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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, August 11, 2015

उत्तराखंड में विकास की इकाई , पूरा परिवार

 -- डॉ. बलबीर सिंह रावत 

विकास की पारम्परिक इकाई परिवार के मुखिया को माना गया है। १९५२-५३ में शुरू सामुदायिक विकास की व्यवस्था में पूरा परिवार , और इसके द्वारा पूरा गांव इकाई की तरह लिया जाता था तो खेती के अलावा स्वास्थ्य , शिक्षा,परिवार कल्याण,स्वच्छ जल, सिंचाई , आवागमन, सामजिक उत्थान के काम एक ही एजेंसी , खंड विकास के कार्मिकों , के द्वारा संचालित होते थे। उस समय, जहां भी लगन के साथ काम हुए ,सामुदायिक विकास और राष्ट्रीय प्रसार के खंड विकास कार्यों से ग्रामीण क्षत्रों की काया पलट होने लगी थी। . कालांतर में इस व्यवस्था के स्वरुप को पुरानी उपनिवेशवादी विकास परिपाटी में परिवर्तित कर के प्रभावहीन बना दिया गया।  जहां खेती से पूरे परिवार का गुजर हो सकता है, वहाँ तो कोई कुछ विशेष कुप्रभाव शायद नजर न आया हो , लेकिन  उत्तराखंड  के पर्वतीय क्षेत्र में , जहां खेती से पूरे परिवार का लालन पालन करना असंभव था, वहाँ  खेती के अलावा उत्पादन के अन्य संसाधन जैसे महिला संचालित पशुपालन, बच्चों और घर के अन्य लोगों द्वारा संचालित कुटीर उद्द्योग, जैसे दूध से घी-मट्ठा बनाना दालों से बड़ियाँ बनाना, ऊनी और स्थानीय रेशो से वस्त्र बनाना,  विभिन्न उपयोगों के लिए रस्सियाँ बंटना , अतिरिक्त सब्जियों को सुखा कर सुक्से बनाना, खेती और घरेलू इस्तेमाल के उपकरण बनाना। भले ही पारिवारिक उपभोग के लिए बनाये जाते थे , लेकिन ये सारे काम होते थे और परिवार और गाँव लगभग आत्म निर्भर थे । 

कल्पना ही कर सकते हैं की अगर विकास के कामों में उपरोक्त सारे कुटीर उद्योगों  के कामों के लिय कच्ची मालों के उत्पादन बढ़ाने के, उनको घर घर के कुटीर उद्द्योगों में एक स्टैण्डर्ड परिस्कृत तरीकों से, आज की पारिवारिक और बाजारीय मांगों के अनुरूप  व्यावसायिक स्तर के उत्पादन सम्भव बनाये जा सकते तो आज पर्वतीय क्षेत्र की स्तिथि कैसी होती ? क्या आज के परिपेक्ष में पर्वतीय उत्तराखंड में दूध, ऊँन, फल, सब्जिया ,ठन्डे इलाको के अनाज, दालें, तिलहन, फूल , रेशे , पेड़, पौधे ,जड़ी बूटिया उगाना , उनसे मूल्य वान उत्पाद कुटीर,  मध्य आकार के उद्योगों में बनाना,  बाहर से आयातित कच्चे माल से वजन में हल्के और मूलयवान एल्क्ट्रोनिक सामान बनाना क्या संभव है कि नहीं ? क्या उत्पादित मालों की बिक्री के लिये पर्यट्न श्रंखला से जुड़ना और देश के बाजारों में  घुसना  और उत्तराखंड के सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र को ऐसे व्यावसायिक गतिविधियों का "मधुमक्खी छत्ता " बनाना  सम्भव है ? मैं मानता हूँ कि है , आप क्या मानते हैं ? अपनी राय  देंगे मेरे इ मेल पर ?

निवेदक : डॉ. बलबीर सिंह रावत, ARS, अवकास प्राप्त प्रमुख वैज्ञानिक , भा कृ अनु प. , सलाहकार गरीब क्रांति अभियान।  e mail : dr.bsrawat28@gmail.com