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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, November 6, 2017

IAS परीक्षा हेतु ऑप्सनल पेपर का चयन

IAS परीक्षा हेतु ऑप्सनल पेपर का चयन 

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गढवाल भ्रातृ मंडल (स्थापना -1928 ) , मुंबई  की मुहिम  –हर उत्तराखंडी  IAS बन सकता है )
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IAS/IRS/IFS कैसे बन सकते हैं श्रृंखला -25 
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गढ़वाल भ्रातृ मण्डल हेतु प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती 
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  IAS के अभ्यार्थी अधिक परेशान ऑप्सनल  विषय चुनाव के लिए होते हैं।  यह परेशानी वास्तव में परेशानी है ही नहीं अपितु एक मानसिक गलतफहमी/Confusion है। 
 

ऑप्सनल पेपर एक ही विषय होता है अब।
          ऑप्सनल विषय चुनने के कुछ तरीके --
  
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  आप बजार से चार पांच विषयों की पुस्तकें खरीदिये।  प्रत्येक पुस्तक को पढ़िए। 
 फिर  सोचिये कि आपको किस विषय में आनंद आया और किस विषय को आप शीघ्र ही समझ गए। 
 फिर IAS  के इन्ही विषयों की पुस्तकें पढ़िए और ध्यान से सोचिये कि आप किस विषय में सरलता से पारंगतता हासिल कर सकते हैं।  
 फिर पिछले तीन चार साल के  हर विषय के IAS परीक्षा पत्रों को पढ़िए और खोजिये कि आप किस विषय के प्रश्नों का सरलता से उत्तर दे सकते हैं। जो सरल लगे व आनंददायक लगे उस विषय को चुनिए। 
  वैसे सम्भव हो तो ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन के विषय को ही चुनिए।  हाँ यदि आपको उन विषयों में रूचि या आनंद न आता हो तो ही दूसरे विषय चुनिए। 

 ------ ध्यान रखिये विषय आपको IAS नहीं बनाएगा अपितु आप विषय को पढ़कर ही IAS बनेंगे।  आप विषय के बनिस्पत महत्वपूर्ण हैं 



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शेष IAS/IPS/IFS/IRS कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  26  --में..... 
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कृपया इस लेख व 
हर उत्तराखंडी IAS बन सकता है" 
आशय को   लोगों तक पँहुचाइये प्लीज ! 
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S UPSC Exam Hard ?Family background and IAS/UPSC Exams, Planning IAS Exams, Long term Planning, Starting Age for IAS/UPSC exam preparation,  
Sitting on other exams ,
Should IAS Aspirant take other employment while preparing for exams?, Balancing with College  Study ,
Taking benefits from sitting on UPSC exams, Self Coaching IAS/UPSC Exams,  Syllabus  IAS/  UPSC Exams ,

भोजनौ जगा अचार , सलाद अर थाळी बिंडी बड़ैं

(Best  of  Garhwali  Humor , Wits Jokes , गढ़वाली हास्य , व्यंग्य )
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 चबोड़ , चखन्यौ , ककड़ाट  :::   भीष्म कुकरेती    
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  आप कैक  ड्यार  जावो अर उख गृहलक्ष्मी बड़ा उत्साह , उलार मा आपक समिण  बड़ो मनोयोग से पकयूं बनि बनि पकवान धरदी अर आप बि भूक चूक बणि खूब खै लींदा। 
 आप हथ धूंदा , उंकी तौलियान मुक पुंछदा , बड़ी जोर की असभ्य डंकार मरदा अर बुल्दा बल आज कुछ जादा इ  ह्वे गे। 
   गृहलक्ष्मी जब पुछदी बल ये जी खाणा  ठीक बण्यु  छौ ना ?
 अर आपक उत्तर ह्वावो , "हां ब्वारी ! अचार अर सलाद मा  त क्या मजा आयी , क्या बुलण।  छा ब्वारी ! इन बतावो कि इथगा बढ़िया थाळी कखन लै भगतू ? मेमानुं  तैं  खाणो खलाणो कुण एक थाळी मीन बि लीण छे."
   तो गृहलक्ष्मी पर बज्जर  नि पोड़ल ?
 अवश्य ही गृहलक्ष्मी का सरा उत्साह खतम ह्वे जालो।  वींक सरा कर्युं -कयूं मोळ जोग ह्वे जालो। 
        पुरण जमन मा जब सब कुछ शॉर्टेज मा छौ तब क्वी कैमांगन सुफेद कुर्ता , कैमान सुलार अर हैंक मांगन जुत्त उधार लेकि ब्या मा जावो अर लोग वैक सुलार कुर्ता की प्रशंसा जगा वैक पुराणो धुराणो काळु हुयुं जंद्यो की प्रशंसा करिल्या तो क्या वैक आत्महत्या करणो ज्यू नि बुले  होलु ?
   आप कैक दगड़ कै प्रोग्राम मा जावो अर उख दगड़्या की स्याळी गीत गावो अर आप स्याळी गौळै प्रशंसा जगा हौलौ सिटिंग व्यवस्था अर पंखौं बड़ै करिल्या तो दोस्त वै बगती दुसमन नि बौणल क्या ?
   बड़ै , तारीफ़ या निंदा का अपण समय हूंद , प्रशंसा , स्तवन या आलोचना समिण वळक मनोस्थिति का हिसाब से ही हूण चयेंद ना कि बरात गे धार पोर तुम बजाओ ढोल ये  वार। 
   चारणगिरि , स्तुति , दोष लगाण वास्तव मा समय ,  व्यक्ति कु वर्ण -वर्ग अर स्थान की गुलाम च।  
 मीन एक पुस्तक विमोचन द्याख मुंबई मा।  वे विमोचन मा जनि श्री नंद किशोर नौटियाल जी ऐन तनि  द्वी चार हिंदी कवियूंन कवि  की प्रशसा छोड़ि नौटियाल जीक बड़ा मंगण शुरू कर दे , नौटियाल जीक खुट-वंदना शुरू कर दे किलैकि नौटियाल जी महाराष्ट्र हिंदी अकादमी का फूंदा जि बौण  गे छा। 
   भौत सा लोग प्रशंसा या आलोचना से अपण उल्लू सीधा करणो हथ्यार बणांदन  तो भौत सा अज्ञानता बस मुख्य वस्तु की बड़ैं जगा गौण वस्तु की बड़ैं करण लग जांदन त   कुछुं समज इ मा नि आंद कि केवल प्रशंसा ही ना दुसरैक आलोचना बि हैंकाकुण प्रशंसा ही हूंदी। 
    राहुल बाबा मंच पर बैठ्यां ह्वावन तो यी सब जाणदन कि राहुल बाबान इथगा सालुं  मा  प्रशंसा लैक कुछ त कार नी च त राहुल एक अनुशसन प्रिय नेता च , राहुल एक जनप्रिय नेता च, राहुल गांधी भीड़ जुटाऊ नेता च जन उपाधि वळि प्रशंसा त दिए नि सक्यांद।  इन मा चतुर स्याळ योनि का कॉंग्रेसी नेता नरेंद्र मोदी की कड़ी से कड़ी आलोचना करिक काम चलान्दन।  यु समौ हिसाबन सही युक्ति च , सही रणनीति च।  मोदी आलोचना से सत्यम ब्रुयात  सिद्ध हूंद अर राहुल जीकुण प्रियम ब्रुयात ह्वे  जांद। 
    फेस बुक मा त क्या से क्या हूणु रौंद।  छ्वीं लगदन बल सदा नंद कुकरेती आधुनिक गढ़वाली कथा जन्मदाता छा।  तो भौत सा सदानंद जीका गाँव का ग्वीलवासी टिप्पणी दींदन कि सिलोगी स्कूल का मैनेजर साब नंदा दत्त जी का विषय मा किलै नि ल्याख ?
    जरा फेसबुक मा  जीत सिंह नेगी जी की बात उठाओ त  अधिसंख्य टिप्पणी कार नरेंद्र सिंह नेगी जी की बात करण मिसे जांदन अर बिसर जांदन कि प्रशंसा या आलोचना समय , स्थान अर व्यक्ति/ वर्ण का हिसाब से ही सुहांदी। 
    आप बि ध्यान दींदा छा कि ना कि काखम क्यांक प्रशंसा करण चयेंद ? आप जणदा छन कि ना कखम समिण  वळक प्रशंसा की जगा वैका विरोधी की आलोचना ही सही हूंद ? है ना ठीक बुलणु छौं ना मि ? 
    
    

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7/11   / 2017, Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India

*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
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    ----- आप  छन  सम्पन गढ़वाली ----
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जसपुर के कुछ विशेष रचनाधर्मी शिल्पकार - 1

 गंगा सलाण के शिल्पकार -1 
         
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आलेख - भीष्म कुकरेती 
(यह लिस्ट पूरी नहीं है कृपया अन्य नाम जोड़ने में सहायता कीजियेगा )
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 जसपुर गाँव (मल्ला ढांगू , लैंसडाउन तहसील , पौड़ी गढ़वाल ) शायद कुछ विशेष श्रेणी वाला गांव है जहां आज शिल्पकारों  की संख्या ब्राह्मण -राजपूतों से  अधिक है ( ३३२ कुल जनसंख्या शिल्पकार 244 ) और  पुरातन में संख्या आधी आधी रहती थी। 
   ब्रिटिश काल से जसपुर दो कारणों से सदा प्रसिद्ध रहा है एक शिल्पकारों हेतु और बहुगुणा ब्राह्मणों हेतु। बहुगुणाओं  आगमन से पहले जसपुर  शिल्पकारों के लिए प्रसिद्ध गाँव था और जसपुर का नाम टिहरी गढ़वाल में भी जाना जाता था ( मेरे श्री लक्ष्मण विद्यालय के गुरु जी  स्व पीतांबर दत्त कोटनाला अनुसार ). 
     कोई भी गाँव या स्थल निर्यात से ही प्रसिद्ध होता है।  यह निर्यात वस्तु या सेवा का होता है।  जसपुर से सेवा व वस्तु (पुरोहिती  ,  गहना निर्माण , कृषि यंत्र निर्माण व मरोम्मत , भवन निर्माण (ओडगिरी ), बढ़ईगिरी , वर्त्तन निर्माण व मरोम्मत, बाक बोलना , घडेळा  धरना आदि ) निर्यात होने से जसपुर एक प्रसिद्ध गाँव था।  
        शिल्पकारों के विषय में किंवदंती है कि श्री गोकुल , श्री बिरजू (स्व  श्री भाना  के पुत्र ) व श्री  सुदामा राम व श्री महेशा नंद (स्व श्री स्यमुड़ क पुत्र हमारे दादा जी के साथ ही जसपुर आये थे।  और इनका मकान  भी  सवर्णों से सटकर  ही जो इस किंवदंती को सही ठहराता है। 
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               -स्व श्री भाना  व स्व श्री स्यमुड़ - लोहारगिरि के सम्राट -
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 स्व भाना  व स्व स्यमुड़  जी कुकरेतियों व बहुगुणाओं  के पारम्परिक व पारिवारिक लोहार थे।  श्री भाना  व उनके पिताजी के हाथ में जादू था।  श्याम बींड़ी दाथी , थमाळी व् नए लौह पिंड से औजार बनाने में सिद्धहस्त रचनाधर्मी थे।  यदि इनकी बनाई कूटी , दाथी पर नाम कुदेरा होता तो  आज एक इतिहास मिल जाता।  अन्य गाँवों में अपने लोहार होने के बाबजूद अन्य ग्रामवासी स्व भाना  जी के पास लोहार गिरी के लिए आते थे। 
इनकी अपनी अणसाळ  थी 
             - स्व श्री हंसराम (हुस्यारू ) -
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 जखमोला परिवार जब मित्रग्रम से जसपुर बसे  तो कुछ समय बाद गटकोट से श्री हुस्यारू को या उनके पिताजी को लोहारगिरि हेतु जसपुर लाये और उन्हें यहां बसाया।  श्री हुस्यारू लोहारगिरि के अतिरिक्त ओड  भी थे और उनके दोनों पुत्र श्री आनंदी व श्री पूर्णा भी ओड थे।
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     स्व श्री गैणा  राम ( गैणू  )

    ढांगू में कोई परिवार न होगा जिसने स्व श्री गैणा राम व उनके पूर्वजों की कोई ना कोई सेवा न प्राप्त की हो।  इनका परिवार घांडी व हुक्का बनाने में सिद्धस्त रचनाकार थे।  टिहरी गढ़वाल  में भी इनकी घांडी  व हुक्का प्रसिद्ध थे।  गैणा  राम जी के भाई श्री मूर्ति इनका साथ देते थे किन्तु उन्हें वह महारथ हासिल ना हो स्की जो श्री गैणा  राम को थी। 
  स्व गैणा राम जी शिल्पकार अधिकारों के लिए सचेत थे व अधिकारों हेतु लड़ते थे।  इनकी तिबारी है। स्व गैणा  राम जी  के पुत्र स्व श्रीकृष्ण कानूनगो थे 
इनके चचेर भाई स्व हृदयराम जी इनका साथ देते थे पर अन्य रचनाधर्मी अधिक थे ' स्व हृदय राम जी का सुपुत्र श्री विजय प्रसिद्ध भवन निर्माता हैं 
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     स्व  श्री दर्शन लाल   , श्री झंडु     व श्री कंठू परिवार 

यह अनोखा परिवार था।  दर्शन लाल जी सभी किस्म के शिल्प रचनाकार  थे।  किन्तु स्व श्री झंडू व स्व श्री कंठू  सुनार थे व इन दोनों भाइयों की सिलोगी में सुनार की दूकान थी। बाद में दोनों भाई भाभर शिफ्ट हो गए। द श्री दीन  दयाल पुत्र श्री दर्शन लाल आज  स्टोव , गैस , टीवी , बिजली मेकेनिक का कार्य करते हैं और क्षेत्र में जसपुर का नाम रोशन कर रहे हैं 
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     स्व रैजा राम 
इनका कोई विशेष विशेषता न थी शायद कुल्हड़  चलाने में सिद्धहस्त थे।  किन्तु श्री रैजाराम अपने इलाके में आर्य समाज को प्रसारित करने के मूक कार्यकर्ता थे।  वे जनेऊ पहनते थे।  रैजाराम जी सुबह सिभ सूर्य  अर्ध्य चढ़ाने  के लिए प्रसिद्ध थे। 
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  स्व श्री  सतुर व  उनका पुत्र श्री गिरीश 

स्व सतुर जी ग्वील बड़ेथ  वालों के हल चलाने के लिए प्रसिद्ध थे व अब जसपुर में केवल उनके पुत्र के पास  बैलों की जोड़ी है और इस तरह श्री गिरीश जसपुर , ग्वील , बड़ेथ  वालों की मांग पूरी करते हैं 

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     स्व श्री जवाहर लाल (जवरी )

स्व श्री जवारी  जी साधारण मजदूरी करते थे किन्तु साथ में बाक बोलने और भूत भगाने हेतु  प्रसिद्ध थे 

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            स्व श्री पीतांबर 

 स्व पीतांबर ओड  के लिए प्रसिद्ध थे इनके भाई भी साथ में कार्य करते थे इनकी ओडगीरी जसपूर नहीं अपितु बाहर के गाँवों में अधिक चलती थी। 

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      स्व श्री काळया 
 ये सभी कार्य करते थे घन लगाने , हल चलाने से लेकर ओडगिरी तक ग्वील बड़ेथ  में अधिक काम करते थे 
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   स्व श्री परमानन्द 
स्व श्री परमानन्द दर्जी का काम करते थे और जसपुर निर्यात में बड़ी भागीदरी निभाते थे। 
इनके भाई बंसी लाल जी ओड  थे। 
    
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 श्री उदयराम 
श्री उदयराम जी दर्जी काम कर सेवा निर्यात करते थे 
   
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             स्व  श्री जयानंद (जतरू )

  श्री जयानंद जतरू  जी के नाम से प्रसिद्ध टमटा थे।  इनके पूर्वजों के  बनाये बड़े बड़े डिबले अभी भी ग्वील , जसपुर , बड़ेथ  में गवाह हैं कि इस परिवार ने जसपुर प्रसिद्धि में कितना योगदान दिया होगा। स्व जयानंद जी ने शिल्पकार आंदोलन जैसे जनेऊ आंदोलन व डोला पालकी आंदोलन में भी भाग लिया था 
इनकी तिबारी है। 
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   स्व श्री खिमा नंद शाह 

 स्व खिमा नंद जी के पूर्वज सुनार थे और खीमा नंद जी भी।  इनकी सुनार गिरी की सभी प्रशंसा करते थे और जसपुर निर्यात में बड़ा योगदान था।  खिमा नंद जी कहीं भी जाएँ जसपुर के बेटी  (सवर्ण  हो या शिल्पकार ) को दक्षिणा दिए बगैर नहीं रहते थे , एक धेले  से शुरू कर चार आना और अंत में ये एक रुपया देने लगे थे। ऐसे  थे खिमा नंद जी सुनार जी 
इनके पुत्र श्री बीरु जी  ने भी सुनारगिरि की पर अब छोड़ दी है और बकरी व्यापार से निर्यात से जुड़े हैं। इनका मकान बहुत बड़ा है।  
खिमा नंद जी के  बड़े पुत्र श्री मनोहर लाल की शादी में सर्वपर्थम जसपुर में डोला पालकी की शुरुवात हुयी थी। मनोहर लाल जसपुर के सर्व प्रथम विज्ञान विषय से इंटरमीडिएट करने वाले हैं। मनोहर लाल जी भीति चित्र बनाते थे।  
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 स्व श्री कलीराम शाह  जी 
इनका योगदान लखनऊ में ढांगू के लोगों की सहायता करने में प्रसिद्ध था ।  जसपुर -सौड़  के मध्य पानी का मुकदमा जसपुर वालों ने स्व श्री कलीराम के कारण  जीता 

 बढ़ईगिरी में भी जसपुर प्रसिद्ध था किन्तु सौड़ के नेगी लोगों में यह माहरत अधिक थी तो प्रसिद्धि के हिसाब से जसपुर  बढ़ईगिरी में प्रसिद्ध नहीं हुआ।  
स्व महेश प्रसिद्ध बढ़ई थे पूरे इलाके में।  अब तो जसपुर बढ़ी हीन है। 
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 सौड़ , छतिंड , बाड्यों  जसपुर ग्रामसभा के ही हिस्से थे तो उनके बारे में  सूचना आवश्यक है 
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   छतिंड  के अनाम बढ़ई 
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मल्ला ढांगू में स्व शेर  सिंह नेगी जी की तिबारी व एक अन्य तिबारी प्रसिद्ध तिबारियो में गिनी जाती हैं।  कहते हैं  इन तिबारियों में नक्कासी का काम छतिंड  के शिल्पकारों ने की थी कौन थे वे शिल्पकार ? अनाम में गर्त हो गए हमारे जसपुर को प्रसिद्धि दिलाने वाले निर्यात कर्ता  !  
  ग्वील का क्वाठा  भितर  की नक्कासी के बारे में कहा जाता है कि श्रीनगर से कलाकार आये थे।  क्या ये अनाम कलाकार छतिंड वालों के रिस्तेदार थे।  यह विषय खोज का है कि  ग्वील के क्वाठा भितर निर्माण में जसपुर ग्रामसभा के किन किन कलाकारों का योगदान है।  श्री बिनोद कुकरेती का कहना है रामनगर से ओड आये थे और कुछ लोककथाएं भी प्रसिद्ध हैं। यह भी उतना ही सत्य है कि बिना जसपुर, सौड़ , छतिंड , बाड़यों  के रचनाकारों  के क्वाठा भितर नहीं बन सकता था। (भीष्म कुकरेती की ग्वील के श्री चक्रधर कुकरेती व श्री बिनोद कुकरेती के साथ फोनवार्तालाप ) 
 छतिंड  के स्व खुसला  जी शिल्पकारों के कर्मकांडी पुजारी भी थे 
 
  - बाड्यों  के घराट  मालिक 

   घराट बगैर पहले जीवन मुश्किल था 
 बाड्यों  के हीरा लाल जी व जीतू जी प्रसिद्ध घराट  मालिक थे और जसपुर क्षेत्र का निर्यात के भागीदार थे 
 अन्य घराट  ग्वील , शिवाला व छतिंड  में भी थे।   
  आज भी जसपुर शिल्पहस्त  कार्य,   सेवा हेतु निर्यात करता है किन्तु मैं भीष्म कुकरेती जसपुर न जाने के कारण आधुनिक शिल्पियों का नाम नहीं दे सक रहा हूँ 


*** मैंने यह लेख यादास्त के भरोसे तैयार किया है कृपया सूचना देकर इसे आगे ले जाने  कीजियेगा -निवेदक -भीष्म कुकरेती

चिर सुंदरी भुंदरा बौ बीमार च, आपक बौ तैं क्वा बीमारी च ?

(Best  of  Garhwali  Humor , Wits Jokes , गढ़वाली हास्य , व्यंग्य )
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 चबोड़ , चखन्यौ , ककड़ाट  :::   भीष्म कुकरेती    
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भौत दिनु उपरान्त मीन भुंदरा बौ कुण फोन कार। 
मि - हैलो ! हैलो ! कुछ तो ब्वालो। 
चिर सुंदरी भुंदरा बौ - कु च सुबेर सुबेर फड़्याणु ? 
मि - चलती क्या खंडाला ? 
चिर सुंदरी  -साले रोज बोलता है बल चलती है खंडाला।  मुझे पता है तू खंडाला के बहाने क्या करने वाला है। 
मि - ये बौ ! मि भीषम छौं।  मुंबई बिटेन ... 
चिर सुंदरी  -हाँ हाँ सब समजद  छौं तेरी मक्कारी।  तुम मुंबई वाळ  ना ! मि जाणि ग्यों अब तुम सब का सब ठग,  बदमाश  .... (सेंसर्ड )
मि - ये बौ ! तबियत तो खराब नी  ?
चिर सुंदरी  -अरे तबियत तो मि ठीक करुल ते फिलम प्रोड्यूसर  की।  तू नाम का ही फिलम प्रोड्यूसर छे पर असलियत मा  मि तै पता च कि तू भेड़ की खाल मा भेड़िया छै।  
मि - मि अर फिलम प्रोड्यूसर ?
चिर सुंदरी  - हाँ हाँ तुम सब फिलम प्रोड्यूसर  में सरीका  नादान  सुंदरी तै कास्ट काउचिंग का जरिया फंसादा अर  भौत एक्सप्ल्वाइट करदा। 
मि - कास्ट काउचिंग ! कास्ट काउच ! का  ... 
चिर सुंदरी  - हाँ हाँ यू स्काउंडलर ! मि  सब जाणि ज्ञान त्यार बारा मा  . मीन देखि आलिन  त्यार हाल।  यू ब्लडी ब्लडी भेड़िया।  
मि -ये बौ।  तेरी तबियत ?
चिर सुंदरी  -चुप मीन नि करणाइ त्यार दगड़ बात। 
जिंदगी मा पैल बार भुंदरा बौन इन फोन काट। 
मीन सुंदरा  बौ कुण फोन लगाई। 
मि - हैलो सुंदरा बौ! मि भीषम  ... 
सुंदरा बौ -ऊं  मि सब समजद छौं वीं भुंदरा की चाल।  चालबाज भुंदरा।  जरूर वा खुस्सट  औरत त्यार जरिया मेरी जायजाद हड़पण चाणी च।  मीन नि  आण  वीं खलनायिका का मकड़ जाळ मा। 
अर सुंदरा बौन फोन काटी  दे। 
मीन बिंदरा बौ कुण फोन लगाई अर मि कुछ बुल्दु कि बिंदरा बौ बुलण लग गे। 
बिंदरा बौ - तेरी मक्कार भाभी भुंदरा शा अर चाटुकार भाभी सुंदरा बेन  मेरी हत्त्या की साजिश रचणा  छन अवश्य ही तू इन पता लगाण  चाणी  छे कि मि कै कमरा मा सियुं छौं।  भगवान बि ब्वालल ना मीन त्वे तै नि बताण  कि मि अपण घौर ना अपितु छन्नीम सियुं छौं। 
अर बिंदरा बौन बि फोन काटी दे। 
 मीन पबितरा काकी कुण फोन कार।  रामा रूमी बाद मीन पूछ। 
मि -ये काकी यी भुंदरा बौ पर कुछ भूत भात त नी लग्यूं ?
पबितरा काकी - हां भूत भात त ना पर सलमान खानक बिग बॉस की   छाया लगीं च।  अच्काल वा अफु तै बिग बॉस की एक महिला चरित्र समजणि  च अर उनी बर्ताव करणी च।  तीन त फोन पर इ बात सुणिन।  हम त  वींक पहनावा बि दिखणा छंवां।  वै चरित्र की ही ड्रेस पैरदि अजकाल। बिग बॉस खतम ह्वाल अर फिर वा ये जामा म ऐ जाली। 
मि -अर सुंदरा अर बिंदरा बौ ?
काकी - वूं पर बि टीवी सीरियलूं बीमारी लगीं च।  यी द्वी समजणा  छन कि हरेक आदिम यूंक विरुद्ध क्वी बुरु योजना बणानु च।  पर चिंता नि कौर ठीक ह्वे जाला।  एकाद मैना यूंका कजेयूं मनी ट्रांसफर बंद ह्वाइ ना कि यी बि जमीन पर ऐ जाला।  
मि -पर  ... 
काकी -इन बीमारी वे पर इ लगद जैक पेट भर्युं हो अर निकज्ज बैठ्यां ह्वावन।  ह्वे जाल सब ठीक।  चिंता नि कौर। 

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610  / 2017, Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India

*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
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    ----- आप  छन  सम्पन गढ़वाली ----
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ढांगू क्षेत्र में गढ़ीयां

Garhis in Garhwal (history aspects)
 ढांगू क्षेत्र  में  गढ़ीयां  
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आकलन – भीष्म कुकरेती
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       गोरखा  और ब्रिटिश शासन के आरम्भिक  में ढांगू क्षेत्र में  व्यापक इलाका आता  था. स्वतंत्रता पश्चात भी द्वारीखाल ब्लौक को ढांगू ब्लौक कहा  जता था . डबरालस्यूं ढांगू पट्टी में आता  था इसलिए इस क्षेत्र  को आज  भी ढांगू उदयपुर क्षेत्र  ही कहा जाता है .
   मै इस आलेख में केवल  ढांगू पट्टियों की ही चर्चा करूंगा .
   अधिकतर आम लोग समझते हैं कि पंवार वंशी राजा से पहले गढ़वाल में केवल 52 गढ़ थे . डा डबराल के अनुसार 100 से अधिक गढ़ रहे होंगे .
   ढांगू में भी कुछ स्थलों के नाम गढ़ से हैं जो इस बात  के द्योतक हैं  कि ढांगू  में भी छोटी छोटी ठकुराइयां रही  होंगी .
                              ढांगगढ़
     ढांगू गढ़ या ढांगगढ़ का गढवाल इतिहास में एक अभिनव स्थान है और ढांगू गढ़ की  डा डबराल सरीखे इतिहासकारों से  भी अवहेलना हुयी . जब जब गढवाल पर हरिद्वार से आक्रमण हुआ होगा तो ढांगू के रजा या जमींदार ने ही आक्रमण रोका होगा . ढांगू गढ़ गंगा किनारे झैड़ गाँव में महादेव चट्टी के पास है . टिहरी गढ़वाल के सिंगटाली के ठीक सामने एक दुर्गम पहाड़ी को ढांगगढ़ कहते है .
    झैड़ व आसपास ढांगू गढ़ के बारे में कई लोककथाएँ जीवित हैं . कहा जाता है इस दुर्गम पहाड़ी पर राजा के जर जेवरात हैं .
        डा डबराल  बताते है कि तैमुर लंग ने सोने की चिड़िया गढवाल को लूटने हरिद्वार से  चंडीघाट पार किया और  गढवाल में प्रवेश किया  तो शिवपुरी या फूलचट्टी  के पास गंगा किनारे , गढ़ राजा ने तैमुर सेना पर पत्थरों की वर्षा की और तैमूर लंग को भारत छोड़ भागना पड़ा था . वह राजा कोई नही , वह राजा श्रीनगर का राजा नही अपितु  ढांगू गढ़ का ही राजा या गढ़पति रहा होगा .
      फिर नाककटी रानी के समय शाहजहाँ भी गढवाल पर कब्जा करना चाहता था . उसका सेनापति सेना लेकर चंडघाट के रास्ते शिवपुरी आया और वहां भी उसे तीरों व पत्थरों  का सामना करना पड़ा और सेनापति को हिंवळ नदी होते हुए नजीबाबाद भागना पड़ा . तो वह  पत्थर बरसवाने वाला जमींदार कोई नही बल्कि ढांगू गढ़ का जमींदार  ही रहा होगा ..
       मैंने एक लेख में सिद्ध किया कि मोहमद बिन तुगलक भी ढांगू गढ़ तक ही पंहुचा होगा http://bedupako.com/blog/2014/03/15/did-muhammad-bin-tughluq-army-capture-dhang-garh-of-dhangu-in-1330/#axzz4xEwGfPsZ
                        नौगढ़
  नौ गढ़ बड़ेथ (मल्ला  ढांगू ) क्षेत्र में एक पहाड़ी में  प्राचीन जसपुर (आज ग्वील ) के पास है . आज  कहीं भी नौ गढ़ों का पता नहीं चलता क्योंकि 1000 सालों में भौगोलिक  परिवर्तन तो हुए ही होंगे . यह गढ़ बिछ्ला  ढांगू व मल्ला ढांगू के मध्य है (पहले बिछ्ला  ढांगू था ही नही ) और इसके ठीक नीचे रिंगाळ पानी का स्रोत्र  भी है . जो इस बात  का द्योतक है कि कभी ना कभी यहाँ ठकुराई  थी . नौगढ़ नाम  से ऐसा  लगता है  कि 9 किले और नौ गढ़ से यह अर्थ भी निकलता है नव याने नया गढ़ . क्या पहले सारे ढांगू क्षेत्र का राजा ढांगूगढ़ का राजा था / और फिर किसी राजा  ने बड़ेथ क्षेत्र में एक नई गड़ी का निर्माण किया ? या ढांगू  गढ़पती ने अपनी गढ़ी बदले और नई गढ़ी को राजधानी बनाया ? इसे गुत्थी को तो इतिहासकार  ही हल कर सकते हैं


                     गढ़कोट या गटकोट
   गटकोट या गढ़कोट मल्ला ढांगू में मंडळ गधेरे के ऊपर है और तीन तरफ से गदन से घिरा क्षेत्र है .
 यहाँ अवश्य ही कोई किला या गढ़ी रही होगी अन्यथा इसका नाम गटकोट नही पड़ता , गटकोट ढांगू , डबराल स्यूं , उदयपुर , अजमेर क्षेत्र के मध्य है तो राजनैतिक रणनीति के हिसाब से अवश्य ही यहाँ कोई गढ़पति रहा होगा

                       सिरकोट
 सिरकोट तल्ला ढांगू का एक गाँव है जो शिवपुरी से नजदीक है . सिर याने श्री . यहाँ  कब किला बना और उसका किल्लेदार या जमींदार कौन था इसकी तह में जाने की आवश्यकता है .

                              गड़बड़ेथ
 उदयपुर पट्टी में गड़बडेथ हिंवल किनारे गटकोट मित्रग्राम क्षेत्र  (कहते हैं मित्रग्राम पहले गटकोट का ही हिस्सा था ) के ठीक सामने याने हिंवळ पार  का एक राजपूतों का गाँव है . क्या यहाँ कोई गड़ी थी ? गटकोट व गड़बड़ेथ का संबंध जानेंगे   तो कुछ इतिहास मिलेगा .
  @आलेख इतिहास लेख नही है

Rope Bridges in British Garhwal

 British Administration in Garhwal   -210
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -230
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            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -1064
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                              By: Bhishma Kukreti (History Student)
   In Garhwal kingdom and even in British period or even after independence, there were following methods for crossing deep rivers.
     In Shrinagar and places as  Banghat, people used small boat or ‘Dunda’ for crossing rivers. ‘Dunda’ makers used to make ‘Dunda’ either by digging big tree stem and making wide and deep hole for space or by attaching wood plates with each other. ‘Dunda’ were always dangerous as there was fear of Dunda slipping by river waves or heavy weight.
     In other places, for crossing Ganga, people used to cross river by Khaladu (made by animal skin) or Tumri.
  People used heavy long pine sleeper for crossing Small River.
   ‘Sanga’ was a kind of wood bridges on rivers. At narrow place, bridges were made by wood sleepers or logs.
     Jhula was another type of bridge or river crossing medium. Tow long grass ropes were fit on trees on both sides of river. The difference two ropes used to be two feet. A swing was hung on two grass ropes. People used to cross by standing on swing.
        Another type of Rope Bridge was weird rope bridge ‘Chhinka’. There used to be only one grass rope fit on trees on both sides of river. A basket was hung on rope and with a rope was tied below basket. People used to sit on basket. The crosser used to pull the rope ties below basket towards his side.
 In British period, administration started making iron rope Way Bridge and bridges.

References  
1-Shiv Prasad Dabral ‘Charan’, Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 343-456
2- Atkinson, Himalayan Districts Vol.2,
2 A- Trail Sketch of Kumaon, Asiatic Researches
3-Pau, Garhwal settlement
4- Becket, Garhwal Settlement Report
Xx
Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India,bjkukreti@gmail.com 2/11/2017
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -1065
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*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
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(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

 History of British Garhwal, History of Devalgarh Garhwal; History of Badhan Garhwal; History of Barasyun Garhwal; History of Chandpur Garhwal; History of Chaundkot Garhwal; History of  Gangasalan Garhwal;  History of Mallasalan Garhwal;  History of Tallasaln Garhwal; History of Dashauli Garhwal; History of Nagpur Garhwal; Society  in British Garhwal. History of British Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith in Chamoli Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith of Pauri Garhwal ,  Social and Culture History of Rudraprayag Garhwal

Road Constructions in British Garhwal

British Administration in Garhwal   -209
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -229
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            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -1063
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                              By: Bhishma Kukreti (History Student)
    Before British rule started, there was no much difference between roads of pilgrim roads and two village’s roads. It was difficult two loaded horses crossing each other in any road. it was difficult two marriage processions crossing each other.
       Garhwal Kings and Gorkha rulers never knew the social befitting works. The villagers constructed their roads as per geographical needs. Otherwise roads were made by regular human and domestic animals walks and not made by man.
       Gorkha constructed a narrow road from Kali River to Alaknand River. A narrow road was constructed from Nalapani to Nahan by Gorkha administration.
         British started first by constructing army raod from Bhamori Ghate, Brahmadeu to Almora and Pithoragarh. The road from Brahmadeu was connected to Lahughat. There was travelling on those roads for whole year and loaded animals could cross each other. British administration constructed another commercial road from plains to Dhikuli to Kumaon in 1828.
    In Garhwal, there was no plan for road construction till 1828.
       Trail started road construction from Haridwar to Badrinath in 1827-1828. Trail did not take help from any engineer for planning. Trail himself used to supervise the works. it is said that Trail used to cut or dig stone when there was steep stone hurdle. He used to go for marking on steep hill with the help of roped basket. Trail used to sit in roped  basket and helpers used to take rope and he used to jump here and there for marking. Trail travelled from Badrinath to Kedarnath for road survey.
    Trail also discovered a road from Kumaon to Mansarovar. Church officials criticized Trail for that he was promoting idol worshipping.
   By 1834, Haridwar –Badrinath road was completed. animals and men could cross each other on that road. By 1835, government constructed roads from Rudraprayag to Kedarnath, Ukhimath to Chamoli, Chandpur to Kumaon via Lobha. Kumaon was connected to Ruhelkhand. So Ruhelkhand was connected to Badrinath via Kumaon. The length of such roads was 300 miles and cost was Rs. 25000.Sadavrat tax was used on road construction.
    The successors of Trail kept road construction works alive. Workers completed road construction from Joshimath to Neeti in 1840. There was road from Shrinagar to Almora and Shrinagar to Kotdwara to Nazibabad by 1841.
References  
1-Shiv Prasad Dabral ‘Charan’, Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 343-456
2- Atkinson, Himalayan Districts Vol.2,
2 A- Trail Sketch of Kumaon, Asiatic Researches
3-Pau, Garhwal settlement
4- Becket, Garhwal Settlement Report
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Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India,bjkukreti@gmail.com 1/11/2017 Xx
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -1065
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*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
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(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

 History of British Garhwal, History of Devalgarh Garhwal; History of Badhan Garhwal; History of Barasyun Garhwal; History of Chandpur Garhwal; History of Chaundkot Garhwal; History of  Gangasalan Garhwal;  History of Mallasalan Garhwal;  History of Tallasaln Garhwal; History of Dashauli Garhwal; History of Nagpur Garhwal; Society  in British Garhwal. History of British Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith in Chamoli Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith of Pauri Garhwal ,  Social and Culture History of Rudraprayag Garhwal