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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, August 26, 2015

व्यंग्य का तीन अंग

  (व्यंग्य - कला , विज्ञानौ , भावनाऊँ मिऴवाक  : भाग 5    ) 

                         भीष्म कुकरेती 

       व्यंग्य माँ उपदेश अधिक च या कम पर एक बात सत्य च कि व्यंग्य कु काम उपदेश दीण च पर वक्रोक्ति /ट्याड़ु ढंग से अर हंसी मिलैक।  उपदेश का उद्देश्य ही व्यंग्य की रचना च।  निखालिस उपदेश अर व्यंग्य मा अंतर हूंद अर ये विषय पर अग्वाड़ी विमर्श होलु। 
कै बि व्यंग्य का तीन अंग हून्दन -
१- व्यंग्य रचनाकार याने व्यंग्यकार 
२- दर्शक , पाठक या श्रोता  (ग्राहक-प्रेषिती  ) ( याने जैकुण व्यंग्य रचे गे ) 
३- जै पर व्यंग्य कसे जांद।
           ग्राहक /पाठक और व्यंग्यकार इ व्यंग्य घटना का हिस्सा हून्दन।  किन्तु यु जरूरी नी च कि जै पर व्यंग्य करे गे वु व्यंग्य घटना (Satire Event ) मा कुछ देरौ कुण बि शामिल ह्वावो।  जन कि गढ़वळि मा राजनीतिज्ञों पर व्यंग्यात्मक साहित्य रचे तो ग्याइ किंतु शायद ही कै बड़ो राजनीतिज्ञन राजनीतिज्ञों पर कर्युं गढ़वळि व्यंग्य पौढ़ बि हो धौं। 
व्यंग्य पर सबसे बड़ो व्यंग्य या च कि जु  व्यंग्य कु टारगेट च /विषय च वु व्यंग्य की घटना मा शामिल नि हूंद। 
   रचनाकार की रचना तै जब ग्राहक ( दर्शक , पाठक या श्रोता ) आत्मसात करदो तो यु बि जरूरी नी च कि रचनकार व ग्राहक का मध्य क्वी संवाद हो। 
फिर व्यंग्यकार तो विषयी (टारगेट याने जैपर व्यंग्य  करे गे ) दगड़ संवाद स्थापित करणम असमर्थ च तो इखम बि व्यंग्यकार /रचनाकार टारगेट से संवाद नि कारो तो व्यंग्य रचणो उद्देश्य ही समाप्त ह्वे जांदो। उदाहरणार्थ - व्यंग्यकारन लालू यादव कु चारा घोटाला पर गढ़वाली मा व्यंग्य ल्याख , व्यंग्य वीडियो कैसेट बणाइ या कवि सम्मेलन मा कविता सुणाई।  किन्तु लालू यादव तक या रचना पौंछण सर्वथा कठिन च।  इखम रचनाकार और ग्राहक का मध्य कखि ना कखि संवाद च किंतु टारगेट का रचनाकार से , ग्राहक का टारगेट से क्वी संबंध स्थापित नि ह्वे सकद। 
अब यूँ तीन अन्गुं मध्य संवादहीनता की स्थितियों मा व्यंग्यकार का पास विकल्प एकी च कि वैकि रचना ग्राहक का मन मा टारगेट का प्रति गुस्सा , घृणा , वितृष्णा पैदा करण मा सक्षम हो अर यो विकल्प ही व्यंग्यकार का उद्येस्य हूण चयेंद। 
फिर यदि व्यंग्यकार उस्ताद च तो वो इन रचना रचो कि रचना चर्चा मा ऐ जावो और रचना या रचना का मंतव्य टारगेट का पास पंहुच जावो। नरेंद्र सिंह नेगी का गीत ' नौछमी नारेण ' अर कथगा खैलु' सीधा टारगेट (क्रमशः नारायण दत्त तिवारी व डा रमेश पोखरियाल 'निशंक ) का पास पौंछेंनि। द्वी दैं टारगेटन प्रतिक्रियास्वरूप नरेंद्र सिंह नेगी का विरुद्ध कुछ प्रतिक्रियात्मक कदम बि उठैन। इखम नरेंद्र सिंह नेगी का द्वी व्यंग्युंन ग्राहक व टारगेट का साथ कै ना कै रूप याने सीधा या अपरोक्ष मा संवाद स्थापित कार। 
पर नरेंद्र सिंह नेगी अपना आप मा एक महशक्ति च तो नेगी का काम सरल ह्वे गे।  किन्तु प्रत्येक व्यंग्यकार इथगा शक्तिशाली नी च कि वु ग्राहक व टारगेट दुयुं दगड़ संवाद स्थापित कर साको। 
 गढ़वाली साहित्य मामला मा सबसे सरल व सही विकल्प च बल रचनाकार इन रचना रचो कि ग्राहक व्यंग्य विषय की चर्चा का वास्ता कटिबद्ध ह्वे जावो।  यदि ग्राहक व्यंग्य विषय पर जगा जगा चर्चा करण लग जावो तो समझो कि व्यंग्य सफल ह्वे गे। 
अन्तोगत्वा व्यंग्यकार तै ग्राहक (पाठक , श्रोता , दर्शक ) तै ही झकझोरण पोड़द कि ग्राहक टारगेट का प्रति विद्वेष , क्रोध , रोष आदि दिखै साको। 
व्यंग्य तबि गाहक तै झकझोर सकुद जब व्यंग्य विषय और शैली झकासदार हो।
*** भोळ -व्यंग्य अर उपदेश  पर विमर्श होलु 


25/ 8/2015 Copyright @ Bhishma Kukreti

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