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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, June 22, 2017

संदीप रावत, की रचनाएं

(1) कुछ पंक्ति.. "पाणि अर किसाणि" पर - ----
         
           " पाणि - किसाणि "

कथगा बि ह्वा धन्न
पर खाण ही पड़द अन्न ,
क्वी मशीन नि देंदि कब्बि
पाणि अर अन्न |
           बुसग्ये जालु सैर्या पाणि
            तब ज्यूंदो रै$ला  कन ,
           अर किसाणि नि रालि त
           कख बटि खै$ला अन्न  |
17/06/2017 @संदीप रावत , श्रीनगर गढ़वाल |
         
          (2) " खबर "
अखबार$ एक पन्ना मा
खबर छपीं छायि कि -
टनों अनाज सड़कम सड़ी ग्यायि |
अर!
हैंका पन्ना मा लेख्यूं छायि कि -
एक मौ$ ब्याळि रात
बल भूखन मरी ग्यायि |
     25/03/2017@ संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल |

(3)गढ़वाळि गजल /गंज्यळि गीत "लोग "@संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल |
                              "लोग "
मुख ऐथर चिफळि गिच्ची करदन लोग
अर पीठ पैथर झूठी-सच्ची धरदन लोग |
हुणत्यळि डाळी का मौळंदा पात देखीक
झणि किलै जलड़ौंम छांछ  संग्ती डलदन लोग |
दूधौ-दूध पाण्यू-पाणि द्यिख्यें$द  सब्यूं
मुख सामणि मुखसौड़ा फिर्बी मरदन लोग |
सब्बि$ जगौं बण्यां रौंदन भौत पर्वाण
हैंका  तैंकम  झट्ट पक्वड़ी तलदन लोग |
जणदा नी बल मंत्र द्येखा बिच्छी को
सर्प द्वलणी हत्थ  फिर्बी कुचदन लोग |
मिल्द जब हे स्याळ ददा वळो पट्टा "संदीप "
अफ्वी औतारी अफ्वी पुजारी बणदन लोग |

       -------@संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल |

सफेद छाती वाले मुर्ग

White-Breasted Waterhen (Amauronuis phoenicurus) Safed Chhati wali Jal Murg
-
 
 गढ़वाल की चिड़ियायें - भाग -26

( Birds of  Garhwal; Birding and Birds of Garhwal, Uttarakhand, Himalaya ----- 26) 
-
आलेख : भीष्म कुकरेती , M.Sc.  

32 सेंटीमीटर लम्बे जलमुर्ग मुख्यतया मैदानी हिस्सों व नैनीताल जैसे पहाड़ी जगहों में तालाब व तलायों के बिलकुल पास पाए जाते हैं। अग्र भाग सफेद व पश्च भाग सिलेटी रंग का होता है।  उड़ सकते हैं और नर -मादा साथ में रहते हैं। 
-
सर्वाधिकार @सुरक्षित , लेखक व भौगोलिक अन्वेषक  



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विकाश

Modern Garhwali Short Story by Jasvir 
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Presented on internet by Bhishma Kukreti 
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ये साल गर्मीयूं कि छुट्टीम गौं जयूंछायी,  मेरी मां ल बथै कि हमरा सैणाक पुगुंड फर सडक कटेणी च बल।   मि हैरान ह्वे ग्यों, यो पुगुंडु त हमरु सबसे बडु पुगडु छौ, येकै नाज से त हम पलेन्दा छा। 

ब्यखुनि दौं  मि धुमुणकु चलि ग्यों सारी जने,  द्य्याखा त सैर्या पुंगुडु कटै ग्या, द्वी JCB अर पाचं मजदूर लग्यां छा खैंण्डण फर। मि निराश ह्वे कि पुंगडक एक किनरा फर बैठि ग्यों,   तबरि म्यारू ध्यान पुगंडक ढीसक पोड फर गा, म्यारा आखोंन्द आंसु  ब्वगण लगगी, आखों अगने धुन्धकार ह्वे ग्या, मीथै अपणु बचपन दिखेण बैठ ग्या।

चैत का मैनेौं कि सट्टी (धान) बुतैम येयी पोडाक मुडि बैठिक कल्योरोटी खान्द छाया, मेरी मा मीखुणी बोदि छै, लखडु अर ग्वपला टीपीकि ल्यायु आग जगोंला अर च्या (चाय) बणौला। 

म्यारू दादा (बडु भै) मीसे काफी बडु छाै यांलै वो हैल लगांदु छौ, अर मी खुणि ब्वदा छा तु डाला फोड, सबसे बेकार काम छौ मीथै भारी गुस्सा औन्दु छो पर म्यारा पिताजी कि डैरकु  मि चुप रैजान्दु छौ ।   मी थै सिनक्वलि भूख लग जान्दी छै, मि बार-बार मेरी मां थैं सनकाणु रैन्द छौ, मेरि मां हैंसिकि बोदि छै,  मूडि गदन  छोयाम जा अर पाणि लियो फिर रोटि खौंला। 

मि खुश ह्वेकि हथ फरकु कूटू एक तरफ चुटैकि पाणी कु कैन हाथ म पकडि कि दौडुदु छौ छोंया कि तरफ, तवरि पिछनै भटी म्यारा पितजिकी खतरनाक अवाज सुणेन्दी छै, कन भूख ह्वे रे त्वे खुण,    अभित अद्दा पुगुंडु भि नि बुते, के कु कबलाट हुयूं त्वेफर ?  फिर मि रुवण्यां सि मुख बणा खै अपणी मां जनै देखुदु छौ अर तब मेरी मां बोदि छै, नन्नु लौडु च भूख लग गे होली वेथैं, आल्यावदि खै ल्यूंला बगत ह्वेतग्या। फिर हम सब्या येई पोडक मुडि बैठिक कल्योरोटी खाणकि तैयरी करदा छाया।  पिताजि तैल -मैल पुंगडक हल्यों थैं धै लगांन्दा छाया, आवा भारे रोटी खै जावा।

असूजक मैना मेरी मां ब्वलदि छै बुबा आज इसगोलकि   छुट्टी कारो आज सैणाक  पुगंडक सट्टी मन्डणी, सर्या सार मुके ग्या हमरु ही हमरु रै ग्या, लोखुल गोर छोडयलीं सारि । मि मेरी मां दगड एक शर्त धरुदु छों कि मिल तभ आण  जो तिल  कखडिकु रैलु अर भात बणाण अर एक कखडी कच्ची खाणा कु लिजाण नथर मिल नि आणु I  मेरी मां  तैय्यार ह्वे जान्द छै। सुबेर मेरी मां भात और रैला थे भान्डाउन्द धैरि क अपणी पुरणी धोती का कत्तर चीरि कि एक फन्ची बणा कि मेरि भुल्ली का मुण्डम धरदि छै और हथ फर पाणी कु कैन लेकि  भुल्ली अगने भटै अर मां अर मी पिछनै भटे मोलकु ब्वर्या मुन्डम धैरीक रस्तालग जान्दा छाया। 

पुंगडम पौंछिकि जब मि सट्यूंकु कुन्डकु देखुदु छौ, जो कि मी से भी उच्चु रैन्दु छौ त म्यारू सबि साहस खत्म ह्ने जान्दु छौ । सट्टी   मंडै, पराल फ्वलै, फिर बोरि भ्वारा अर धार सरै, थकि -थुकि खै फिर ये ही पोड मुडि बैठिक रैलु भात खयेन्दु छौ, मेरी मा आन्दी-जान्दी बेटी-ब्वारीयूं थै धै लगै- लगै कि बुलान्दि छै, आजावा हे कखडी खा जावा, .. अर तब  मिल-जुलिखै  हारा मठ्ठा दगडि हैरि कखडी कि फडकी खयेन्दि छै।

फागुणक  मैना स्कूल १० बजी लगदी छै, हमरा गौंक  लौडौंकि एक टीम छै, सुवेर-सुवेर पैलि हम एक धात मोल घोल्यान्दा छाया सैणाक पुंगडों, दगुडु बणेकि जान्दा अर आन्दा छा, रस्ता म एक गौं प्वडुदु छों, वख भटै अमरूद च्बरणा, खूब गालि खयेन्दी छै पर मजा भी खूब आन्दु छो।

 मि इन्नि बचपन का सपना देखुणु रौं तबरि गाड का पलिछाल मडगट भटि म्यारू सि दद्दा आंद दिख्या, ... मि हैरान ह्वे ग्यों दद्दा थैं म्वर्यांत कै साल ह्वेगीं पर इबरी यख ..कनखै ?      दद्दा नजदीक ऐैग्या, दद्दा कु मुख गुस्साल लाल हुययूं छौ, अर अन्दिचोट दद्दा JCB वला मजदूर फर पिलची ग्या।     कनु रै हराम का बच्चा . . .किलै उजाड रे तुमुल यो पैरु ? ....तुम थैं पता मिल अर मेरी सैणिल मूडि गाड भटै सर्यां छी ये पैरा खुणि ये ढुन्गा, सर्या भीड्ड उजाडयाल? . . मजदूर ब्वनु, हे ब्वाडा सडक बनणीच यख, ... उनभित बन्जर ही छो स्यू प्वडीयूं, किलै छौ गुस्सा हूणा ?  यां का पैसा मिलणी तुम थैं। 

अरे बुबा कतग पैसा जि देला तुम ? कतग खैरि खंयीच मेरी यीं पुगंडी बार, अपडि शैणिकु बुलाक, गुलाबन्द अर कन्दुडुकि मुर्खी बिकै कि मिल या पुगुंडि मोल ल्या, तीन दिन का बासा फर पैदल भूखू- निर्भुखु  पौडि गौंमि येकि रजेस्ट्री कराणा खुणि, मेरी खैरिक क्या कीमत दे सकदौ तुम ? ....पर निर्भे छव्वारा केखुण खैन्डणा छो तुम यीं सडक थै ? 

अरै ब्वाडा विकास आणुच बुना ..गढवालम यीं सडकाक रस्ता, मजदूर बोनु । 

पर बुबा कतग बडु च वो विकास जै खुण इतग बड़ी सडक चैन्द ? 

 अरे ब्वाडा बहुत बडुच यत कुछ भि नीच वे खुण त सैर्या गढ्वाल खैन्डेणू च ।, 

सचें ब्वनु छै तू? 

हां ब्वाड़ा। 

तबरी दद्दा  कि नजर मीं फर पोडिग्या, ... कनु रै निर्भग्याओ किलै छोडियीं तुमल पुगंडि बन्जी ? ...... मि डैर ग्यों, क्या बोलु, फिरभी हिम्मत कैरिक मिल ब्वाल ... कैल कन खेति - पाति ब्वे - बाप अब दाना ह्वेगीं। 

दद्दा कु गुस्सा अब सातों असमान फर चैडिगे, .... कनु तुम थैं जैर अयूंच करदा ? 

डरदा- डरदा मिल ब्वाल ....दद्दा हम द्विया भाई शहर रन्दौ नौकरी फर।, 

पर ब्वारि त ह्वेली तुम्हरी धारम ?, दद्दाल  पूछ 

मि-   न - न वो भि हम दगड ही रन्दन ।

 पर किलै ? दद्दा हैरान ह्वेकि

मि-  नौनौ थैं पडाना खुणि ..

दद्दा  गुस्साम -  पर यख किलै नि पढाया ? .... तुमल भित यखि पाढा। 

मि- दद्दा यखकि पडै मा और वख कि पडै मा भौत फर्क च । 

दद्दा हैरानी से -  क्या फर्क च रै ? 

मि-  दद्दा यख पैडिकत हम जन ही बणला, पर वख पाडला त भौत बड़ा आदिम बणला। 

दद्दा - बड़ा आदिम ? कतग बड़ा रै? 

मि-   भौत बड़ा दद्दा,  इतग बडा कि फिर वो मूडि ब्वे-बाप, नाता-रिस्ता, बोलि-भाषा, तीज-त्योहार कैथै नि देखि सकदा, बस विकास थै की देखिदीं।

दद्दा -  बिकास ? ......को .... जो यीं सडका रस्ता आणुचं ....वी ?  

मि- हां दद्दा ।     
  
दद्दा क मुख फर निराश छा ग्या, ठिक च बाबू.... बोलिकि,  फर फरकि, एक नजर उजड्रयां पैराक तरफ ढ्याख  फिर पुगंड जनै ढ्याख.... अर  फिर स्यां-स्यां मडगट जनै जाण लग गीं। मि रुण बैठग्यों, जोर से धै लगैं, ....दद्दा .... मी थै भि लीजा अफु दगडि, पर दद्दाल  फरकि खै भि  नि ढ्याखु, अचानक मेरी तन्द्रा टु्टी, मिल द्याख कि मित पुगंडक किनरा फर बैठ्यूं छौं अर मजदूर काम कना छा। दद्दा थैं म्वरयां त तीस साल ह्वे गीं पर शोर अभि भी पुगंडियूं फरै च । दद्दा थै सायद बिकास समझ नि आयी, पर मेरित गेड बन्दी च, कि विकास आलु त यूं सडक्यूं कै रस्ता आण ।


                                 जसवीर

"ढ्वलकी बिचरी"

Garhwali Poem by Sunil Bhatt
-
ढ्वलकी बिचरी कीर्तनौं मा,
भजन गांदी, खैरी विपदा सुणादी।
पढै लिखैई बल अब छूटीगे,
एक सुपन्यु छौ मेरू, ऊ बी टूटीगे।
ब्वै बुबा बल म्यरा, दमौ अर ढोल,
अब बुढ्या ह्वैगेनी।
भै भौज डौंर अर थकुली, गरीब रै गेनी।
छ्वटी भुली हुड़की झिरक फिकरौं मा,
चड़क सूखीगे।
हंसदी ख्यल्दी मवासी छै हमारी,
झणी कैकु दाग लगीगे।
ब्वै बाबा, भै भौज भुली मेरी बेचरी
कै बेल्यौं बटैई, भूखा प्वटक्यौं बंधैई
भजन गाणा छन, द्यव्तौं मनाणा छन।
देखी हमरी या दशा,
औफार डीजे वीजे विलैती बाबू ,
गिच्चु चिड़ाणा छन,
ठठा बणाणा छन, दिल दुखाणा छन।
ढ्वलकी बिचरी खैरी लगौंदी, ढ्वलकी बिचरी।।
स्वरचित/**सुनील भट्ट**
17/06/17

चाच्ची ,बड्यों न बोलि

Garhwali Poem by Rakesh Mohan Thapliyal 
-
हे बेटा कखन औंण,
 हमारा मुखड़ों पर अन्वार,
 लैंदु –पाणी अब कखि रई नी , 
 छुड़ी दाळ-रोट्टी,साग-भात खा
भुज्जी की त छुई ही नी ?
हे बेटा,कुछ बांदरुन धपोरी,
 अर कुछ सुंगरुन खाणा,
 डोखरों, छोरा खारु बोंण,
 जब कुछ नी हासिल –पाई ?
Copyright@ Rakesh Mohan Thapliyal 

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" पाणि - किसाणि "

Garhwali Poem by Sandeep Rawat 
-
कथगा बि ह्वा धन्न
पर खाण ही पड़द अन्न ,
क्वी मशीन नि देंदि कब्बि
पाणि अर अन्न |
बुसग्ये जालु सैर्या पाणि
तब ज्यूंदो रै$ला कन ,
अर किसाणि नि रालि त
कख बटि खै$ला अन्न |
17/06/2017 @संदीप रावत , श्रीनगर गढ़वाल |
(प्रवक्ता- रसायन, रा0इ0कॉ0धद्दी घंडियाल, बडियारगढ़,टिहरी गढ़वाल)

जल मुर्गी

Common Moorhen (Gallinula chloropus) Samanya jal murgi 
-
 
 गढ़वाल की चिड़ियायें - भाग -25 

( Birds of  Garhwal; Birding and Birds of Garhwal, Uttarakhand, Himalaya ----- 25 ) 
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आलेख : भीष्म कुकरेती , M.Sc.  
32 से 35 सेंटीमीटर लम्बे जल मुर्ग साधारणतः दलदल , पानी वाले सतह के पास वाली जगह , खूब वनस्पति वाली झीलों  नहरों के पास शर्दियों में मैदानी इलाकों में  पाए जाते हैं। 

 प्रजनन समय नर मुर्ग की चोंच लाल व चूंच किनारा पीला हो जाता है और अन्य समय इन अंगों का  मटमैले रंग होता है। 

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सर्वाधिकार @सुरक्षित , लेखक व भौगोलिक अन्वेषक  



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