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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, December 13, 2013

पर्यटकों अथवा ग्राहकों की मानसिकता , आवश्यकता और इच्छा

 Understanding of Psychology , Needs and Desire of Tourists or Customers 


(Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series--12  )

                                    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 12 
                                                    लेखक : भीष्म कुकरेती                              
                                                 (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

                  ग्राहक को समझना प्रत्येक व्यापार का एक अभिन्न अंग है 

 व्यापार या विचार प्रसारण में ग्राह्य से अधिक ग्राहक को समझना आवश्यक होता है। 
ग्राहक को समझने के लिए मुख्य कारक (Factors ) निम्न हैं -
१- ग्राहक का भौतिक स्वरुप व मानसिक स्वरुप जानना पर्यटन उद्यमी के लिए आवश्यक होता है। 
२-पर्यटक कहाँ कहाँ विचरित करता है व उसकी ख्याति किन किन स्थानो में है जैसे जानकारी पर्यटन रणनीति बनाने में काम आती है। 
३-पर्यटक का मन , वृद्धि ,अहंकार (गर्व ), चित्त  किस दसा  में विचरित करता है अथवा ग्राहक की मनो दसा , ग्राहक का ज्ञान व निरीक्षण -विश्लेषण करने की ताकत , व पर्यटक किस विन्दु पर गौरवानित करता है या किस विन्दु पर ग्राहक बेइज्जती अनुभव करता की जानकारी पर्यटन व आथित्य उद्यमी को होना आवश्यक है। 
४-ग्राहक का जन्म लेने की स्थिति -शैली की जानकारी बहुत से पर्यटन -आथित्य उद्यमों के लिए आवश्यक है।
५- ग्राहक पालन -पोषण की स्थिति, स्वास्थय के प्रति पर्यटक की चेतना के बारे में ज्ञान सभी पर्यटन -आतिथ्य व्यापार के लिए एक जरुरी शर्त होती है। 
६-ग्राहक की मृत्यु संबंधी धार्मिक विचार , सोच या दफनाने की शैली, दफनाने के पश्चात् कर्मकांड आदि के  बारे में जानकारी कई पर्यटन -आथित्य -यात्रा उद्योगों के लिए आवश्यक है। फूल चट्टी (तल्ला ढांगू , गंगा तीर ) में पुण्य श्मशान घाट है तो वहाँ के पर्यटन उद्यमियों को कर्मकांड व लोगों की धारणाओं के बारे में ज्ञान आवश्यक है। 
७-पर्यटन -आथित्य विपणन कर्ता को जानना जरूरी है कि ग्राहक किन किन  माध्यमों से ज्ञान व सूचना प्राप्त करता है।  
८- उद्यमी को जानकारी होनी चाहिए कि पर्यटक की आत्मा व जीवात्मा के बारे में क्या क्या धारणायें हैं ? 
९-पर्यटन ब्यापारी को अपने ग्राहक के विभिन्न समय में रूप बदलने की जानकारी होने चाहिए।  जैसे बद्रीनाथ में पर्यटक मंदिर में भक्त के रूप में , नारद कुंड में स्नान के समय , होटल में भोजन के समय , होटल में आराम के वक्त, बजार घूमते हुए अलग अलग रूप में होता है। वही पर्यटक दो मील दूर माणा गांव में अलग रूप में मिल जाएगा। 
१०- ग्राहक अपने प्राण व दूसरे के प्राण बचाने के बारे में क्या क्या मानसिक धारणाये रखता है कि जानकारी के अतिरिक्त खतरे में वह किस भाँती वर्ताव करता है की जानकारी भी पर्यटन उद्यम के लिए लाभदायी होता है। 
११- यात्रा माध्यमों में चलते वक्त पर्यटकों की शारीरिक व मानसिक स्थति होती है का ज्ञान भी पर्यटन उद्यम के लिए आवश्यक है। 
१२- पर्यटन -आथित्य उद्यम में ग्राहक की पौराणिक , धार्मिक , आधुनिक धारणाये किस स्थान पर कैसे परिवर्तित होती हैं की सम्पूर्ण जानकारी पर्यटन -आथित्य उद्यम की रणनीति तय करने में सहायक होती है। 
१३-पर्यटकों के विभिन्न क्रोधों  (शरीर , मन , वृद्धि , अहंकार , गर्व , चित्त या प्राण जनित क्रोध )की जानकारी भी पर्यटन -आथित्य प्रबंध का एक अहम् हिस्सा है। होटल व अन्य सेवा व्यापार में पर्यटकों के विभिन्न क्रोधों की जानकारी काफी महत्वपूर्ण होती है। 
१४-पर्यटकों की ख्याति की जानकारी कई पर्यटन -आथित्य उद्योगों के लिए आवश्यक है। 
१५-पर्यटकों का सौम्य स्वभाव की भी जानकारी पर्यटन उद्योग का एक अंग है। 
१६-पर्यटन आतिथ्य उद्योग में नक्षत्र ज्ञान व पर्यटकों का नक्षत्रों  के प्रति धारणाओं का समुचित ज्ञान आवश्यक हैं ।  
१७-पर्यटकों द्वारा नवग्रहों के बारे में की धारणाएं , धार्मिक मान्यताएं कई पर्यटन रणनीति तय करती हैं। 
१८- पर्यटकों के पारम्परिक विद्याध्यन के माध्यमों की जानकारी भी पर्यटन हेतु रणनीति तय करने में सहायक होती हैं। 
१९ - जलवायु परिवर्तन में पर्यटकों का व्यवहार तो मौसमी पर्यटन -आतिथ्य उद्यमों को जन्म देता ही है। 
२०- -पर्यटक का भूतकाल , वर्तमान व भविष्य अवश्य ही पर्यटन -आथित्य विपणन की मुख्य नीतियां स्पष्ट करता हैं। 
२१--पर्यटकों की समृद्धि -सम्पन्नता , आदि पर्यटन माध्यमों में बदलाव लाते है। पर्यटकों का आय साधनकी जानकारी इसी श्रेणी में आता है। 
२२- पर्यटकों का पर्यटक स्थल के भौगौलिक स्थिति के बारे में मानसिकता , धारणाएं, मान्यताएं  आदि पर्यटन उद्यम रणनीति को प्रभावित करती हैं। 
२३-पर्यटकों की भाषा सबंधी  ज्ञान पर्यटक उद्यमियों को होना चाहिए। 
२४-पर्यटक के तर्क , कुतर्क , विशेष तर्क , विशेस ज्ञान भी पर्यटन को करते हैं। 
२५-पर्यटक के पारिवारिक , सामजिक , सांस्कृतिक मान्यताएं पर्यटन -आतिथ्य प्रबंधन को प्रभावित करते हैं। खान पान इसी क्रम का एक भाग है। 
२६-पर्यटकों की  मूल जाती , वर्तमान जाती , जाती विषयक धारणाएं सभी धार्मिक पर्यटन को प्रभावित करती हैं। इसी तरह पर्यटकों का रहने का स्थान की जानकारी अवश्य ही एक आवश्यकता है। 
२७-पर्यटकों का ध्वनि प्रेम (गीत संगीत ) का पर्यटन विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। 
२८-पर्यटकों का आनद व आनंद लेने के ढंग व मान्यताओं  की जानकारी  पर्यटन उद्योग के लिए आवश्यक जानकारी होती है। 
२९- पर्यटकों के लिए सूचना -प्रसारण के माध्यमों की भी जानकारी पर्यटन उद्यम के लिए अति महत्वपूर्ण है। 
३०-पर्यटकों का  आराम , कठिन परिस्थिति, सहन  शक्ति संबंधी मान्यताएं पर्यटन -आथित्य उद्यम की  कई रणनीतियों को प्रभावित करता है। 
३१-पर्यटकों की यादगार संबंधी धारणाओं का ज्ञान पर्यटन -आतिथ्य प्रबंधन के लिए महवपूर्ण है। 
३२-पर्यटकों की  विभिन्न कला , कौशल , ज्ञान के प्रति प्रेम , अभिरुचि , चाहत या अरुचि से पर्यटन उद्यम प्रभावित होता है। 
३३- पर्यटकों के आधुनिकीकरण का पर्यटन पर अत्यंत प्रभाव पड़ता है। 
३४- पर्यटकों की पर्यटन स्थल की राजनैतिक स्थिति के बारे में सही ज्ञान व भ्रांतियां पर्यटन व आथित्य प्रबंधन को प्रभावित करता है। 
३५-पर्यटक की आवश्यकता , चाहत ,इच्छा की जानकारी तो पर्यटन उद्यम का अभिन्न अंग है। 
३६- पर्यटक किन अन्य प्रतियोगी पर्यटक स्थलों को पसंद करता है या नापसंद करता है की जानकारी भी पर्यटन उद्यम में जरूरी है। 
३७- पर्यटन उद्यम के विकास में पर्यटक का पर्यटन से क्या मुख्य उदेस्य  हासिल होता है की मानसिकता की जानकारी का सर्वप्रथम स्थान है। इसके अतिरिक्त पर्यटक का पर्यटक स्थलों के बारे में क्या मानसिकता व धारणाओं की जानकारी भी पर्यटन -आतिथ्य विपणन कर्ताओं को होनी ही चाहिए।

Copyright @ Bhishma Kukreti 10 /12/2013

Contact ID bckukreti@gmail.com

Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वारा , गढ़वाल


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