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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, April 24, 2013

बिरजु दा

भीष्म कुकरेती (s = आधी अ )
 बिरजु दा तैं तुम बि जणदा छंवां किलैकि तुमर गां मा बिरजु दाs च अर तख बिरजु दाक नाम दुसर  च।
भौत सि तबै जवान आजै बुडड़ि आज बि अपणो मन इ मन मा बिरजु दा तैं  गौळि दींदन बल मि तै यु बिरजु भगाणो लीग  बि छौ पण स्यु बिरजु   बिचि मा भाजिक वापस ऐ गे छौ। वो अलग बात च कि यूं बिरजु दा  कि प्रेमिकाओंन कबि नि ख्वाज कि बिरजु दा भजौड़ा किलै ह्वाइ? 

  बिरजु दा तैं वैको नौन्याळ, लौडू ब्वारि अर नाती गाळी दींदन, " बुबान/ददान हमकुण कुछ नि कार।"
उन त बिरजु दा तै गाळी गां वळ बि दींदन बल तैन परधान ह्वेक बि गां त छ्वाड़ो अफकुण बि कुछ नि कार।
एक दें तै बिरजु दा तैं पंच बि बणै छौ अर तब बि तैन सब्युं गाळि खै छौ बल स्यु बीचिमा भाजि गे।
बिरजु दा हरेक काम बिचि मा छोड़ि भाज जांदु।

भौत सा बगत अपण ठाकुरूं मुंगरी बूंद दें हौळ छोड़ि भाजि जांदो छौ अर खुज्यावो तो भंगल्यड़ भंगुल पींद पकड़े जांद छौ।
अणसाळम कै ठाकुरों बंदळ पऴयांद बिरजु दा भाजि जांद छौ अर खुज्याणो जावो त कम पाणि गदन माछ मारदो पकड़े जांदु छौ।
बिरजु  दा कि गौळि इन छे कि वैक गीत सुणिक मड़घट कि चिता मांगक मुरिं बुडड़ि बि उठिक बिरजु दाक गीत सुणण बिसे जांद छ्या।
बिरजु दा की जुल्फि इन छे कि फिल्मों हीरो बि शरमै जावन अर यूं जुल्फि तैं जब ल्वार बिरजु दा झटकांद छौ त सरयूळु  बेटि ब्वार्युं जिकुड़ि बि कांप जान्दि छे अर बामिण्यु   सुपिन्यु  मा बिरजु हरिजन कृष्ण बौणिक आंदो छौ।
 बिरजु दा कि जुल्फि अर गौळि चक्कर मा गौंकि चारेक ब्वारि वैक दगड़ भाजि बि छन  . पण गौंकि सरहद पार करदा हि बिरजु दा गौं जिना भाजिक ऐ जावों अर भजण वाळि अपण सि मुख लेकि वापस ऐ जान्दि छे। इन बुल्दन बल भौत सि  बुडड़ि बि बिरजु दा पर फिदा ह्वेक बिरजु दा दगड़ भाजणो तयार रौन्दि छे पण फिर ज्यू  मारि दॆन्दि छे कि तै निर्भागि बिरजु न आज तलक क्वी बि काम पुरो कबि नि कार। अदा काम मांगन काम छोड़ि भाजण बिरजु दा कि प्रकृति मा छौ, भाजण बिरजुक  फितरत मा छे । मजाक इ मजाक  मा गौंकि बिठों नौनि -ब्वारि बि बुल्दि छे बल जरूर बिरजु हगद दै बि अदा मा इ भाजि जांदो होलु!  
जी हां बीच काम मांगन भगण बिरजु दा कि प्रकृति च।
पण कैन पता बि नि लगाइ कि बिरजु दा इथगा बड़ो भजौड़ा या  पलायनवादि किलै ह्वाइ?
 बिरजु दा जनम सैंतालीस से पैलाक च।

तब दस सालुक रै होलु बिरजु दा। शिल्पकार ख्वाळ चखळा-पखळि  मचिं छे , बड़ो उलार -उत्साह छौ, हरेक शिल्पकार क्या बुड्या क्या जवान , क्या पांच सालै नौनि क्या सौ सालै बुडड़ि सबि पुळयाणा छ्या , पुलकित होणा छ्या कि आज दुफरा बिटेन सौब अछूत शिल्पकार बिठ याने सवर्ण ह्वे जाला किलैकि आज सब शिल्पकार आर्य समाजी ढंग से जंद्यौ पैरल। जनि दुफरा  मा शिल्प्कारोंन जंद्यौ पैरण शुरू कार कि अचाणचक    दुसर गौंका  बिठों झुंड का  झुंड ऐन अर वूनं शिल्पकारो तैं खूब पीट ,   जंद्यौ  लूठिन अर सौब जंद्यौ गुज्यर फेंकि देनि। कै भीम जन बलशाली शिल्पकारूम  इथगा  तागत नि छे कि सरैल से कमजोर बिठों विरोध करी साकन। दस वर्षौ बिरजु दान पैल दै उरायुं काम अदा मा छुड़द  द्याख।   

फिर आयि एक आंधी अर सब शिल्पकारों तै लग कि अबै दै त शिल्पकार बिठों गणत मा आइ जाला।
गौं का एक शिल्पकार नौनौ ब्यौ  छौ। बारा सालौ बिरजु दा बि बरात मा छौ सरा शिल्पकार ख्वाळ शिल्पकार खुसि मा बौऴयाणा छया बल आज शिल्पकार बर पैलि बार पालकी मा बैठिक जालो पण बरात जनि गां से भैर आयि नी कि बिठों कि भौत बड़ी सेना आयि अर पालकी तैं तोडिक वीं पर आग लगैक चलि गे। जौं शिल्पकारोन विरोध कार वूं तैं बिठुन पीटि पाटिक भेळ जोग करी दे।  शरीर से  तागतवर शिल्पकार बिठु से हार गे छा।

बिरजु दान फिर से अदा काम का बाद शिल्पकारों  भजण द्याख। बारा साल को बिरजु दान शिल्पकारुं  डौर से उपजीं पलायनवादी प्रकृति द्याख अर हमेशा कुणि पलायनवादी ह्वे ग्यायि। बस तब से बिरजु दा भजौड़ा प्रकृति को ह्वे गे।     

Copyright @ Bhishma Kukreti  25/4/2013