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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, April 8, 2013

परीक्षा --एक ननि कथा


 डॉ नरेन्द्र गौनियाल
धनसिंह सौकार यीं बात मा टेंसन करदू छौ कि तीन नौना छन।कै तै कख भ्यजूं। एकदिन वैन ऊंकि परीक्षा  लीणे सोचि।रस्वड़ा का भितर एक ठ्वपरा मा एक दर्जन क्याल़ा धैरिकि सबसे पैलि ठुलू नौनु तै भेजिकि बोलि कि जा भितर क्याल़ा धर्याँ छन।एक क्याल़ा  खैले।ऊ भितर गै अर एक क्याल़ा खैकि छिल्का वै ठ्वपरा मा ही धैरि दे।सौकार भितर जैकि सब देखिकि ऐगे। फिर दुसरो नौनु तै भेजि।वै तै बि बोलि कि भितर जैकि एक क्याल़ा खैले।ऊ भितर गै अर वैन  एक का जगा तीन क्याल़ा खै दीं।द्वी छिल्का भितर ही लुकै दीं अर एक छिल्का भैर ल्याकि बुबाजी तै दिखैकि खैति दे। सबसे बाद मा निकणसू नौनु तै भितर भेजि।ऊ बिचारो बिन क्याल़ा खयां ही भैर ऐगे अर बोलि कि मिन त नि द्याखा क्याल़ा।कख धर्याँ छन?

        बस सौकार जी कि परीक्षा पूरी ह्वैगे।वैन सबसे ठुलो नौनु तै दुकानदार बणे दे।इनु सोचिकि कि दुकान मा बैठिकि  हिसाब लगैकि खै  ल्यालु।बीच वल़ो बदमाश च।इनु सोचिकि वैतै नेतागिरि मा भेजि दे।अर तिसरो निकणसू,निकज्जू,निखट्टू नौनु तै सरकरि नौकरी पर लगै दे।