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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, April 17, 2013

कुहासा एकदिन खुद ब खुद छंट जायेगा


सब्र करो एकदिन जरूर जालिम जहन्नुम में जायेगा .
 रावण की लंका ढहने में भी तो बड़ा वक्त लगा था .
  किसी का हक़ मारकर ये कबतक पेट भरेगा .
   खुदा के दर पे देर हो सकती है पर अंधेर नहीं .
  जुल्म की तारीफ तो होती रहेगी तबतक .
   हलक में एक  घूँट पड़ती रहेगी जबतक .
   उछलने दो इन्हें ये बरसात के मेंढक हैं .
  दो घाम पड़ते ही सब काफूर हो जायेंगे .
  फ़िक्र न करो ये दस्तूर है दुनिया का .
  कुछ दर्द तो सहन करना ही पड़ेगा .
   जुल्मी के  गले में ये खराश ना मामूली है .
    समझ लो बस उल्टी गिनती शुरू हो गई .
    जुल्म  ख़तम होगा जुल्मी भी ख़तम होगा . 
    सुकून का नया सवेरा एकदिन जरूर आयेगा .
       पतझड़ हटेगी फिर  बसंत  भी आयेगा .
      कुहासा एकदिन खुद ब खुद छंट जायेगा . 

Narendra Gauniyal