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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, June 22, 2017

गौं कित्गा बदलेगे

Garhwali verse by Satish Rawat 
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अब तऽ गौंऊँ मा भि व बात नि रैगे, 
पैलि जन भै-भयात व मनख्यात नि रैगे.

उपरि-उपरि-सि दिखेणा छन लोग-बाग, 
नै जमऽनै सका-सैर्यूंऽ कन औडुळ ऐगे.

माटा मनखीऽ सिक्कि चुप्फा मा धरी छन, 
हिरणू मथी-मथि, माटा से एलर्जी ह्वेगे.

बड़ा मनख्यूँ तैं दिखाणै जरूरत नि पुड़द, 
द्वी कौड़ीऽ अफुतैं धन्नासेठ चितैगे.

अफुतैं भलु बताणौ, करणू औरूँ काट, 
मूर्ख बिना सोच-समझी भकलौंण मा ऐगे.

प्रकृतीऽ प्यारा मनखी क्य ह्वा त्वे तैं, 
मॉडर्न बणणा चक्कर मा बौळ्या ह्वेगे. 

प्रकृति तऽ छ पैलि जन हि स्वाणि, 
मनखी मन म्वासु-सि झणि किलै ह्वेगे.

सुचुदु छा गौं दूर ह्वाला दिखावा से, 
पर अब दिखदु कि गौं कित्गा बदलेगे.

Copyright © सतीश रावत 
12/06/2017