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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, June 8, 2017

ढ्यबर्या सूड़

Garhwali prose by Asis Sundriyal 

अपणी या दुसरि गद्य रचना देहली/ एन.सी.आर मा गढ़वाली साहित्य का प्रचार-प्रसार मा सलग्न अर युवाओं तै प्रेरणा व प्रोत्साहन देंण वळा भैजी " दिनेश ध्यानी" तै समर्पित कनु छौं......
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हमरु गौं स्विट्ज़रलैंड से बि सुन्दर च - बूथा या बात त ब्वळदु छौ पर दगड़म या बात ब्वनु नि भुल्दु छौ की सच मा वेकु स्विट्ज़रलैंड आज तक द्यखयूं बि नी च, यख तक कि फोटो म बि ना। पर हाँ, वो यीं बातै गारंटी देन्दु छौ कि तुम वेकी बात ध्यान से सूणा अर अगर तुमतै एक सेकंड कु बि इन लगलू कि मेरो स्विट्ज़रलैंड नि दिख्युं च त मि अपणु नौ बदल देंलु। शायद इन कसम खाण मा वैतैं सबसे कम रिस्क लगी हो किलैकि रॉकी, जॉकी, टाइगर - फाइगर जना कतने नौ लोग कुकुरू क ले धना छन वो त आखिर मनखी च, कुवि न कुवि नौ त मिलि हि जालु।
बूथा हमेशा ब्वलदु छौ कि हमरु गौं स्विट्ज़रलैंड से कम नि छ "पर " ....... ज्यादातर गौं क मामला मा सब कुछ "पर" फर ऐकी हि अटग जांद। जनोकि, मैंतै गौं मा रैण भल्लू लगद "पर" .... यख नौकरी हि नि छन। जनकि, बुढया-बुढया लोग ब्वळदीं कि हमतैं बूण जाणू बिल्कुल भलु नि लगदु " पर " ....... यख अस्पताल हि नि छन। जनकि कुछ लोग ब्वल्दिन कि हमरि त खूब पौदास छ घर- गौं मा " पर" ...... यख अच्छी स्कूल हि नि छन त नौना पढ़ौणु रैण प्वड़द किराया कि कुठड़ी मा। कुल मिलाकि लोगुं पर "पर" त लगी गेन तबि त स्यो सब गौं- गाळों बटे उड़ि ग्येनी
अब अगर बात बूथा कि गौं कि करै जा त वखा लोग बुल्दन कि हमर गौं मा कुवि कमी नी च "पर" सिरप एक सीधी सड़क हूंण चयेंद गौं तक नथर बिजली पाणी सब कुछ च ये गौं मा। लोगों तै पता छौ कि ये विषय मा अगर कुवि कुछ कारलू त वो बूथा हि च किलैकि गौं की प्रधान "गमली" त कुछ जाणदि नि छै अर वींकू पति "गमला" तीन मैना बटि दून अस्पताल मा प्वड़यूँ छौ। गुर्दा ख़राब ह्वेगे छा बल वेका प्ये-प्येकी। त अब सड़क की सर्या लिखा पैढि को भार बूथा का ब्यूँदौ मा ऐगी। उन बि वो जो दस-बारा साल फौज मा छौ, त क्लर्क ही छौ अर अर्जी ल्याखण अर पढ़ण वेका रोज को काम छौ। पर या बात जरूर छै कि वेन इतगा अर्जी त अपणी सर्या सर्विस का दौरान नि लिखी जतगा यीं सड़क का बान पिछला द्वी तीन मैना म ल्यखीं। ऑफिस का चक्कर कटदा- कटदा झणि वेका कतना जोड़ी का पीटी शूज घिस गेन। पोड़ बटे पाणी निकलण बराबर च कुवि भी सरकरि काम कराणु आजकल।
खैरी त भौत ऐ पर बूथा न धीरज नि ख्वे। कै बार त वो स्वच्दु छौ कि बांजा प्वड़यां यो गौं - वेकी भौं, कबि सड़क नि अयं धौं। पर दगड़म वो यो भी स्वच्दु छौ कि अगर अब वेन सड़की कु काम अद्धा मा छ्वाडु त दुन्यान वेकु ठट्टा लगाण कि बल क्यो पैली पौणे वलु ह्वे अर क्यो अब द्वार नि ख्वनु छै। इलै बूथा गौं का द्वी-चार (किलैकि यां चले जादा लोग अब गौं मा रयाँ भी कख छन) लोगुं तै ल्हेकि विधायक जी का पास ग्ये। विधायक जी न तुरंत सड़क पास कैर दे पर दगड़ मा शर्त बि रखे की ठेका शरतु अर भरतु तैं मिलण चयेंद, द्वी विधायक जी का खासमखास जो छया। बूथा तैं गुस्सा त भारि ऐ पर चलो सड़क बण जावा ता फुका फुण्ड, कौन से हमर खीसा म बटे जाणू च। अर फिर बल म्वरदु क्य नि करदु, इलै वेन चुपचाप नेता जी की हाँ मा हाँ मिले दे। अब फाइल अधिकारियूं का पास पौंछी त वून बूथा की चकरापति करै दे। अर वून यू बिंगाण मा कुवि कमि नि कै कि नेता- मंत्री ज्वी हुईं यख असल राज त हमरू हि चलद। बूथा तैं भै ननि याद ऐ गे फाइल ते एक टेबल बटे हैंकी टेबल तक सरकाण मा। पर झणि वेन इनो क्य मंतर फूकी कि आखिकार वो बिना कीसी गरम करयां सडक़ पास करवाण मा कामयाब ह्वे गिन।
आज बूथा तैं लगणु छौ जनो कि वेन मुंड मा को गर्रु भुयां धैरयाली हो। वो भारी खुश छौ कि वेन जो सोची छौ वो अपणा गौं कु करियाले। सरि ढेबरी मुंड- मांडी, पूछौ दा को नणट-कणट को त वे कतै बि आभास नि छौ। अर यां चुले बड़ी बात त या छै कि नणट - कणट कन वळा वेका अपणा हि गौं क लोग छा, जौंका बान वो इतगा दिन बटे झक मनू छौ। वो आज वूं हि लोगुं कि गाळी खाणू छौ जौंका वास्ता वेन रात दिन , निसिणि-निखणि कै सड़क पास करवे। वेका अपणा घर वळा बि वे तै हि गाळी देणा छा बल हौरि कैर भल- अदमै। हौरि मोर यूं गौं वळू बान। ह्वे न्ह अब अपणु हि ट्वटा अर अपणु ही ठ्ठटा।
बूथा बरमंड फर हाथ लगे स्वचणू कि सरकारि दफ्तर मा त अगर अधिकारी जरा टाळ-मटोळ करदा त वो वूंकी सात पीढीयूं तै बिटिम देन्दु छौ। नेताओं तै बि गाळी देणी सौंगी च, वूंका करम हि यन रन्दन कि गाली त बस्गल्या गदन जनु अफ़वी निकलण लग दिन। वो खार त भौत खाणू छौ पर कुछ बोली नि सकणु छौ, आखिर गाळी बि देंदु त वो भि वे फरे लागणी छै किलैकि छा त सब वेका भाई- बंद अर स्वारा- भारा। वे खुणि तातू दूध ह्वेगी न घुट साक न थूक साक. वो स्वचणू लगि कि या कनि अकळाकण्ठ ऐ बल चढ़णु ल्हे घोड़ी अर उल्टें ब्वकण जी पोड़ी।
बूथा क समज मा नि आणु छौ कि करे जा त क्य करे जा। जब तक या सड़क नि छै त दिन रात देणा रैंदा छा गाळी । पर आज वो अपणे आपस मा मुंड कपाळी कना छन। कुवि अपणा वे पुंगड़ा का बान भिभटाणु जै मा जख्या तक नि जमदू। लोगुं को कुड़ी (जो कि खंद्वार ह्वे गिन) - प्रेम बसगळ्या बादलूँ जनो उमड़ी घुमड़ि कि आणू छौ। कैका पुंगड़ा मा अगर कंडेला कु कांडू भि दबे ग्ये हो त लोग सीधा मुवाहजा की मांग कना। वो भि वो लोग जो हर तरह से सर्व- सम्पन छन। कूण बैठ्यां लोग भी ठूण लेणा कु मौका ढूंढ़ना छा बस!
इना हाल देखिकै बूथा त द्वी दिन म बोल्ये ग्ये। किलैकि यीं ढबर्य सूड़ को कुवि ब्यूंत कुवि उयार वेका समज मा नि आणू छौ।
©आशीष सुंदरियाल