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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, June 8, 2017

रात - दिन च्हैल - प्हैल हुयीं छ

Poem  - Dharmendra Negi 
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रात - दिन च्हैल - प्हैल हुयीं छ
ब्यखुनि-फज़ल दैल-फैल हुयीं छ
वs भग्यान मैत जयीं जैदिन बिटि
चिन्ता-फिकर कुटदर तैल हुयीं छ
बिन खयां टस से मस नि होन्दी
य गैत भि सरकरि फैल हुयीं छ
वु हमतैं खैंचणा,हम वूंतैं ठ्यलणा
य गरस्थी जुआ अर हैळ हुयीं छ
बगैर वूंका यु सरैल खाली ख्यपटण
दगड़ि जन बैटरी अर मुबैल हुयीं छ
संगता उठणु-बैठणु ,चलणु-फिरणु
जिन्दगी जन घाम अर छैल हुयीं छ
त्वे पर भि त ऐगेनि सिंग रै 'खुदेड़'
तेरी आत्मा भि जन गंडेळ हुयीं छ
सर्वाधिकार सुरक्षित -:
धर्मेन्द्र नेगी 'खुदेड़'
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Thanking You with regards

B.C.Kukreti