31-Virke /Vrishabh Bhan--79
32-Vrirbhan--------------------81
33-Suryabhan-------------------79
34-Kharag (Kerag) Singh -60
35-Surat Singh --------------------79
36-Mahasingh --------------59
37-Anup Singh --------59
38-Pratabsingh-------29
39-Harisingh- 39
40-Jagannath------45
41-Bujinath---65
42-Gokulnath-----55
43-Ramnath---75
44-Gupar (Gopal) Nath- 82
45-Lachme Nath—69
46-Premnath—71
47-Sadanand—65
48-Preamnanad-----62
49-Mahananad------63
50-Suranand—61
51-Subachand---59
52-Tarachand—44
53-Mahachand—52
54-Gulabchand—41
55-Ra/Ram/Raj Narayan------59
56-Govindnarayan—35
57-Lachamannarayan—37
58-Jagatnarayan-32
59-Mataubnarayan—25
60-Sitabnarayan---37
61-Anandnarayan---------42
62-Harinarayan----45
63-Maharayan-------33
64-Ranjitnarayan-----31
65-Ramrau-----33
66-Kritanrau-49
67-Jagrau—42
68-Harau------32
69-Fateshah----39
70-Duledshah--------50
71-Pratabshah-------35
72-Lalit Shah---------40 (Lalat Shah had four sons, expired in 1781)
73-Jaikritshah—72 (In real for 2. 5 years ruled)
74-Pradyumanshah- 73
It seems that instead of recording ruling years (period), it is written total life span of Kings


Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com17/4//2014
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -318 
                                                              
                                      References

1-Dr. Shiv Prasad Dabral, 1971, Uttarakhand ka Itihas Bhag-4, Veer Gatha Press, Dogadda, Pauri Garhwal, India 
2-Harikrishna Raturi, Garhwal ka Itihas
3-Dr. Patiram, Garhwal Ancient and Modern
4-Rahul Sankrityayan, Garhwal
5- Oakley and Gairola, Himalayan Folklore
6- Bhakt Darshan, Garhwal ki Divangit Vibhutiyan
7-Foster, Early Travels in India William Finch
8-Upadhyaya, Shri Shankaracharya
9-Shering, Western Tibet and British
10-H.G. Walton, Gazetteer of British Garhwal
11-B.P.Kamboj, Early Wall Paintings of Garhwal
12-H.g Walton, Gazetteer of Dehradun
13- Vimal Chandra, Prachin Bharat ka Itihas
14-Meera Seth, Wall Paintings of Western Himalayas 
15-Furar, Monumental Antiquities
16-Haudiwala, Studies in Indo-Muslim History
17- Rahul Khari 2007, Jats and Gujjar Origin, History and Culture
18- Upendra Singh, 2006, Delhi: Ancient History, Barghahan Books
19- B.S. Dahiya, 1980, Jats the Ancient Rulers (A Clan Study) , Sterling Publications
20- Maithani, Bharat –Gotrapravardeepika
21 Prem Hari Har Lal, 1993, The Doon Valley Down the Ages
22-Dashrath Sharma, Early Chauhan Dynasties
23- Shailndra Nath Sen, Ancient History and Civilization
24-H.M Elliot, 1867, The History of India as told by its Own Historians
25- Jaswant Lal Mehta, 1979, Advance Study in Medieval India
26- Nau Nihal Singh, 2003, The Royal Gurjars: their contribution to India, Anmol Publications 
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
History of Garhwal from 1223-1804 to be continued in next chapter          
Notes on South Asian Medieval History of Garhwal;  SouthAsian Medieval History of Pauri Garhwal;  Medieval History of Chamoli Garhwal;  South Asian Medieval History of Rudraprayag Garhwal;  South Asian Medieval History of Tehri Garhwal;  Medieval History of Uttarkashi Garhwal;  South Asian Medieval History of Dehradun, Garhwal;  Medieval History of Haridwar ;  South Asian Medieval History of Manglaur, Haridwar;  South Asian Medieval History of Rurkee Haridwar ;  South Asian Medieval History of Bahadarpur Haridwar ; South Asian History of Haridwar district to be continued
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Monday, April 14, 2014

उत्तराखंड में गेंदे की खेती करना लाभदायक है।

डा. बलबीर सिंह रावत 

गेंदे का मूल स्थान  मेक्सिको,मध्य और दक्षिण अमेरिका है , लकिन यह भारत के हर क्षेत्र में आसानी से उगाया जाता है. इसके फूलों का सब से अधिक उपयोग पूजा में मालाएं बनाने में होता है। चूंकि इसके फूल प्रायः हर मौसम में उपलब्ध रहते हैं तो इस की खेती करना कितनी लाभदायक हो सकती है यह इस बात पर निर्भर करता है की आसपास में इसकी कितनी मांग है , यानी मंदिर कितने हैं, पूजा के लिए कितने लोग वहां आते है और किन किन त्योहारों और उत्सवों में आते हैं।  चार धाम यात्रा  मार्गों  और शहरों के आस पास के किसान इसकी व्यावसायिक खेती से अच्छा लाभ कमा सकते हैं। गेंदा फूल के दो मुख्य वर्ग हैं, एक अफ्रीकन और दूसरा फ्रेंच।  अफ्रीकन फूल बड़े आकार के होते हैं और फ्रेंच कुछ छोटे।  दोनों में ही नींंबुई पीला , सुनहरा पीला और नारंगी रंग के फूल अधिक पसंद किये जाते हैं। 

गेंदे की खेती के लिए दोमट गहरी मिट्टी वाले खेत सर्वोत्तम होते है, मिट्टी में न तो अम्लीयता हो न ही क्षारिता, पी एच ६.५  और ७.५  के बीच का होना सही है।  जल निकासी भी उचित होनी चाहिए।  जलवायु सुहावनी  १५ से  और ३० डिग्री से. का तापमान और हल्की नमी वाली हवा सर्वोत्तम होती है। ३५ डिग्री तापमान पर पौधे मुरझाने लगते है।  गेंदा हर मौसम में उगाया जा सकता है , लेकिन हर मौसम के लिए अलग अलग जातियां होती है। पहिले पौध तैयार  की जाती है , फिर रोपण किया जाता है।  पौध उगाने के लिए ६ X १.२ मीटर  क्यारियाँ जमीन से कुछ ऊंंची रखनी चाहियें उसमे ३० किलो अच्छे सड़े गोबर की खाद तथा आधा किलो १५ १५ १५ उर्वरक डाल कर अच्छी तरह मिला देना चाहिए। क्यारियों को  कृमि नाशक कप्तान द्रव्य,२ ग्राम प्रति लीटर पानी के घोले से और मिट्टी को फफूंदी मुक्त बनाने के लिए २% फोर्मलीन के घोल से तर करके छोड़ देना चाहिए।  इस से चींटियाँ बीज को ले जाने नहीं आएंगी। जब मिट्टी  में बत्तर आ जाय तो ६ -८ सेंटी मीटर की कतारों में,  बुआई २ सेंटी मीटर गहरे में करनी चाहिये । बोये बीज को  गोबर की खाद या पत्तियों की खाद से ढंक देना चाहिए।  

गर्मियों की फसल के लिए पौध बोने का समय जनवरी से लेकर फ़रवरी तक का होता है, रोपण फ़रवरी से लेकर मार्च तक किया जाता है , यानी एक महीने की पौध रोपण के लिए उचित रहती, बरसात की फसल के लिए पौध की बुवाई मई जून में, और जाड़ों की फसल के लिए मध्य सितम्बर से मध्य अक्टूबर तक। की जानी चाहिए।  बरसात के मौसम के गेंदे के लिए अफ्रीकन जाइंट टॉप येलो , जाफरी और लड्डू गेंदा प्रजातिया और जाड़ो के लिए पूसा नारंगी, पूसा बसंती , अफ्रीकन जाइंट डबल येलो और टाइगर ( पीला और लाल ) प्रजातियां उचित रहती हैं।  बीज की मात्रा गर्मी और बरसात की फसलों के लिए २००-३०० ग्राम  और जाड़ों की फसल के लिए १५० से २०० ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से बोनी चाहिए। एक माह की हो जाने पर पौध का रोपण करना चाहिए। 

खेत की जुताई ठीक से होने चाहिए. प्रति एकड़ ८० -१०० क्विंटल गोबर की खाद, ११५ किलो नाइट्रोजन २४ किलो P२ O५ और २४ किलो K२O उर्वरक डाल कर अच्छी तरह मिला देने चाहियें। रोपण कतारों में, अफ्रीकन नस्ल के लिए ४५ सेंटीमीटर की दूरी पर और फ़्रेंच नस्ल के लिए ३० सेमी दूरी पर करना उचित रहता है। रोपण के तुरंत बाद सिंचाई और फिर हर ७ - ८ दिनों में। गर्मी में कुछ जल्दी और जाड़ों में कुछ देरी से।  रोपण के ३०- ३५ दिनों बाद पौधौं की पिंचिंग से  , यानी शीर्ष की कली को तोड़ देने से, अधिक कल्ले फूटते हैं तो फूल अधिक लगते हैं. पिंचिंग के तुरंत बाद और फिर महीने महीने के अंतराल में नाइट्रोजन वाले उर्ववृक सिंचाई के साथ डालना चाहिए, इस से पौधे स्वस्थ रहते हैं और अधिक फूल देते हैं। 

गेंदे के पौधों को बीमाररियों से बचाने के लिए समुचित उपाय समय पर कर लेने चाहियें। पौधों की जड़ों  तनो और कोंपलों  को काटने वाले कीड़े, पतियों का कोंपलों का रस चूसने वाले जंतुभरी नुक्सान पहुंचा सकते हैं , इनके रोक थाम के लिए कृमि नाशक घोल , जैसे कुणालफॉस ०.०५ % ,, डाइकोफोस ०.१ % या केलथें घोल २ एमएल प्रति लीटर पानी में, छिड़कने से ये कृमि नष्ट हो जाते हैं।  कीटों के अलावा फफूंदी भी पौधों के तनों, जड़ो, पत्तियों और फूलों को नुक्सान पहुंचा सकती हैं. फफूंदी उपचार के लिए कई प्रकार के फफूंदी नाशक रासायन मिलते हैं, किसी एक का उपयोग करके इस रोग से भी छुटकारा पाना सही रहता है। 

रोपण के ढाई महीने में फूल तुड़ाई के लिये तैयार होने लगते हैं. तुड़ाई से पहिले सिंचाई कर देने से तोड़ने के उपरान्त फूल अधिक समय तक ताजा रहते है। फूलों को   थोड़े लम्बे डंठल समेत तोड़ना चाहिए। पहिली तुड़ाई के बाद २ से २ १/२  महीनो तक पौधों में फूल लगते रहते हैं। स्थानीय या कुछ दूरी के बाजार के फूल बांस की टोकरियों में या जूट के बोरो में भरे जा सकते हैं , लम्बी दूरी के लिए पैकिंग और अधिक अच्छी और इतनी मजबूत होनी चाहिए की लदान और ढुलाई के दबाव से फूल बचे रहें। 

गेंदे के उपज काफी अच्छी होती है। अफ्रीकन नस्ल की उपज औसतन ४,५०० किलो प्रति एकड़, और फ़्रन्च नस्ले की ३५०० किलो  के लगभग होती है। बाजार की  दैनिक और सामायिक मांग के अनुरूप खेतों का साइज तय करना चाहिए ताकि साल भर , घटती बढ़ती मांग की आपूर्ति ठीक से होती रहे।  इसके लिए बुवाई, तुड़ाई का सालाना चक्र बना लेना चाहिए।   गेंदे की खेती का लाभ , इसके फूलों की कीमत पर निर्भर करता है, अगर उत्पादक सीधे फटका विक्रेता को ही  अपनी उपज बेच सकता है तो लाभ अधिक होगा ,जीते अधिक बिचौलिये होंगे उतना ही लाभ की मात्र घटती जाएगी।  

पूजा, माला , सजावट के अलावा गेंदे के फूलों से आयर्वेद और होमेओपेथी की दवाएं भी बनती है, इसकी पंखुड़ियों से मुर्गीयो के दाने में मिलाने का चूर्ण भी बनता है , जिस से अण्डों में पीलापन बढ़ता है। गेंदे के बीज बेचने का व्यवसाय भी लाभ दायक व्यवसाय हो सकता है , इसके लिए नस्लों की शुद्धता  और बीमारी रहित उपज लेने की व्यवस्था का प्रमाणीकरण करवाना अच्छा रहता है।        

ट्रैवल एजेंसी व्यापारी के मुख्य गुण

  How to Start Travel Agency in context Uttarakhand Tourism and Hospitality Development Part -1 

                          (Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series--54  
                                                      
उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्यविपणन प्रबंधन -भाग 54    
ट्रैवल एजेंसी व्यापार शुरू करने के लिए निम्न कार्य आवश्यक हैं -
               
               अपने को जांच लें ( ट्रैवल एजेंसी व्यापारी के मुख्य गुण )

              Characteristics of a Travel Businessman 

ट्रैवल एजेंसी व्यापार  अन्य व्यापार में आने से पहले अपने को जांच लें कि आप में अनुशासन है कि नहीं ?
आप अपनी भावनाओं पर काबू पा सकते हैं कि  नही ?
क्या आप में धैर्य है ?
क्या आप अपमान को पी सकते हैं ?
आप में व्यापार में कमी वेसी  सहने की शक्ति है कि  नही ?
क्या आप ट्रैवल एजेंसी के व्यापार से आनंद उठा पाएंगे कि  नहीं ?
क्या आप ट्रैवल एजेंसी व्यापार को गंभीरता पूर्वक लेंगे कि नहीं ?
क्या आप योजना बनाने व योजना में समयानुसार बदलाव लाएंगे कि नहीं ?
क्या आप रोज दुकान या कार्यालय जा पाएंगे कि नहीं ?
क्या आप ग्राहकों से वार्तालाप कर सकते हैं ? अथवा ऐसे कार्मिक रख सकेंगे कि वे ग्राहक से सही ढंग से वार्तालाप कर सकें ?
क्या आपके पास व्यापार में लगाने के लिए समुचित धन है ?
क्या आपको बैंक या अन्य स्रोत्रों से धन मिल सकता है ?
क्या आपके पास दूरदृष्टि है या आपके सलाहकार के पास दूरदृष्टि है ?
आप टूरिज्म ज्ञान प्राप्त कर पाएंगे ?
क्या आपके पास अनुभव है ?
यदि व्यापार का या टूरिज्म व्यापार का अनुभव नही है तो आपके पास कोई अनुभवी सलाहकार है ?
आप कठिन परिश्रम व स्मार्ट परिश्रम कर पाएंगे ?
क्या आपमें ऊर्जा व उत्साह है ?
क्या आप में साहस है ?
आप सकारत्मक रूप से सोचते हैं ?
क्या आप रचनाधर्मी हैं ? यदि नही तो रचनाधर्मी गुण अपना लेंगे ?
क्या आप जुमेवारी से भागते तो नहीं हैं ?
व्यापारी में उपरोक्त गुण आवश्यक हैं अतः ट्रैवल एजेंसी व्यापार में इन गुणो को अपनाना आवश्यक है। 



Copyright @ Bhishma Kukreti  13/4/2014  

Contact ID bckukreti@gmail.com
Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना ,शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
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History Review about Existence of Kanakpal as Founding Garhwal King

History of Garhwal including Haridwar (1223- 1804 AD) –part -71     
                                            
 History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -316 

                       ByBhishma Kukreti (A History Research Student)

    Raturi provides three proofs for Kanakpal as Garhwal King-
1-The so called rock inscription of Chandpur describes that Kanakpal reached to Cahndpur in 888.
2-Three sholkas those describe that Badrinath deity ordered to Bhanupratap to take Kanakpal to Badrinath with him from Haridwar.
3- Folklore that Kanakpla was younger brother of Dhara King.
       Till date, no Chandpur inscription is published.
       The Sholka states Gurjjratat for Gujrat. While in old Sanskrit literature, Gurjar and Gurrjaratra are mentioned for Gujrat and not Gurjjratat. That means that Shloka is created very later around nineteenth century from Hindi word.
   A Court Poet Bharat of Manshah a Garhwali King who wrote Manodaya Kavya did not mention Bhogdatt, Bhuvanpal or Kanakpal.
 The Garhwal Kingdom Vanshavali in Ramayan Pradip (1771) starts from Ajaypal as in Manodaya Kavya.
Hardwick list also starts from Ajaypal after anonymous Kings.
Maularam List mentions Bhuwanpal as founding King of Garhwal. Williuam describes Ajaypal as founding King.
 Therefore, it might be said that no proof is available for Kanakpal as Founding Garhwal King.


Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com13/4//2014
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -317 
                                                              
                                      References

1-Dr. Shiv Prasad Dabral, 1971, Uttarakhand ka Itihas Bhag-4, Veer Gatha Press, Dogadda, Pauri Garhwal, India 
2-Harikrishna Raturi, Garhwal ka Itihas
3-Dr. Patiram, Garhwal Ancient and Modern
4-Rahul Sankrityayan, Garhwal
5- Oakley and Gairola, Himalayan Folklore
6- Bhakt Darshan, Garhwal ki Divangit Vibhutiyan
7-Foster, Early Travels in India William Finch
8-Upadhyaya, Shri Shankaracharya
9-Shering, Western Tibet and British
10-H.G. Walton, Gazetteer of British Garhwal
11-B.P.Kamboj, Early Wall Paintings of Garhwal
12-H.g Walton, Gazetteer of Dehradun
13- Vimal Chandra, Prachin Bharat ka Itihas
14-Meera Seth, Wall Paintings of Western Himalayas 
15-Furar, Monumental Antiquities
16-Haudiwala, Studies in Indo-Muslim History
17- Rahul Khari 2007, Jats and Gujjar Origin, History and Culture
18- Upendra Singh, 2006, Delhi: Ancient History, Barghahan Books
19- B.S. Dahiya, 1980, Jats the Ancient Rulers (A Clan Study) , Sterling Publications
20- Maithani, Bharat –Gotrapravardeepika
21 Prem Hari Har Lal, 1993, The Doon Valley Down the Ages
22-Dashrath Sharma, Early Chauhan Dynasties
23- Shailndra Nath Sen, Ancient History and Civilization
24-H.M Elliot, 1867, The History of India as told by its Own Historians
25- Jaswant Lal Mehta, 1979, Advance Study in Medieval India
26- Nau Nihal Singh, 2003, The Royal Gurjars: their contribution to India, Anmol Publications 
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
History of Garhwal from 1223-1804 to be continued in next chapter          
Notes on South Asian Medieval History of Garhwal;  SouthAsian Medieval History of Pauri Garhwal;  Medieval History of Chamoli Garhwal;  South Asian Medieval History of Rudraprayag Garhwal;  South Asian Medieval History of Tehri Garhwal;  Medieval History of Uttarkashi Garhwal;  South Asian Medieval History of Dehradun, Garhwal;  Medieval History of Haridwar ;  South Asian Medieval History of Manglaur, Haridwar;  South Asian Medieval History of Rurkee Haridwar ;  South Asian Medieval History of Bahadarpur Haridwar ; South Asian History of Haridwar district to be continued
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चुनावमा गढ़वाळम ऊँट कै हौड़ (करवट) बैठल ???

हंसोड्या , चुनगेर ,चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती        

(s =आधी अ  = अ , क , का , की ,  आदि )   

 अचकाल 2014 का लोकसभा चुनाव का वास्ता ओपिनियन पोल वाळ , अखबारुं बड़ा बड़ा नामी राजनैतिक विश्लेषक , टीवी मा टिप्पणी दीण वाळ टिप्पणीकार रोज फोन करणा रौंदन ," भीषम जी !  बताना पौड़ी गढ़वाल में ऊँट किस करवट बैठेगा ?" या "कुकरेती जी गढ़वाल में कॉंग्रेस का ऊँट किस करवट बैठने वाला है ?"
पैल उन त मि मुंबई मा बैठिक बतै दींदु छौ कि कॉंग्रेस का ऊँट कना करवट ल्यालु अर भाजपा का ऊँट कै छ्वाड़ करवट ले सकुद।  पण जब बिटेन भुवन चन्द्र खंडूरी चुनाव हार तो मि समजी ग्यों कि इख मुंबई से पता लगाण कठण च कि भाजपा कु ऊँट कै हौड़ बैठल अर कॉंग्रेस कु ऊँट कना लमलेट ह्वालु।  फिर अब त एक नै ऊँट याने आप पार्टीक ऊँट बि ऐ ग्यायि तो ऊँटुं हौड़ (करवट ) लीणो ढंग-ढाळ  इ बदल गे।  इन मा मि ग्राउंड रियलिटी  जाणनो बान गढ़वाल चली ग्यों। 
पैल मि  गढ़वाळ ग्यों तो कॉंग्रेस का अर भाजपा द्वी पार्टयूं ऊँट मिल गेन।   द्वी ऊंट   शंड -मुशंड हाथी अर सांड जन वजनदार छा।    कॉंग्रेसी ऊँट पिछ्ला दस सालुं से केंद्रीय चारागाह मा दिन रात चारा खाणु छौ त वैन म्वाट हूणी छौ अर भाजपा का ऊँट पिछ्ला पांच सालुं से राज्य चारागाह मा बैठिक चरबी बढाणु छौ तो वी बि मस्त सांड जन म्वाट हुयुं छौ।
 द्वी ऊँट शंड -मुशंड हाथी जन पड़्यां क्या फकोरिक सियां छा।
कॉंग्रेसी ऊँट अजीब सि हालात मा सियुं छौ।  साफ़ छौ कि यु कॉंग्रेसी ऊँट किम कर्तव्य ? की सोच का कारण सियुं छौ। पता इ नि लगणु छौ कि कॉंग्रेसी ऊँट कै करवट मा सियुं छौ अर अब कै हौड़ फरकल। 
मीन कॉंग्रेसी ऊँट तैं बिजाळ अर पूछ ," अरे कॉंग्रेसी ऊँट ! चुनाव बगत च अर तु सियुं छे ?"
कॉंग्रेसी ऊँट को जबाब छौ ," क्या करण ? सतपाल महाराज से उम्मीद छे कि कॉंग्रेस भाजपा तैं टफ फाइट द्याला अर अल्लाह -हो -अकबर का चेला जय श्री राम का चोला पैरण मिसे जावो तो कॉंग्रेस की हार हूणी च त इन मा मीन सीण नी च त क्या करण ?"
मीन ब्वाल ," मतबल तीन सोचि याल कि कॉंग्रेस की हार पक्की च। "
कॉंग्रेसी ऊँट कु उत्तर छौ ," मीन क्या सोचि याल।  राहुल बाबान बि मानि याल कि हार तो पक्की च।  इन मा जब मीन मन मा हार मानि याल तो किलै फ़ोकट मा कुछ करे जावो। किस किसको रोएँ , आराम बड़ी चीज है , मुंह ढक के सोइये।  अर अबि तलक निर्णय बि नि ह्वे कि कॉंग्रेसी उम्मेदवार कु जि छन "
मीन कॉंग्रेसी ऊँट तैं पूछ ," त इन त बता कि तू किस करवट बैठेगा ?"
कॉंग्रेसी ऊँटन ब्वाल ," कुछ समज मा नी आणु च कि जब हार पक्की हो तो कना  करवट बदलण। "
मीन सियुं शंड -मुशंड भाजपाई ऊँट तैं बिजाळ अर प्रश्न कार ," ये भै भाजपाई ऊँट तू किलै फकोरिक , बेखबर , निश्चिन्त सियुं छे ?"
भाजपाई ऊँटौ उत्तर छौ ," जब मोदी लहर च , जब ओपिनियन पोल बुलणा छन कि हमन हंड्रेड पर्सेंट जितण इ च त मिन  सुखानंद मा नींद नि लीण त क्या करण ? जब जीत पक्की हो तो मेहनत करण बेवकूफी च। "
मीन ब्वाल ," आडवाणी जीन बोली बि च कि कखि भाजपा ओवर कॉन्फिडेंस मा पैथर नि रै जावु। "
भाजपाई ऊटन जबाब दे ," बुड्याक त दिमाग खराब हुयुं च।  फ्रस्ट्रेसन मा कुछ बि बुलणु रौंद , बखणु रौंद।  जा कै हैंक पार्टीक ऊँट मा जावो।  मि तैं डिस्टर्ब नि कारो।  मि तैं सीण द्या।"
मीन पूछ ,"  हे भाजपाई ऊँट इन त बता कि तू किस करवट बैठेने वाला है ?"
भाजपाई ऊँट को जबाब छौ ," मी त सत्ता पक्ष की दिसा मा बैठण वाळ छौ। "
इथगा मा रेडियो से समाचार आइ ," कॉंग्रेस ने टिहरी चुनाव क्षेत्र से साकेत बहुगुणा , पौड़ी क्षेत्र से हड़क सिंग रावत और हरिद्वार क्षेत्र से रेणुका रावत को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। "
द्वी ऊँट चड़म खड़ ह्वे गेन अर भागण बिसे गेन।
मीन पूछ ," अरे द्वी किलै भागणा छंवां ?"
भाजपा ऊँट कु जबाब छौ ," अब  मि तैं हार कु डौर सताणु च त मि जनता की नबज टटोळणो  जाणु छौं कि जनता कु ऊँट कै हौड़ फरकल धौं (किस करवट बैठेगा )."
कॉंग्रेसी ऊँट कु उत्तर छौ ," मि तै इन लगणु च की हम बि जीत सकदा।  मी बि वोटरूं मंशा जाणनो  जनता का बीच  जाणु छौं कि वोटरुं  ऊँट कै हौड़ फरकल धौं (किस करवट बैठेगा )."
द्वी ऊँट भाजि गेन। 
मीन द्याख कि तीन सुक्यां ऊँट कड़कड़ा ह्वेक खड़ा छा।  यूं ऊँटुं पर ना सान छे ना बाच छे।  बस यि खड़ा छा। 
मीन एक तैं पूछ बल यी कैक ऊँट छन अर इन किलै खड़ा छन ?
वैक जबाब छौ ,"यी असल मा काठक नकली ऊँट छन। "
मीन पूछ ," कैक छन यी नकली ऊँट ?"
वैक उत्तर छौ ," एक ऊँट उत्तराखंड क्रांति दल (ऐरी ग्रुप ), एक ऊंट उक्रांद (पंवार ग्रुप ) अर तिसरु ऊँट उक्रांद (दिवाकर भट्ट ग्रुप ) का नकली ऊंट छन। "
मीन पूछ ," अर आम आदमी  पार्टीक ऊँट कख च ?"
वैन ब्वाल ," आप पार्टीम ऊँट नी च।  आप पार्टीम मुसक्या चोर याने चौंर्या स्याळ च। "
 पाठको मि तैं त पता नि चौल कि गढ़वाळम चुनावी ऊँट कै हौड़ (करवट ) फरकल।  क्या आप बतै सकदा कि ऊँट किस करवट बैठेगा ? 

Copyright@  Bhishma Kukreti  13 /4/2014 

*कथा , स्थान व नाम काल्पनिक हैं।  
[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक  से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  द्वारा  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वालेद्वारा   पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले द्वारा   भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले द्वारा   धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले द्वारा  वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  द्वारा  पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक द्वारा  विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक द्वारा  पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक द्वारा  सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखकद्वारा  सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक द्वारा  राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, राजनीति में परिवार वाद -वंशवाद   पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ग्रामीण सिंचाई   विषयक  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, विज्ञान की अवहेलना संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य  ; ढोंगी धर्म निरपरेक्ष राजनेताओं पर आक्षेप , व्यंग्य , अन्धविश्वास  पर चोट करते गढ़वाली हास्य व्यंग्य, राजनेताओं द्वारा अभद्र गाली पर हास्य -व्यंग्य    श्रृंखला जारी  

Ornaments in Garhwali Folk Dramas

Review of Characteristics of Garhwali Folk Drama, Folk Theater/Rituals and Traditional Plays part -137 
                             
                     Bhishma Kukreti (लोक साहित्य शोधार्थी)

                  गढ़वाली लोक नाटकों में आभूषण
              There are four types of Ornaments put on in Garhwali folk Dramas –
1-Piercing the Limb Ornaments in Garhwali Folk Dramas
2-Tied up ornaments in Garhwali Folk Dramas
3-Worn Ornaments in Garhwali Folk Dramas
4-Put around Ornaments in Garhwali Folk Dramas
           Ornaments of Males in Garhwali Folk Dramas
  Head- Crest Jewels, Crown etc
Ear Ornaments-Ear Rings (Murkhal, Kundal), Mocaka (Ear Pendant),Erar Top etc
Neck Ornaments- Various Necklace, and Sutra or threads
Finger Ornaments- Finger Rings,Katka-Vatika
Forearm Ornaments-Hastavi and Valaya
Wrist Ornaments-Bracelet and Uccitika
Ornaments above Elbow-Armlet and Arm-Band
Breast Ornaments- Sting Necklace
Suspended necklace, garlands,
Waste Ornaments-Tarala, Sutra
Ornaments of Ankals (specialy in Ram Lila and put up at time of Rituals or due to  Mantra)




Copyright@ Bhishma Kukreti 12/4/2014

Characteristics of Garhwali Folk Drama, Community Dramas; Folk Theater/Rituals and Traditional to be continued in next chapter
                 References
1-Bharat Natyashastra
2-Steve Tillis, 1999, Rethinking Folk Drama
3-Roger Abrahams, 1972, Folk Dramas in Folklore and Folk life 
4-Tekla Domotor , Folk drama as defined in Folklore and Theatrical Research
5-Kathyrn Hansen, 1991, Grounds for Play: The Nautanki Theater of North India
6-Devi Lal Samar, Lokdharmi Pradarshankari Kalayen 
7-Dr Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas part 1-12
8-Dr Shiva Nand Nautiyal, Garhwal ke Loknritya geet
9-Jeremy Montagu, 2007, Origins and Development of Musical Instruments
10-Gayle Kassing, 2007, History of Dance: An Interactive Arts Approach
11- Bhishma Kukreti, 2013, Garhwali Lok Natkon ke Mukhya Tatva va Charitra, Shailvani, Kotdwara
12- Bhishma Kukreti, 2007, Garhwali Lok Swangun ma rasa ar Bhav , Chithipatri
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Ornaments  in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays;   in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Chamoli Garhwal, North India, South Asia;Ornaments in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Rudraprayag Garhwal, North India, South Asia;  Ornaments in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Pauri Garhwal, North India, South Asia; Ornaments in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Tehri Garhwal, North India, South Asia; Ornaments  in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Uttarkashi Garhwal, North India, South Asia;  Ornaments  in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Dehradun Garhwal, North India, South Asia; in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Haridwar Garhwal, North India, South Asia
गढवाली लोक नाटकों में आभूषण ,  टिहरी गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकोंमें आभूषण ;उत्तरकाशी गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में आभूषणहरिद्वारगढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में आभूषण  ;देहरादून गढ़वाल के गढवालीलोक नाटकों में आभूषण;पौड़ी गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों मेंआभूषण;चमोली गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में आभूषण ; रुद्रप्रयागगढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में  आभूषण;