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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, June 8, 2017

"आंसू"

भारी-भरसक कैकि आंख्यूं हैंसाणु 
रौं मि सदनि ।
युं खुदेड़ आंख्यूं  मा आंसु लुकाणु 
रौं मि सदनि॥

आंख्यूं  मा जन दणमण-दणमण 
चौमस्या बरखा,
तरकण्यां गळ्वड़युं का आंसु सुखाणु 
रौं मि सदनि ॥

काज़ोळ आंख्यूं  का छाळा आंसु 
थम्दा-थम्दा,
नै इगसि-बग्वळि तक आंसु  पुर्याणु 
रौं मि सदनि ॥

बस कैर, हैंस्दा-हैंस्दा कखि रुणुं नि
ऐ जाव मिथैं,
रैड़ नि जैं आंसु इलै आंख्यूं झुकाणु 
रौं मि सदनि ॥

मेरि आंख्यूं का पाणि को क्य मोल-
तोल लगांदि,
खाळा-म्याळों मा अपणा आंसु बिकाणु
रौं मि सदनि ॥

स्वीणा बणि कै कभि आला त वो
मेरि आंख्यूं  मा,
ह्यरदा-ह्यरदा अपणा आंसु बुथ्याणु
रौं मि सदनि ॥

त्वै याद करदा-करदा जनि मेरि 
जिकुड़ि स्यळ्याई,
तनि सुख्यां आंसु  मा आग लगाणु
रौं मि सदनि ॥

तेरि खुदेड़ माया की तुलबुल तामि
भोरि-भारिक,
'पयाश' का पुरणा पैंछा आंसु चुकाणु
रौं मि सदनि ॥

@पयाश पोखड़ा ।