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Thursday, May 5, 2016

Mahant Shri Yogendra Puri : A Versatile Garhwali poet

Mahant Shri Yogendra Puri : A Versatile Garhwali poet 

                               Bhishma Kukreti
 

          Mahant Yogendra puri was born in August, of 1895, in Kilkileshar, Patti Chaiuras of Tihri Garhwal. 

He is famous for his creating Garhwali poetry of telling the social facts of his time, describing nature, uses of Sanskrit words, religious and inspirational poetries .

 He published seven poetry books ---Phulkandi, 
Dharmopadesh,
Kaljugi Bhagwat,
Nal Damayanti,
Sat Sautela
and Vikash Mala in Garhwali language .

His two poems -’ Paun tu pran myaree’ and ‘ In Jjindagi ko din ek alo’ are famous most poems.

He studied Sanskrit from Vanaras Sanskrit Vishvavidyalaya and from Lahor, he was also Ayurvaidic doctor and used to do medical practices free to all.
He expired in 1957

ना जा पंछी बणाग्याँ बोण /बौण 

    
रचना --महंत योगेन्द्र पुरी  (किंकलेश्वर चौरस टिहरी गढ़वाल  1848 -1957 )
          इंटरनेट प्रस्तुतिकरण -भीष्म कुकरेती 

  
ना जा पंछी बणाग्याँ बोण /बौण 
जख छया फुल्यां बांज बुरांस गांदी कोयल और हिलांस नचदा छ जख खुशि ह्वेकि मोर खेल्दा छ जख सार -चकोर भटक्यूँ छौ जब बांसु कु बेड़ा क्वी नी डर छै जैका नेड़ा लगी रगड़ आपस मा जब बेड़ा पल मा भस्म बण्यो सब


                 
तेरा दगड्या लग गैने रोण
                 
ना जा पंछी बणाग्याँ बोण
बड़ा रसीला आम फुकेगैं  बाग़ बगीचा खारु ह्वे गैं

             
त्वेन भला अब तख क्या पौण
             
ना जा पंछी बणाग्याँ  बौण
शेर जखका छया जग्वाळा हात्यूं का मुंड चूरण वाळा

             
टूटी गेन तौंकी भी धौण
            
ना जा पंछी बणाग्याँ बौण
जौं डाळयूँ मा खेल त्यरो  छौ   जौं पंछ्युँ मा मेल त्यरो छौ तौंकि बि लै गैने बारी औण
            
ना जा पंछी बणाग्याँ बौण
बोण बण्यूं शमशान सि सारो   
कखिम क्वीला कखिम खारो 
          कखिमु स्याळ लगीने रोण 
            
ना जा पंछी बणाग्याँ बोण
शेर बाघ अर गैंडा हाथी 
सब्बि फुकेगें तेरा साथी 

             तीन भि तनि जान गवाण
           
ना जा पंछी बणाग्याँ बौण


Copyright @ 
Bhishma Kukreti, Mumbai, India, 2009

बौद्ध विद्वान वसुमित्र - हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ

Vasumitra : reference to History of Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur
  
                           बौद्ध विद्वान वसुमित्र - हरिद्वार ,  बिजनौर   , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ 
                 

        Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  176                     
                                                हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 176                 

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  


         कनिष्क को अशोक और मेनाद्र समान बौद्धधर्म पोषक माना जाता है।  कनिष्क ने बौद्ध विद्वान आचार्य पार्श्व व वसुमित्र को सम्मानित किया था। 
  बौद्ध मत का चतुर्थ संगति /सभा कनिष्काल में कश्मीर के कुंडलवन विहार में हुयी थी।  सर्वास्तिवाद का संकलन व संगर्ह इस सभा में ही हुआ था।  
 ऐसा माना गया है कि विभाषाओं को संस्कृत में लिखा गया था तब से बहुत से बौद्ध गंथ संस्कृत में लिखे गए। 
युवांचांग अनुसार  कनिष्क  संस्कृत अनुवादों को  ताम्रपत्रों में खुदवाकर एक स्तूप में बंद करवा दिया था और इस स्तूप का अब तक कोई पता  चलता है।  (राहुल -मध्य एसिया का इतिहास )  




Copyright@
 Bhishma Kukreti  Mumbai, India  5/ 5/2016 
   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --177

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -177



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Tow Garhwali Modern Poems

Garhwali Poem by Dr Ptritam Apachhyan

झुणमुण झुणमुण झुमणिगेझणमण पाणी बूंद
तुणमुण तुणमुण टिन बजेदणमण धुर्पळि चूंद
(ठीक ठीक अनुवाद संभव नहीं. मतलब है कि बारिश हुईछत के टिन बजने लगे और छत टपकने भी लगी. कोई विद्वान साथी इन ध्वनियों का अनुवाद करे तो जरूर बताइएगा)

मौज हुईं छन (A Satirical Garhwali Poem )
Darshan Singh

मौज हुईं छन मौज हुईं छननेतौं की यख मौज हुई छन।
जै थै देखो नेता बण्यां छन,वोटर कू उ खोज करणा छन।। 

वोटर कू अकाळ प्वड्ंयूच, 
कख बटि मीलला गणवाणा छन।
अपणा बाना भयों भयों थै, 
बखै बखै की लडवाणा छन।।

जौं कु यख कभि जलम नि ह्वाई, 
आज तलक जू घार नि आई। 
डांड गाड ऊ जै नी सकदा, 
क्षेत्र विकास की बात करणा छन।।

ठुलठुला नेता जुगार लग्यां छन, 
बुंगडा नेता जुगाड़ करणा छन।
मुलक की मुश्किल सब मिटि जाली, 
म्यारु दगड रौ सब बुलणा छन।।

बुंगडा नेता भी कुछ कम नी छन, 
एक छनीं मा दस मिलणा छन। 
जौंल जमण्या कू गळ्या नि लांघू, 
उ जापान कि बात करणा छन।।

ठुलठुला नेता बिवरि बण्यां छन, 
बुंगडा नेता बिकण लग्यां छन। 
रामनगर कु बैल पड़ाव जनु, 
लैन लगै क खड़ा हुयां छन।।

ना क्वी रीति ना क्वी नीति, 
मतलब अपणू सीदु कना छन।
सौ साठ पैल्या साल बीकि गैं, 
बाकि बिकणा कू तैयार बैठ्यां छन।। 

मौज हुईं छन मौज हुईं छन, 
नेतौं की यख मौज हुईं छन।।
जमण्या -जगा कु नाम। जुगार -जुगाली 
सर्वाधिकार सुरक्षित @:-
दर्शनसिंह रावत " पडखंडांई "
दिनांक :-05/05/2016


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क्या मनुष्य मनुष्य भ्रूण मंदिर में चढ़ा सकते हैं ?

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क्या  मनुष्य  मनुष्य भ्रूण मंदिर में  चढ़ा सकते हैं ?


 चबोड़ , चखन्यौ , चचराट :::   भीष्म कुकरेती   
-
संतराजौ  फूल (गेंदा )  - अरे गुड़हल आज तू पूरा नि उफरी (फूला ) ? क्या बात ?
गुड़हलौ फूल -बस आज भौति दुखी छौं। 
संतराज -हाँ आज त्यार रूप बिरूप हुयुं च।  क्या बात ? 
गुड़हल -अरे यार मि यूँ मनिखों रंग ढंग देखिक आज बड़ो दुखी छौं। 
संतराज -उ त तयार मुख पर पड़ीं रात से पता चलणु इ च .. पर किलै ?
गुड़हल -अरे मनिख बड़ा विध्वन्सी छन भै ,
संतराज -कनो ?
गुड़हल -अरे अपण घौराक मंदिर ह्वाओ या सार्वजनिक मंदिर  इकै मनिख बिस बिस फूल चढांदन।  
संतराज -हूँ ! 
गुड़हल -हाँ एक फूल चढांण से क्या भगवान प्रसन्न नि हूंद क्या ? अर बीसों फूल चढांण से क्या भगवान सरा दुनिया भक्त तैं सौंप दीन्दो क्या ?  
संतराज -मतलब ?
गुड़हल -अरे फोकट का फूल तुड़ण से बीज बणण  इ खतम ह्वे जांद।  अरे  
संतराज -मतलब ?
गुड़हल -मतलब बीज श्रिष्टि की सम्भावना हूंद अर फूल तुडनो अर्थ च बल श्रिष्टि सम्भावना ख़तम करण।  यी मनिख अंदादुंद फूल मंदिरों मा चढाणो वास्ता ,  ड्र्वाइंग रूम मा फूल धरण से सरासर श्रिष्टि याने सम्भावना समाप्त करणो ब्योंत करणा रौंदन। 
संतराज -पर भक्ति से   .... 
गुड़हल -अरे मनिख इथगा ही भगवद भक्त छन तो अपण भ्रूणों तै किलै मंदिरों मा नि चढांदन।  
संतराज -ह्यां पर यदि मनिख अधिक फूल मंदिरों मा चढांदन तो उथगा ही फूल उगांद बि त  छन। 
गुड़हल -पर ख़ास ख़ास ही फूल तो उगांदन। 
संतराज -पर डार्विन का नियम च बल प्रतियोगिता मा वी जीतल जु सहयोगी ह्वालो।  मंदिर जोग फूल मनुष्य का सहयोगी छन तो फुलणा छन , फलणा छन।   
गुड़हल -यी सब बकबास च।  मनुष्य  हमर फूल तोडिक सम्भावना ही खतम करणा रौंदन। 
संतराज - अरे ! अरे ! अरे मंदिर का पुजारी मि तैं मेरी भयात का साथ तोड़ी ल्हीगे।  
गुड़हल -ये मेरी ब्वे ! ये मेरी ब्वे ! मि तै कै जानवरन घुळी दे । ये मेरी ब्वे ! ये मेरी ब्वे  ... 


5/5/2016 ,Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
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Wednesday, May 4, 2016

Lord Ripen: The First Authentic Modern Garhwali Poetry

 Critical History of Garhwali Poetry –Part 2

                  Garhwali Poetry from 1750-1846
                
                                        Bhishma Kukreti

                  Initial Developing Phase of Modern Garhwali Poetry (-1900)


               The Garhwali Poetry critics divided modern Garhwali poetry development into stages. The first stage is called Pratham uttahn as –to 1925.
          Harshpuri Gusain, Lila Datt Kotnala and Hari Krishn Dorgaditi Rudola are said to be first three modern Garhwali poets those initiated modern Garhwali poetries.
     The poetry manuscript by Harsh Gusain (1820-1905) was started by him on 48 (as written on his manuscript 48). 48 means Sanvat 49Jeth and that means he wrote poetries from 1892.
  Lila datt Kotnala was contemporary of Hindi literature creative Harish Chandra. Kotnala’s Hindi poetries used to be published in ‘Kavi vachan Sudha’ edited by Harish Chandra.
         Lila Datt Kotnala wrote poem ‘Lord Ripen’ paying respect to Viceroy Lord Ripen as Bhartendu Harishchandra wrote poem Ripnashtak’ supporting the reform policies of Lord Ripon. Lord Ripon was Indian viceroy from 1881-1884. That means the Garhwali poem ‘Lord Ripen’ was written before 1884. The logical analysis sate that ‘Lord Ripen’ is first authentic Modern Garhwali poetry.  


                            लार्ड रिपन
कवि -लीला दत्त कोटनाला (श्रीनगर ,1846 -1926 )
भारत का टोल साब भारत का टोल हे लाट रिपन साब तेरो रैग्यो बोल
भारत बधाई साब भारत बधाई
जब बटि आई साब घरु घरु गाई
काबुल लड़ाई साब काबुल लड़ाई
तेरा हाथ जस आई झट वा उड़ाई
जनि जनि बांधि तुमन भलि भलि जथा
तनि तुमरि गाई जांद जख तख कथा
भारत निवासी माँज स्वशासन चर्चा
पूरी जब कैल्या साब ! तब होली चर्चा

                  Lila Datt Kotnala wrote (1846-1926) Virah, holi and Usha Anirudh Vivah Garhwali poems. His Garhwali poetry collection book ‘Garhwali Chandmala’ in 1918 AD.

References-
Abodh Bandhu Bahuguna, 1981, Shailvani, Himalya Kala Sangam, Jankapuri, Delhi, pages 10-13
Dr. Jagdamba Prasad Kotnala, 2011, Garhwali Kavya ka Udbhava : Vikash evam Vaishisthya, page-65
Bhishma Kukreti, 2013, Garhwali Kavita Puran, Angwal, Samay Sakshya
Copyright @ Bhishma Kukreti 1/9/2013
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Narendra Singh Negi: The Poet of Varied Subjects and Images

(Critical History and Review of Garhwali Poetry Literature- 95 )

            Bhishma Kukreti

           Narendra Singh Negi is world’s finest and famous Folk Singer. World Famous Folk Singer Narendra Singh Negi is also fine poet for Garhwali language.
           World Famous Folk Singer and Garhwali poetry creator Narendra Singh Negi was born in 1950, Pauri village, Nadalsyun, Pauri Garhwal, Uttarakhand , South Asia.  Narendra Negi took formal education in Music and Musicology too.
     World famous Folk Singer Narendra Singh Negi also created poems and lyrics.
There are following Garhwali Poetry collections published by World Famous Folk Singer Narendra Singh Negi –
1-Khuchkandi
2-Gani ki Ganga Syanu ko Samodar
3-Muth Botik Rakh
      The subjects of Famous Poet Narendra Singh Negi are varied as society, complex structure in the society and social unrest, pain and happiness, environment, social corruption, corruption in politics, corruption in government administration, love, bravery, awakening and many more. World Famous Folk Singer and renowned Garhwali poet Narendra Singh Negi uses both styles in his verses conventional and newer styles.

   The emotional and artful dimension is found equally in the poems of Negi. The poems of Narendra Singh are more of melodious nature.  
 World Famous Folk Singer and Garhwali poet  Narendra Singh Negi is famous for creating poems on contemporary subjects.
                                        धुंध
Poetry by : नरेन्द्रसिहं नेगी ( 1950, Pauri village, Nandalsyun , Pauri Garhwal) 
अजकाल पाडूमा चौदिसु फैलीछ धुंध अंदाधुंद
काळा झंगरणया धुवाॅ कि धुंध
ऑखोंमा अगास मा धुंध
जुकडा मा जीवन मा धुंध
जगदा जंगलून मोसेंदा भविष्यपर धुंध
धुंदळी नी या धुंध
ई घौणि धुंधमा कुछकत नी दिखेणू
न बट्वे न बाटा न मिरग न चाॅठा
जूॅदों छौंपदी अर मोरदौं भड्याॅदि बणागै धुंध
क्या पसु क्या पक्षी क्या डाळा क्य मन्खी
ऐथर आग पैथर छारू अर मत्थी धुंध
धुंध अन्दाधुंध
कुछ नि देख सकणा ये गौंका लाटा
न आज न भोळ न नफा न घाटा
धुंध अन्दाधुंध
कुछ नि देखणू बण विभाग न आग न बाघ
कुछ नि कै सकणी सरकार न उपै न उपचार
एक हैंका पर भगार
कब छंटेलि भै या धुंध अर कब दिखेलो
वो ह्यूँदो हिमालै सि
सफेद सच्च साफ साफ
    South Asian World Famous Folk Singer and poet Narendra Singh Negi is expert of creating perfect images as per subject.


Copyright @ Bhishma Kukreti, 4/5/2016
Notes on a Literature Contributor for  Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from Pauri village  of   Garhwali Poetry; fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from Chamoli Garhwal of   Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from  Uttarakhand of   Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from Himalaya  of   Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from  North India of   Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from  Indian subcontinent of   Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from  South Asia of   Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature; Literature Contributor from  Oriental region of   Garhwali Poetry, fiction, criticism and collecting folk literature
World Famous Folk Singer Narendra Singh Negi as Poet, Great Folk Singer Narendra Singh as Poet 

हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में अश्वघोष

Ashwaghosh  and Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History

  हरिद्वार  ,  बिजनौर   , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में अश्वघोष 

        Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  175                      
                                                हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  175                

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  


        
        बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर के  व दक्षिण एसिया सम्राट  कनिष्क की पाटलिपुत्र विजय यात्रा में कनिष्क को महान संस्कृत नाटककार व काव्यकार अश्वघोष भी मिले थे।  कनिष्क अश्वघोष को पुष्पपुर (पेशावर ) ले गया। था।  
अश्वघोष के महाकव्य -
बुद्धचरित - संस्कृत में बुद्धचरित खंडित मिलता है किन्तु चीनी व तिब्ब्ती अनुबाद हैं। 
सौंदरनंद 
अश्वघोष के नाटक 
सारिपुत्र - खंडित संस्कृत नाटक तरिम उपत्यका में मिला है 
राष्ट्रपाल - का अनुवाद व मूल अभी तक नहीं मिला है 
कालिदास का पूर्ववर्ती साहित्यकार  अश्वघोष  की रचनाओं में  कालिदास जैसी समानताएं मिलती हैं। 
 

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  4/ 5/2016 
   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --176

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -176



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