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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, November 17, 2014

हरिद्वार में पाषाण युगीन जीवन

 Human Life Style in Stone Age of Haridwar
                                                      हरिद्वार में पाषाण युगीन जीवन 

                                        हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 3  

                                                 History of Haridwar Part -3 

                              
                                                  इतिहास विद्यार्थी : भीष्म कुकरेती

   हरिद्वार समेत उत्तराखंड का आदि मानव आखेट व उँछ वृति से अपना जीवन निर्वाह करता था।  हरिद्वार के आदि मानव के भोजन में पशु -पक्षियों का मांश व मछलियाँ एवं शहद का स्थान सर्वोपरि था।  वनैलै  फल फूल व कंदमूल भी आदि मानव के भोज्य पदार्थ थे। 
      नर्मदा घाटी का आदि पाषाण युगीन मानव घोड़े , भैंसों , हाथी व हिपोटैमस का मांश भक्षण करता था. 
उस काल में हरिद्वार , हिमालय की कम ऊँची घाटियों व पंजाब से नेपाल की घाटियों में उपरोक्त पशुओं के अवशेष  नही मिले हैं। 
किन्तु शिवालिक श्रेणी के भाभर क्षेत्र , गढ़वाल, हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर में मिटटी की ऊपरी दो परतों (कॉन्ग्लोमरेट , बालुज शिलाओं ) में भारी मात्रा में छोटे बड़े पशुओं के फोजिल्स मिले हैं।  इन पशुओं और नर्मदा घाटी के पाषाण कालीन पशुओं में समानता थी. अतः यह निश्चित है कि हरिद्वार में पाषाण कालीन मानव इन्ही पशुओं का आहार करता था। 
   हरिद्वार से दो सौ मील नीति द्वार  में (15000 फुट ऊंचाई ) उपरोक्त  पशुओं के अवशेष भी मिले हैं।  इसका अर्थ है कि लाखों साल पहले नीतिद्वार व हरिद्वार क्षेत्र की ऊंचाई में अधिक अंतर नही था। 
  पाषाण युगीन आदि मानव हरिद्वार , बिजनौर , भाभर , सहारनपुर आदि जगहों में छोटी छोटी टोलियों में घुमन्तु जीवन व्यतीत करता था व शिकार हेतु इधर से उधर भटकता रहता था।  जलाशयों के निकटवर्ती स्थानो में खुली जगहों व सुरक्षित जगहों में रहता था वह टीलों या वृक्षों में रात व्यतीत करता था. शीतकालीन व वारिश में आदि कालीन, अस्थायी  झोपड़ियों में रहता था।  
हरिद्वार , बिजनौर , उत्तराखंड का आदि मानव भी अपने मृतकों को वन या नदियों में फेंक देता था।  जिनकी वृक्षों से गिरकर , जंगली जानवरों से अकाल मृत्यु होती थी उन्हें वह मानव वैसे  ही छोड़ देता था। 
अब तक हरिद्वार के आदि पाषाण युगीन मानव के अस्थि  मिलने से उस कालीन उपकरणों के आधार पर ही आदि मानव के जीवन शैली निर्धारित की जाती है।  




Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 15/11/2014 
History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 4      
 
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers) 
                   संदर्भ 
१- डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास भाग - 2 
२- पिगॉट - प्री हिस्टोरिक इंडिया पृष्ठ - २२
३- नेविल , 1909 सहारनपुर गजेटियर 
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