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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, July 14, 2015

वींकुण प्रेमपत्र

हंसोड्या कवि --हरीश जुयाल कुट्ज 
सुण ले सुनिता म्यारा हाल,
ऐडा़णू छौं तेरी खुद मा
जनकि चौंर्या स्याळ
प्यार का सरसु  घबळाणा छन
रात्यों रात्यों तड़काणा छन
तेरी याद मा धध्वडा़ लगैकी
खरसण्या ह्वैग्या खाल.....
रूंदा रूंदा आंखा सूजा
गल्वड़्यों प्वड़गिन नौ सौ मूंजा
यूं मूंजौं फर परेस कना खुण
अंगरा कैरि सकि लाल.....
त्यारा खातिर सर्या फुकेग्यों
गिंडकू से अब फिंडकू रैग्यों
लोग भग्यान डेग धैरिकै
मीमा उज्याणा दाळ......
माया कि सर्दी मा दंग बण्यूं छौं
प्रेम श्वास मा सीटी मन्नू छौं
तेरी ज्वनी कू टैम्प्रैचर मा
तचिगै म्यारु कपाळ.....
जै दिन तेरी मुखड़ी देखी
जनकि सौला ल मुंगरी देखी
स्याण्यों का सुलकंत्या छटकै कि
मि भम्म मन्नू छौ फाळ....
तू छै मेरी दिल की प्यारी
प्यारी प्यारी हे मतवारी
तू छै मेरी हैरी मन्था
तू छै म्यारु पिंगळू घाम
तू छै मेरी बिक्स की डब्बी
मी छौं त्यारू झंडूबाम
तू छै मेरी मुलैम तौलिया
मी छौं त्यारू नाक फुंजणा कू
कड़कुड़ू रुमाल
मीखुणै तू चिट्ठी भेजी
चिट्ठी, मिट्ठी मिट्ठी भेजी
हर आखर मा चास भ्वरीं ह्वा
छुयों कु रस मा खूब भिजीं ह्वा
जैं चिट्ठी तैं चाटि चाटि कै
बणिजौं मिट्ठु जुयाळ 
Copyright @ Harish Juyal , Garhwal , 2015