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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, June 9, 2017

इन जिन्दगी त मी नि चैणी

जैंई जिन्दगी मा
रस, छंद, अलंकार न हो,
जैंई जिन्दगी मा
अपणी भाषा,
अपणी संस्कृति,
अपणा रीत रिवाज न हो,
पैरणा खुण जख
दुफड़की ट्वपली, काळी फतगी
गात न हो,
खाणा कु जख कोदू, झगोरू
छंच्य भात न हो,
जैंई जिन्दगी मा नचणा कू
ढोल, दमौं मसका बाज न हो
दान बुड्यों की कछड़ी मा
जख हुक्का साज न हो,
न भुलों न, कतै न
इन जिन्दगी त मी नि चैणी।।