Proto- Australoid Race in Context History of Haridwar -1
कोल , मुंड , शवर जाति और हरिद्वार का इतिहास -1
कृषि विकास
उपकरण
कोल , मुंड , शवर जाति ने झोपडी बनाकर गांवों में बसना शुरू किया और मिटटी , पत्थर , लकड़ी , घास फूस से कई उपकरणों का अन्वेषण भी किया। धनुष बाण , कुदाल फावड़े आदि का पुरानतम रूप के उपकरणों कोल , मुंड , शवर जाति की देन है। बाण, लकुट , लगुड , लिंग , लौड़ा शब्द भी शायद कोल , मुंड , शवर जातिकी शब्दावली से आये हैं।
कामयाबी
सामाजिक प्रथाएं
Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India 25 /11/2014
Racial Elements in Haridwar Population of Prehistoric Period -4
हरिद्वार की नृशस शाखाएं -एक ऐतिहासिक विवेचन -4
हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -13
हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -13
History of Haridwar Part --13
इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
हट्टन के मुताबिक़ कोल , मुंड , शवर जाति या Proto- Australoid Race मध्य एशिया याने पेलिस्टाइन से पश्चिम भारत में आई और भारत में छा गयी। भारत में उत्तर प्रस्तर उपकरण संस्कृति विकास -प्रसारण का श्रेय कोल , मुंड , शवर जाति या Proto- Australoid Race दिया जाता है।
आज भी भारत में कोल मुंड -शवर जाति की तलछट मिलती है। मुंड -कोल भाषा का प्रसार व आज भी कई भाषाओं पर इस भाषा प्रभाव इस बात का द्योतक है कि कोल -मुंड -शवर जाति का प्रसार अफगानिस्तान से हिन्दचीन , इंडोनेसिया तथा प्रशांत सागर द्वीपों में हुआ था।
कोल , मुंड , शवर जाति की शारीरिक विशेषतायें
प्राचीन साहित्य में कोल , मुंड , शवर जाति का नाम मिलता है। वर्तमान समय में भी मध्य भारत व कुछ क्षेत्रों में दक्षिण भारत जाति मिलती है। द्रविड़ जाति के प्रसार से पहले इस जाति का आगमन व प्रसार हुआ। कोल , मुंड , शवर जाति की विशेषताओं में घुंघराले बाल , पर्याप्त दाढ़ी -मूछें , कम चौड़ा सिर , चपटी नाक , जबड़ों में अधिक झुकाव , गहरा कथई रंग , अपेक्षाकृत नाटा कद हैं। कोल , मुंड , शवर जाति के बाल नीग्रिटो की तरह ऊनी नही थे।
कोल , मुंड , शवर जाति का उत्तराखंड में आगमन
प्राचीन काल में कोल , मुंड , शवर जाति का प्रसार सारे भारत में हुआ। किन्तु द्रविड़ आदि नृशस शाखाओं के दबाब से ये जातियां हिमालय के भीतरी भागों व मध्य भारत सीमित होती गयीं। यह अनुमान लगाना कठिन है कि कोल , मुंड , शवर जाति ने कब हरिद्वार , सहारनपुर और उत्तराखंड की पहाड़ियों में प्रवेश किया होगा। किरात जाति के प्रादुर्भाव के कारण व पश्चिम से खस जाति के आगमन के बाद कोल जाति निर्जन , दुर्गम घाटियों की ओर बस्ने लगीं।
गढ़वाल , भाभर में कोल भाषा के शब्द गांवों के नामों जैसे अमगडी , गडोला आदि , नदियों के नामों जैसे बड़गाड़ , सलटगाड़ आदि , बर्तनों के नामों (फुल्टा) व ने शब्दों जैसे बुगठ्या , लुठ्या , बिराळि , ढालफोल आदि से निर्णय लिया जाता है कि गढ़वाल में कोल जाति बसी थे और आने वाली नस्लों को अपनी भाषा संम्पदा भी दे गयी।
हरिद्वार , बिजनौर और सहारनपुर में ऐतिहासिक दृष्टि से हर पचास साल या सौ साल में उथल -पुथल होते रहे , अतएव इन क्षेत्रों में गाँवों के प्राचीन नाम, स्थानीय भाषा में कोल भाषा के शब्द अक्षुण नही रख पाये। किन्तु कोल जाति का विकास हरिद्वार , सहारनपुर और बिजनौर क्षेत्रों में वैसा ही हुआ जैसे गढ़वाल -कुमाऊं में हुआ।
कोल , मुंड , शवर जाति द्वारा उत्तर प्रस्तर संस्कृति का विकास हुआ। इसी जाति ने उत्तर भारत में प्रारम्भिक कृषि की नींव भी डाली। कुदाल की सहायता से छोटी छोटी क्यारियों में सब्जी आदि उगाना भी कोल , मुंड , शवर जाति ने शुरू किया। भारत में कदली , नारिकेल , नीम्बू , जामुन , सेमल को इसी जाति ने अपनाया। कोल , मुंड , शवर जाति ने ही गन्ना उत्पादन सीखा और सीरा , राव , गुड बनाने की विधि ईजाद की।
पशु पालन
कोल , मुंड , शवर जातिने कुछ पशु पक्षियों को पालतू बनाया। इन मनुष्यों ने हठी व घोड़ों को पालतू बनाया। मधुमखियों और मछलियों को अपनाना भी कोल , मुंड , शवर जाति ने प्रारम्भ किया। कोल , मुंड , शवर जाति ने कई पशुओं को जो नाम दिए थे वे नाम भी अभी तक हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर के अतिरिक्त अन्य स्थानो में भी चल रहे हैं जैसे कोलभाषा में चमगादड़ को बादड़ कहते हैं और साधारण हिंदी -गढ़वाली में गादड़ खा जाता हैं। इसी तरह बहुत से पौधों व लताओं का खाद्य रूप में अथवा आर्थिक रूप में उपयोग भी कोल , मुंड , शवर जातिने प्रारम्भ किया।
कोल , मुंड , शवर जातिने कुछ पशु पक्षियों को पालतू बनाया। इन मनुष्यों ने हठी व घोड़ों को पालतू बनाया। मधुमखियों और मछलियों को अपनाना भी कोल , मुंड , शवर जाति ने प्रारम्भ किया। कोल , मुंड , शवर जाति ने कई पशुओं को जो नाम दिए थे वे नाम भी अभी तक हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर के अतिरिक्त अन्य स्थानो में भी चल रहे हैं जैसे कोलभाषा में चमगादड़ को बादड़ कहते हैं और साधारण हिंदी -गढ़वाली में गादड़ खा जाता हैं। इसी तरह बहुत से पौधों व लताओं का खाद्य रूप में अथवा आर्थिक रूप में उपयोग भी कोल , मुंड , शवर जातिने प्रारम्भ किया।
कोल , मुंड , शवर जाति ने झोपडी बनाकर गांवों में बसना शुरू किया और मिटटी , पत्थर , लकड़ी , घास फूस से कई उपकरणों का अन्वेषण भी किया। धनुष बाण , कुदाल फावड़े आदि का पुरानतम रूप के उपकरणों कोल , मुंड , शवर जाति की देन है। बाण, लकुट , लगुड , लिंग , लौड़ा शब्द भी शायद कोल , मुंड , शवर जातिकी शब्दावली से आये हैं।
कोल , मुंड , शवर जाति ने बीसी /कोडी गिनती की शुरुवात भी की । दिन रात की तिथियों को समझना व अन्य तथ्यों का विवेचन भी इसी जाति ने शुरू किया। पूर्णमासी , अमवस्या , तथा नक्षत्र पुंज हेतु शब्द राका , कुहु , और मातृका जैसे शब्दों की शुरुवात की जो कालांतर में इन शब्दों को संस्कृत भाषा में भी प्रयोग हुआ।
कोल , मुंड , शवर जाति ऊर्जावान व आनंद हेतु अन्वेषण प्रेमी थे। विवाह से पहले प्रेम की शुरुवात करने में विश्वास करते थे। विवाहितों के लिए अलग घर बनाने की प्रथा थी। प्रथम काल मेंकोल , मुंड , शवर जाति मृतकों को पशु पक्षियों से नुचवाती थी और फिर अस्थियों को समाधि में दबाती थी । मृतक की अस्थियों के साथ कतिपय आवश्यक वस्तुएं रखने का रिवाज था।
History of Haridwar to be continued in हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 14
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
संदर्भ
१- डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास भाग - 2
Proto- Australoid Race in Context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Laksar, Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Sultanpur, Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; Proto- Australoid Race in Context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Bijnor; Proto- Australoid Race in Context History of Nazibabad , Proto- Australoid Race in Context History of Saharanpur
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