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Thursday, November 20, 2014

धातु युग में हरिद्वार -1

 धातु युग  में हरिद्वार -1  

                                  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 6   

                                                      History of Haridwar Part -6  

                              
                                                  इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

  उत्तर प्रस्तर और खनिज पदार्थों के धातु युग को सीधा बांटना कठिन है क्योंकि आज भी प्रस्तर युगीन उपकरण मनुष्य प्रयोग करता है। धातु उपकरण संस्कृति भी अन्य संस्कृतियों की तरह धीरे धीरे प्रसारित हुयी। धातु युग को  प्राचीन युग समाप्ति नाम भी दिया जाता है। 
धातु युग का प्रारंभ 5000 -4500 BC माना जाता है। 
 मिश्र और मेसोपोटामिया में  धातु उपकरण युग शुरू  होकर एक हजार सालों में यूरोप के एजियन सागर -अनटोलिया तक व पूर्व में ईरान के पठारों तक प्रसारित हो गया।  
 धातु युग को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता यही 
१- ताम्र -कांस्य उपकरण युग 
२- लौह युग
                                                ताम्र -कांस्य युग 
     इतिहासकार ताम्र और कांस्य युग को अलग अलग युगों में बांटते 
 युग व कांस्य युग के ठठेरों का सम्मान भगवान के बराबर था। धातुकारों को शक्तिसमपन माना जाता था कि कांस्य निर्माता इस तरह बर्बर मानव समाज में भी बस गए। प्रत्येक गाँव में तमोटे (ताम्रकार ) को बसाना आवश्यक हो गया था। 
 उत्तर प्रस्तर युग कृषि  पशुपालन से जो समृद्धि आई उसका उपयोग धातु उपकरण अन्वेषण में सही प्रकार से होने से और भी  समृद्धि आई।  मानव नदी घाटियों व कृषि योग्य जमीन बसने लगा और कुछ कुछ जंगल से बाहर बसने लगा। अभ्यता का विकास याने जंगल पर निर्भरता कम होना। 
इस युग की प्रमुख विशेषताए -
आवास 
भोजन सामग्री की प्रचुरता और भोजन सामग्री में शाकाहारी भोजन की अधिकता 
  इस युग में नदी किनारे नगर बस्ने लगे और वित्शालकाय भवनो व मंदिरों का निर्माण शुरू हो गया। विशालकाय भवनों , मंदिरों को बनाने हितु मजदूर, दास , कारीगर , शिल्पकार जंगलों या गाँवों से नगरों की ओर आने लगे और इस तरह गांवों से शहरों की ओर पलायन का प्रारम्भ भी इसी काल में हुआ। 
दक्षिण -पश्चिम एशिया , उत्तर पश्चिम एशिया में कई सभ्यताओं ने जन्म लिया जिनमें भारत व मिश्र  प्रमुख क्षेत्र हैं। 
पश्चिम में शक्तिशाली राज्यों की स्थापना हुयी और व्यापार को प्रसर मिला।  कई व्यापारिक केंद्र खुले।  कई परिवहन माध्यमों ने जन्म लिया। साहसी व्यापारी समुद्र से भी व्यापार संलग्न हो गए। स्थलीय , समुद्री मार्गों से अफ्रीका , एशिया यूरोप के मध्य संचार शुरू  हो गया। एक क्षेत्र के निवासी दूसरे क्षेत्र पर निर्भर होने लगे। 
  नगरों की समृद्धि एवं व्यापार वृद्धि संग्रह जनित अहम को साथ में लायी और लूटपाट , छापे , डाकजनि , युद्ध आम हो गए।  दासव्यापार ने अति  विकास किया। 
मध्य ताम्र युग  मनुष्य ने अश्व को परिपूर्ण ढंग से साध लिया और घोड़ा परिवहन साधन  मुख्य अंग बना गया और कई क्षेत्रों में मनुष्य का घोड़े पर निर्भरता आज भी कम नही हुयी। परिवहन में वेग आ गया। 
अश्वरोहण से युद्ध में तीब्रता ,  एक सभ्यता द्वारा दूसरी  सभ्यता को रौंदना भी प्रारम्भ हुआ।  
अश्वारोहियों द्वारा मेसोपोटामिसा को उजाड़ा गया।  हिक्सो सभ्यता ने मिश्र को और नासिली भाषियों ने अन्तोलिया सभ्यता का नाश किया।  इसी युग में ईरान से घुमन्तु अश्वारोही लोग भारत की और बढ़े। 
 ताम्र कल्प में नगर -गाँव बसने लगे थे और नियम भी बनने लगे थे व प्रशासनिक प्रबंध शास्त्र की नींव भी इसी युग में सही माने में नींव पड़ी। नगर प्रशासन के कारण सामंतशाही की भी नींव ताम्रयुग में पड़ी। दासता सभ्यताओं का अंग बन गया था। दास प्रथा व भाड़े के सैनिकों का प्रयोग सामान्य संस्कृति बन चला था।  अट्टालिकाओं को बनाने के लिए दास प्रयोग होने लगे।  कला पक्ष व वैज्ञानिक अन्वेषण भी विकसित होने लगा था।  कलाकार व वैज्ञानिकों की समाज में समान बढ़ गया था। 
  ताम्र उपकरण युग में धार्मिक , सामाजिक , सांस्कृतिक परम्पराओं की नींव पड़ी और कई परम्पराएँ तो बहुत से क्षेत्र में आज भी विद्यमान हैं. भारत में शवदाह परम्परा इसी युग की देन है। 


           
Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 18 /11/2014 
History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 7        

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers) 
                   संदर्भ 
१- डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास भाग - 2 
२- पिगॉट - प्री हिस्टोरिक इंडिया पृष्ठ - २२
३- नेविल , 1909 सहारनपुर गजेटियर 
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