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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Wednesday, April 10, 2013

सोळवीं सदी मा गढ़वाळम ढोल -दमौ बजाण पर बबंडर -बखेड़ा

  सांस्कृतिक विचार विमर्श पर एक लघु नाटक 
      
                                              भीष्म कुकरेती 



समय -सन 1582 , बैसाख 
 जसपुर गां -कुकरेतीयूं मूल गाँव (मल्ला ढांगू), ऋषिकेश से बीसेक मील पूर्व मा अर कोटद्वार से पैंतीस-चालीस  मील पश्चिम मा    
बड़ेथ गां -जसपुर से एक मील दूर बड़थ्वालुं मूल गां 
डाबर -जसपुर से आठ दस  मील दूर डबराल स्यूं  डबरालुं मूल गां  
 नैथाणा -जसपुर से अठरा उनीस मील दूर नैथाण्यु मूल गां 
  कठुड -कुकरेतीयुं बसयुं जसपुर से तीन मील दूर को गां    
[(अन्य गां -हथनूड़-कुठार (जसपुर से पांच छै मील दूर, बन्नी (जसपुर से द्वीएक मील दूर ), ढौंर -ढासी( कठुड़ से तीन मील दूर , जूड्ड - जसपुर से आठेक मील दूर डबरालस्यूं का गाँव )] 
जसदेव कुकरेती (जसपुर को )- अछा त मेरी बेटी ब्यावक  सौब इंतजाम पूरो ह्वे ग्याइ कि ना?
पुरुषोत्तम कुकरेती (कठुड़ ) भैजि ! इंतजाम तो ठीक च पण मै लगद नैथाणा बिटेन आण वाळ उ क्या बुल्दन ढोल अर दमाऊ या नगाड़ा पर ल्वै-खतरी (खून का बहना ) को डौर च।  क्षेत्र का राजपूत अर आदि जाति ढोल-दमाऊ बजण त राइ दूर ढोल-दमाऊ तैं इना आण इ नि दीण चाणा छ्न।
जसदेव कुकरेती - भुला पुरुषोत्तम ! इकै काम एक दें। पैल ब्यावो इन्तजामौ ठीक से छाण निराळ , निरीक्षण आदि करि लीन्दवां   फिर ढोल अर दमाऊ या नगाड़ा की परेशानी से निबटणो बात होलि तैबर तलक  मनियारस्यूं बिटेन थपलियाल पंडी जि बि ऐ जाला। हां जी हथनुड़ -कुठारो थोकदार जी क्या इंतजाम ह्वे भै? 
 हथनूड़-कुठार कु थोकदार- बामण जी ! तुमन द्वी  साल  पैल पौणु सीणो खातिर   मंदर बणाणो बोलि छौ त दस मंदर मादे सात मंदर  पौंछि गेन अर तीन मंदर आज भोळ पौंछि जाला। 
जसदेव कुकरेती -अर खाणो बणाणो बान मृतिका पात्रों क्या हाल छन।
 हथनूड़-कुठार कु थोकदार- माटो भांड बि -- तीन मृतिका तौलि, पांचेक हिसर, दाळ पकाणो माटौ  बंठा, पाणि बान घौड़, माटौ पयळ (गहरी थाली ). कुछ कुल्हड़ सौब ऐ गेन। अर मृतिका पात्रों संट्वर मा हमन पत्थरूं पयळ बि पैडुळस्युं बिटेन मंगैन।        
 जसदेव कुकरेती -अर मृतिका  चासणि?
 हथनूड़-कुठार कु थोकदार- माटौ चासणी अर काठौ खरोऴया आर डाडू बि इख ऐ गेन। पण बामण जी पुरुषोत्तम बामण जी ठीकि बुलणा छन।  हमर जिनां का खस्या अर राजपूत जजमान बि तुमर बेटी ब्यौ मा नैथाणा की बरात मा  मुस्ल्टों बाजा क बातों से खफा छन। हमर क्षेत्र मा बि खून खराबा की बात होणि च। अब हम तैं तो तुमारो आदि पुरषोंक बासायुं च तो हम तो तुमर दगड़ छंवां पण बकै ....?   
 जसदेव कुकरेती- थोकदार! चिंता तो मी तैं बि च पण वेद  रीति च बल  बाड़ी  इकदड़ि नि खाए जांद। इकै गोळी करिक खाए जांद। पैल ब्यावो इन्तजामौ निस्तार करे जावो तो ! अछा ! भुला ! अम्बा दत्त ! इन कौर हथनूड़-कुठार कु थोकदार जी तै क्यार जिना को बौण दे दे। 
 हथनूड़-कुठार कु थोकदार- जुगराज रयां बामण जी।
  जसदेव कुकरेती- अर पौणु ठैरणो क्या इंतजाम च भै  म्याथा, टटरि का जजमानो?   
 म्याथा क जजमान - बामण जी ! हम टटरि , म्याथा अर खरीक का लोगुंन नया नया पल्ल बणैक  तुमारि चौड़ी खांडीम सारि   आलीन।
  जसदेव कुकरेती- बढ़िया! भुला रघुबर दत्त तू टटरि , म्याथा अर खरीक को हिसाब रखदी तो हिसाब से कुछ जंगळ द्वी चार सालों कुण  यूं लोगुं तैं दे दी।
रघुबर दत्त कुकरेती (जसपुर )   - जी भैजि।
  जसदेव कुकरेती- हां त बन्नी का नेगी जी तुम ब्वालो! पता च ना कि बरात इख पांच दिन ठैरलि अर खांण पीणो इंतजाम पूरो हूण  चयेंद। समदी पुरिया नैथाणी जीक कुटुंब क छन।  
बन्नी का नेगी  - जी हम बन्नी -खेंडुडि वाळुन  तैडू, कणमणो लीसो, जंगली पिंडाळु जलड़, माळु टांटी आदि सब जमा करिक चौड़ी खांडीम धौर आल। अर बरात ठैरणो दिनों मा रोज बसिंगो टीपिक बि लै औंला। पण ढोल पर ऐतराज हमर जिना बि होणु च।
 जसदेव कुकरेती- भलो भलो !  शीस राम देखि लि बन्नी खेंडुडि वाळु  कुण बी कुछ जगा द्वी  सालो कुण दे दी 
 शीस राम कुकरेती (जसपुर ) -जी भैजि 
जसदेव कुकरेती- पुरुषोत्तम ! उ कमळ पौंछि गेन कि ना?
पुरुषोत्तम कुकरेती - हाँ भैजि ! फूल चट्टी , माळा  बिजनी वाळु तैं द्वी जंगळ पांच सालौ बान करणों देंन तो ऊन एक नाव बणाइ अर गंगा पार  (टिहरी गढवाल ) वाळुन  नाव को एवज मा कम्बल देन।
जसदेव कुकरेती- बकै पूरी बान ग्युं आटु अर द्वी जीमणो बान चौंळु प्रबंध हुयुं इ च। दाळ अर खीरा अपण खेतों  का छें च। ढाकर से अर मर्छ्यों से लूण गुड, तेल अर कर्मकान्डो समान क प्रबंध ह्वेइ गे। पाणि आदि बान छ्वटि बड़ी काठौ परोठी बि छें छन।
 रघुबर दत्त कुकरेती- जी भैजि।
जसदेव कुकरेती- ये ल्यावो मनियारस्युं बिटेन पंडित थपलियाल जी बि पौंछि गेन। ऊंकुण पल्ल अर खटला मा दिसाणो प्रबंध त छें इ च ! आवो पंडी जी प्रणाम।
थपलियाल पंडी जी-ये जी क्या करणा छाँ ? मि त रिश्ता मा तुमर भणजो लगद। मेरि ब्वै बरसुडी कुकरेतण जि ह्वे।
अम्बा दत्त -पण अबा दें तुम हमर काम मा पंडिताई करणों अयाँ छंवां।
जसदेव कुकरेती- ये ल्यावो डाबर बिटेन पंडित सदा नन्द जी बि पौंछि गेन। 
पंडित सदानंद डबराल - प्रणाम। 
सबि कुकरेती भै -प्रणाम! अब क्या करां तुमर बैणि हमर भायुंम अर हमर बैणि तुमर भायोंम। रिश्ता लगौवां तों क्या लगौवां। 
जसदेव कुकरेती - हां पुरुषोत्तम अब बोल नैथाणा की  बरातम   ढोल बजण  से खून खराबा किलै अंदेशा च?
पुरुषोत्तम कुकरेती -अब यो तो सब्युं तैं पता ह्वे गे कि तुमर बेटीक ब्यौ नैथाण़ा क पुरिया नैथाणी जीक क नाति दगड होणु च अर सरा क्षेत्र का राजपूत जाति जन कि ढौंर -ढाशि का बिष्ट अर सबि नेगी लोग अर सरा क्षेत्र का शिल्पकार  गर्व महसूस करणा छन बल पुरिया नैथाणी का कुटुंबम हमारी अडगैं (क्षेत्र )की बेटी जाणि च।
रघुबर दत्त कुकरेती (जसपुर ) - हां इख तलक कि डबराल स्यूं का डबराल लोग बि  खुस छन। उना का बिष्ट बि खुस  छन। इख तलक कि उदयपुर पट्टी का  रिगड्वाळु  ( रिषी अड्डा वाळ ) बि रैबार ऐ छौ कि या बड़ी गर्व की बात च कि ढांगू वाळु  रिश्ता पुरिया नैथाणि नाती दगड़ होणु च।
पंडित सदानंद डबराल -हां ! कुकरेती या डबरालुं रिश्ता नैथाण्यूं दगड़ तों होंदी रौंद पण जो मनिख शिरीनगर राजा को राजदूत बौणि मुग़ल दरबारम गे ह्वावो अर हरद्वार को  जजिया डांड (कर ) ख़तम करै ऐ ह्वावो। इन सिरमौरी मनिखौ नाति अडगैं को  जंवै ह्वावो तो सरा क्षेत्र वास्युं तैं गर्व होण लाजमी बात च।
पुरुषोत्तम कुकरेती  (कठुड़ ) - डबराल जीजा जी! बात नैथाण्यु क नी च बात च बल नैथाणी लोग ब्यौ मा मुसल्टों (मुसलमानुं) बाजा बजैक आला। अर यां से सरा अडगैं मा कम जाति बामणु . राजपूत , नेगी अर शिल्पकारोंम भंयकर रोष फैल्युं च। कथगा इ ढांगू का नेगी तो ब्यौ म उपद्रव कौरिक कुकरेत्यूं जगा छोडि  उदयपुर या डबराळस्यूं जाणो तैयार छ्न. बिष्ट लोग बि खुंकरी, तलवार का  बल पर बरात मा मुसल्टों  बाजा नि बजण द्याला। 
अम्बादत्त कुकरेती (जसपुर)- हां भैजि लोग ढोल-दमाऊ बजाण पर विद्रोह करणो उतारु छन। बल मुसल्टों बाजा हमारो  सनातन धर्म  तैं ख़तम करणों जरिया च। इ लोग बुलणा छन बल गढ़वाली राजान कुकरेती इलै बसै छ कि इना सनातन धर्म बच्युं रालु अर अब कुकरेती ही सनातन धर्म पर ढोल दमाऊं तैं  परिश्रय देकि खचांग  लगाणा छन।
थपलियाल पंडी जी (मनियार स्यूं )-यी बचन असल मा कैक  छन ? किलैकि जब नैथाणा का नैथाणी   पुरिया नैथाणी जीक बड़ो नाति क ब्यौ मा असवाळस्युं ढोल दमाऊ लेक गे छया तो सनातन धर्म पर ढोल दमाऊं तैं  परिश्रय देकि खचांग लगाणै बात चलि छे।
 रघुबर दत्त कुकरेती (जसपुर )- जी वो बड़ेथ का बड़थ्वाळ सरा ढांगू क्या डबराळस्युं मा जै जैक लोगुं तैं ढोल दमाउ आण पर सनातन धरम खतम हूणों  बात करीक लोगुं तैं भडकाणा छन।
 पंडित सदानंद डबराल -हां! कुमना नन्द जी हमर गां डाबर अर स्यंळ कठुड़ बि ऐ छा इख तलक कि जूड्ड ( डबराल स्यूं ) का बिष्टो म बि गेन कि यी बिष्ट लोग ढांगू का बिष्टो अर नेग्युं तै कठा करिक ब्यौम बिघन डाळन अर सनातन धरम  बचावन।
जसदेव कुकरेती - अरे भै बड़ेथ वाळ अबि बि हम से नाराज छन।
थपलियाल पंडी जी - किलै?
 शीस  राम कुकरेती (जसपुर )- हमर चचेरा  भैजि बृषभ  जी बड़ेथ वाळु बेटी बीच गोर मांगन स्युं गोरुं भगैक जि लै छया।
 थपलियाल पंडी जी (मनियार स्यूं )- पण यीं बात तै कथगा साल ह्वे गेन अब तो बृषभ  जीक वीं नौनी से द्वी बच्चा बि ह्वे गेन। बृषभ जी  कख छन?
शीस राम कुकरेती - अबि तलक बड़ेथ का बड़थ्वाळ ईं बात नि बिसरि सकणा छन। बृषभ   भैजि शिरीनगर राजमहल म  कर जमा करणा जयां छन। ब्यौ से पैलि पोंछि जाला . 
जसदेव कुकरेती - ये अम्बा ! यी बड़ेथ वाळ यीं बात से बि चिरड्या छन कि हम ऊं तैं कै बि कीमत पर खंड अर गडमोळा क बौण नि दीणा छंवां। वो बड़ेथ वाळ सदा नन्द डबराल जी अर थपलियाल पंडी जी बात तैं ना नि करि र सकदन। आज कुमना नन्द जी बड़थ्वाल आणा छन कि ना ?
  पुरुषोत्तम कुकरेती  (कठुड़ ) - हाँ आज ! थ्वडा देरम जुड्ड , ढौंर , ढासी , धारी का बिष्ट अर ख़ास ख़ास नेगी अर शिल्पकार सबि आण वाळ छन।
जसदेव कुकरेती - अछा अछा ! खाण पीणो , रात रौणो  प्रबंध ..
शीस  राम कुकरेती - हाँ जौ पिस्यां छन, झंग्वर कुट्या छन। कुछ जजमान अयेडि खिलणा जयां छन , द्वी एक बुगठ्या बि मारि द्योला। रौणो पल्ल छन अर सबि अपुण दगड़ अपण कमुळ लांदा इ छन।
जसदेव कुकरेती - द्याखो! यूं सब्युं तै ढोल दमाऊ पर ऐतराज तो होलु ही  पण असल मा यी लोग ढोल दमौ क अलावा कुछ हौरि मांग का वास्ता बि लड़ना छन।
अम्बा दत्त - जन कि ?
जसदेव कुकरेती - जन कि  ढौंर , ढासी , धारी का बिष्टों तैं कुछ हौर जंगळ चयाणा छन। बड़ेथ का बडथ्वाळु  तैं   गडम्वळ को बौण चयाणु च। इनि जूड्ड वाळु रिस्तेदारी ढौंर , ढासी , धारी   च तो वो ढौंर , ढासी , धारी वाळु तरफदारी करणा छन।
थपलियाल पंडी जी -  हां या बात  सै च कि लोग बगैर ढोल दमाऊ अवाज सुण्या  ढोल दमाऊ का विरोध करदन अर उना हमारि अडगै मा याने मनियार स्युं , असवालस्यूं , कपोंळस्यूं मा कति ब्यौउं मा  ल्वैखतरी (खून खराबा ) बि ह्वेन. कुछ जगा तो बरात्यु मौणि इ काटे गे छा। एक जगा तो नयार नदी  को पाणि मनिखों ल्वै से लाल तक ह्वे।  पण जादा जगा इ दिखे गे कि राजपूत , बामण अर हौरून  थोकदारों से जंगलात मांगिक शान्ति हूण दे अर  ढोल दमाऊ बजाण दे।
जसदेव - तो ठीक च। चूँकि हम नैथाण्यु ढोल दमाउ बजाणो इच्छा तै नि रोकि सकदां। जौंक खानदान राजा का राजदूत ह्वावन ऊंक दगड़ रिश्तेदारी हूण बड़ी बात च। तो ढोल दमाऊ बजल अर यांक एवज मा ठाकुरों अर जजमानो तैं कुछ जंगळ दिये बि जावन तो क्वी बड़ी बात नी च . हां ! हे रघुबर , अम्बा अर शीस राम एक  बात ध्यान रखां कि जौं जंगळ तैं हम यूं तैं द्यूँला उख पर इ लोग कै बि हिसाब से कबि बि पुंगड़ नि खोदि सकदन।
सबि -जी भैजि             
पुरुषोत्तम कुकरेती  (कठुड़ ) -या ल्याओ  ढौंर , ढासी , धारी का बिष्ट बि सि ऐ गेन  
अम्बा दत्त कुकरेती - अरे वाह क्या बात च जूड्ड का बिष्ट बि ऐ गेन।
बिष्ट - पाय लागुं पंडित लोगुं 
सबि बामण - विजयी भव।
 हथनूड़-कुठार कु थोकदार- ल्या सि ख़ास ख़ास जगा का नेगी लोग अर शिल्पकार बि सि  ऐ गेन 
नेगी लोग -सबि बामणु तै पाय लागुं 
बामण -विजयी भव 
एक नेगी - ल्या सि शिल्पकारों जनता बि ऐ  गेन  
सबि शिल्पकार - समनैन ठाकुरों 
सबि बामण अर राजपूत  -दीर्घायु रावो . नागराजा तुमारो सरैल स्वस्थ राखो।
एक जसपुर को शिल्पकार -अरे  सि द्याखदि ! कुज्याण कथगा सालोंम बड़ेथ का बडथ्वाळ जसपुरम दिख्याणा छन। निथर हम तैं इ दाथि , हुक्का , नाड़ो निसुड़ लेक बड़ेथ जाण पड़दो छौ।
तीन बड़थ्वाळ -डबराल जी, थपलियाल जी प्रणाम।
सदानंद डबराल , थपलियाल - मिंतर लोगो !  (जीजा , जेठू , साले ) नमस्कार, चिरंजीव 
जसदेव कुकरेती -  बड़थ्वाळ लोगो ! डबराल जी अर थपलियाल जीक दगड़ बैठो। भुला को ससुरासी छंवा तो हम सब तुम तैं प्रणाम करदां।
कुमना नन्द बडथ्वाल - हम तुमारो प्रणाम लीणो नि अयां छंवां। वो तो डबराल जी अर थपलियाल जीक रैबार ऐ छौ तो हम इख ..
थपलियाल जी - मिन्तर लोगो भै मि ह्वाइ नैथाण्यु बामण अर इख कुकरेत्यूं बि बामण तो मीन जब सूण बल तुम ये ब्यौ मा बिघन बाधा करण वाळ छंवा तो ...
सबि बड़थ्वाल - अजी जु बरातम मुसल्टों गाजा बाजा ढोल -दमाऊ आई तो बरात बड़ेथखाळ   से उण्ड क्या आलि? बरात्युं तैं सिल्ल पाखौ  भेळ जोग नि कार तो हमर जात बड़थ्वाल नी।
कुछ नेगी , शिल्पकार - हा या मा हम बड़थ्वाळु  दगड़ छंवां। मुसल्टों रीति रिवाज हमर क्षेत्र मा हम  बरदास्त नि कौर सकदां। ब्रह्म हत्या को पाप लगल तो लगी जैन पण हमन ढोल -दमाऊ अपण सारि माँ नि बजण दीण                   
  ढौंर कु बिष्ट - जी हां जसदेव जी ! जब आपका पुरखा इख राजान बसै छया तो खस्याओं से बचाणो बान हम बिष्टो तै बि भेजि छौ। अर राजान हम अर तुम तैं आदेस दे छौ कि ढांगू मा सनातन धर्म अर पंवार बंश की रक्षा ही हम द्वी जात्युं धरम -करम  रालो।
एक नेगी- अर हम नेग्युं  कुण जागदो बद्रीनाथ (राजा ) की आज्ञा छे कि हम नेगी लोग तुमारी सेवा करणा रौंला कि सनातन धर्म बच्युं रावो।
थपलियाल -  तुम मादे कैन ढोल -दमाऊ की आवाज सुणि च?
सबि - न्है जी। यीं अडगैंम पैलि दें ढोल दमाऊं आला?
थपलियाल -  तो फिर इथ्गा मार कटाई की बात किलै?
ढासिक  बिष्ट - पंडी जी मुसल्टों रीती रिवाज अपनाण से सनातन धरम खतम नि होलु?
डबराल - बिष्ट जी आप पर यु अंगरखा अर रेबदार सुलार बडो बिराज दीणु च।
ढासी क बिष्ट - जी वू क्या च म्यार रिश्तेदार छन हरिद्वार जिना का  ऊंन अंगरखा अर रेबदार सुलार  भेंट मा दे।
डबराल - पता च यु पैनावा सफाचट मुसलमानों को च।
ढासिक बिष्ट - पता नी च पण अब तो अंगरखा अर रेबदार सुलार पैरणो   रिवाज च।
थपलियाल - पण अंगरखा अर रेबदार सुलार बि त मुसल्टा रिवाज ही त छौउ 
बिष्ट - पण जब बोल्दां बद्रीनाथन अंगरखा अर रेबदार सुलार पैरण शुरू कार तो हम जनता तै अपनाण इ चयेंद।
थपलियाल - अर ढोल दमाऊ बजणै  शुरुवात बि शिरी नगर को राजमहल अर राज मन्दिर बिटेन ही ह्वे भै।
एक नेगी - न्है न्है . हमन सूण बल ढोल गोरुं खाल से बणद 
डबराल - अर  डौंरू बि त खलड़ से बणद। 
बिष्ट - बखरौ खलड़ 
जसदेव -ह्यां पण मि अपण बेटी ब्यौ मा ढोल दमौ बजाणो डंड भरणो तैयार छौं।
सबि - क्या क्या डंड?
जसदेव - द्याखो ढौंर , ढासी , धारी का लोगुं मांग छे कि ऊंक गांवक तौळो जंगळ दिए जावो। उनि कौंदा वळ तै तौळ गदन चयाणु छौ। फिर गूम घंडालु का नेग्युं तैं बि कुछ बौण चयेणा छा। मि जगळ दीणो तयार छौं पण कै तैं बि पुंगड़ खोदणो इजाजत नि होलि।
परमा नन्द बड़थ्वाल - तुम कथगा बि लोभ द्यायो पण बरात तो  हमारी सारि  ह्वेकि इ आलि अर हमन ढोल दमाऊ अपण सारि मा नि आणि दीण।
अम्बादात -परमा नन्द जी ! मेरी दिली इच्छा छ कि तुम मेरो समदी बौणि जावो। मेरि बेटी अन्गीकार  कारो अर मि दहेज मा दूर तलक का खंड अर गडमोळा  सारि तुम तै अबी दे दींदा।
थपलियाल - मेरी समज मा यां से बड़ो डंड कैन नि भौर ह्वालो। जावो थ्वड़ा देर आपस मा विचार विमर्श करिक आवो। 
(सबि अलग अलग जुंटा (झुंड ) मा जांदन अर फिर सूब आंदन )
परमा नन्द बडथ्वाल - डंड तो स्वीकार च पण ढोल -दमाऊ की आवाज सुणिक ही हम सुनिश्चित करला कि क्षेत्र मा ढोल दमाऊ बजण चयेंद कि ना।
थपलियाल - यांकी जमानत मी दींदो कि ढोल दमाऊ की आवाज से सरा गाँव नि नाचल  तो मेरो नाम स्वयम्बर दत्त थपलियाल नी च।
जसदेव  कुकरेती- अच्छा सूणो नयार तक बरात को जिमा त नैथाण्यु की च। फिर नयार नदी  पार करणों बाद बरात की जुमेदारी हम लोगुं च। एक रात बरात ठांगर   ठैरलि। तो सब लोग अपण अपण जुमेदारी ल्याओ कि नयार नदीक किनारा मरोड़ा से ठांगर अर फिर ठांगर से सिलोगी डांडो अर सिलोगी से जसपुर तलक बरात को साथ कु कु राला। ढोल दमाऊ का विरोध नि होण चयेंद। मनियार स्यूं का लोगु बीच ढांगू वाळु  नाक नि  कटण चयेंद। 
साबि - ठीक च हम सौब अपण काम बांटी लींदा। थपलियाल जी ! जु  जरा बि  ढोल दमाऊ की आवाज बेकार होलि तो हम ब्रह्म हत्या करणों तयार छैं इ छंवा।

थपलियाल - मी बेटी सौं घटिक बोल्दु।
एक बिष्ट - मेरि राय च कि बरात की रक्षा वास्ता दगड़म खुंकरी , तलवार बि रखण जरूरी च 
डबराल -  हां बात सै च कुछ लोगुम वै बगत तलवार अर खुकरी रखण मुनासिब च 
वी बिष्ट - तो ठीक च नायर नदी छल से इख तलक नैथाण्यु  बरात का दगड़ हम बीस पचीस लोग खुंकरी अर तलवार लेकि चलला    
जसदेव -भलो भलो . अच्छा तो  पांच गति बरात  ठांगर पौंछलि अर छै गति जसपुर ..
सबि -ठीक च 
xxxxxx xxxxx 
छै गति स्याम दें जसपुरम --
जसदेव - अरे सि ग्वील बि अछलेण बिसे गे पण बरात को अता पता नी च। कुज्याण ढोल दमाऊ को कारण से क्वी अणभरवस, क्वी अपजस  तो नि ह्वे गे। हे ग्विल्ल ! हे नागराजा सब काम ठीक ह्वे जैन। जु सब काम सुफल हवे जावो तो मि पंच पंच बुगठ्या चढौल।
बृषभ कुकरेती - भैजि मीन तुमकुण बोलि बि छौ कि मरोड़ा न्यार नदिक छाल  से बरात की रक्षा मि करुल। 
जसदेव कुकरेती - भुला बृषभ ! यो क्वी जंगळ रक्षा के लडै नी च। सामाजिक अर सांस्कृतिक बदलाव को बगत समाज मा उथल पुथल होंदी ही च अर इन मा विरोध्यु तै ही रक्षा की जुमेवारी दीण न्यायसंगत अर तर्क संगत होंद।
थपलियाल - जसदेव जी ऊ तुमारो हलकारो याने दूत को नाम क्या च छमण जी वो बि त नी ऐन जब कि छमण जी तै आदेस छौ कि कुछ इना उना ह्वावो तो तैं तैं सूचना भेजी द्यावो।
जसदेव - वांकि त फिकर हुंई च कि अबि तलक छमण काक सूचना लेकि नि आई कि बरात को क्या हाल च।
पुरुषोत्तम - ल्या स्यु छमण काका  बि दौड़ दौड़िक आणो च अर सि रिख्वा दाक मुख पर खून ही खून ?
जसदेव - हे ग्विल्ल ! हे नागराजा ! 
जसदेव - क्या ये छमण काका तीन त दुफरा मा सूचना लेक आण छौ अर सि रिख्वा डा को मुख पर ....?
छमण- ह्यां दुफरा तलक तो 
जसदेव - अरे बरात नि आई ?
  छमण- बरात तो आज नि ऐ सकदी
जसदेव- कनों कुछ अणभरवस ?
 छमण- नै नै इन कुछ नी च।
थपलियाल - हैं ?
छमण- हां जी उख ठांगरम  ब्याळि  घाम अछल्याण म जु ढोल दमाऊ बजण शुरू ह्वाइ तो सरा इना उना का गावों से लोग उज्यळ बाळिक ठांगर ऐन अर सरा रात ढोल  दमौ का ताल पर नाचणा रैन.
जसदेव - ह्या पण बरातन त आज दिन मा पौंछण छौ ?
छमण- हाँ पण ब्यौ तो नितरस्यूं च। उख क्या ह्वावि कि सरा क्षेत्र का लोगुंन नैथाण्यु से मिन्नत कार बल आज दिन अर रात  ढोल दमाऊ बजण चएंदन अर सब्युं इच्छा नाचणौ च। नैथाणी लोगुंन बात  मानि तो बरात अब भोळ ही आलि। रात सबि लोग ढोल दमाऊ क ताल  पर नाचल।
जसदेव- हे परमेश्वर ! इ सौब त्यार  आशीर्वाद च कि ढोल दमाऊ बजण  पर मेरि बेटि ब्यौ मा क्वी खून खराबा नि ह्वे। अर तै रिख्वा क मुख पर खून ?
  छमण- ओ रिख्वा तैं अतड्या लग तो मुख ही छिले गे 
जस्द्देव - हे भगवान सब ठीकि हूणु च। अरे जरा बन्नी का संग्राम नेगी तै ब्वालो कि आज खुसि मा रात भर डौंर थाळि बजाण  भोळ बिटेन तो ढोल दमाऊ बजल।                                              
                                   
      (इस लेख या नाटक में पात्र , समय ,स्थान,  जातिया सभी काल्पनिक हैं )