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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, August 16, 2015

मेरे दिल में भी ख़याल आते है ऐतवारौ कुण

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                               मेरे दिल में भी ख़याल आते है ऐतवारौ कुण 

                        कुकड़ाण ,   कव्वाक  ककड़ाण, घचकाण      :::   भीष्म कुकरेती 

             ऐतवार माने आराम अर जब अराम हो तो ध्यान भौत सा बतुं पर जांद। तो इनि आज म्यार दिमाग , मगज , बरमंड मा बिगऴयां -बिगऴयां बिचार आणा छन।  भुंदरा बौका सौं इ विचार म्यार अपणा इ छन।     
                  15 अगस्तौ दिन हमर बिल्डिंग मा छत मा झंडारोहण हूंद अर तकरीबन हरेक परिवार से एक तो भाग लींद इ छौ। मी बि अर बिल्डिंगौ बच्चा बि भाग लींद छा। ब्याळि मि फेसबुक मा स्वतंत्रता सिव्स पर सैकड़ों पोस्टित फोटो तैं  Like मा व्यस्त रौं तो मि झंडारोहण मा नि जै सौक।  बाद मा पता चल कि सिर्फ पांच आदिम छतम झंडारोहणो गेन अर वू बि इलैकि ऊँ तै कम्प्यूटर चलाण नि आंद।  कारण यु छौ बल अधिकतर वर्डस्प पर इंडिपेंडेंट डे -इंडिपेंडेंट डे खिलणम व्यस्त छया।  बात बि सै च बल जब हम्म वर्चुवल वर्ल्ड ऐ जावो तो असली संसार की क्या जरूरत ?
             ब्याळि फेसबुक मा ललित मोहन कोटनाला जीन एक बड़ी कामैक खबर दे  कि देहरादून मा घंटाघरम 15 रुप्या मा लंच थाळी मीलली।  शायद चार अदिमुन Like कार होलु।  अब हम अच्छी , कामक , उत्साहवर्धक खबर पसंद करि नि पौंदा।  अब हम तै नेगेटिव खबरूं मा आनंद , रस्याण आंद। 
               इंटरनेट मा श्रद्धेय सर्वोदयी कार्यकर्ता मानसिंह रावत जी तै जमनालाल बजाज पुरूस्कार मील पर दसियों खबर क्लिप ऐन।  सब्युंन वधाई दे।  इथगा दिन ह्वे गेन कैन बि मानसिंह  जीक जीवनी पोस्ट नि कार। हूंद च हूंद च।  प्रचार का युग , प्रोपेगैंडा अरा मा सज्जन आदम्युंक जीवनी नि लिखे जान्दि। 
           कुछ कौंग्रेसी बल हरिद्वारौ सांसद डा रमेश निशंक का घर सोनिया गांधी का झंडा लेक विरोध करणा गेन अर पुंछणा गेन कि -बताओ उत्तराखंड में क्या विकास हो रहा है ?
हाँ सांसदुं तै पुछ्ण जरूरी च।  पर कौंग्रेस्यूं तै सोनिया गांधी अर मनमोहन जी तैं बि पुछण  चयेंद कि 2004 से 2014 तक उत्तराखंड मा कथगा विकास ह्वे ? 
        अच्काल समज मा नि आंद कि विज्ञापन समाचार छन या समाचार विज्ञापन छन।  
         पत्रकारों से पूछे जांद कि अज्काल तुम लोग बेकार बेकार का गुंवण्या -मुतण्या  समाचार पैलो पेज पर दींदा अर कामक समाचार कखि विज्ञापनों बीच दे दींदा।  किलै भै ? पत्रकारुं जबाब हूंद बल जब शीर्षथ नेतृत्व गुंवण्या -मुतण्या ह्वे जावो तो मुख्य कवर पेज का समाचार बिगुंवण्या -मुतण्या ही ह्वाला।  पर नेताओं बुलण च बल अब जब पत्रकार ही गुंवण्या -मुतण्या ह्वाला तो समाचार बि गुंवण्या -मुतण्या ह्वाला।  असल मा पत्रकार 100 % सही छन अर नेता बि 100 % सही छन।  
      अच्काल ढोल -दमाऊ चर्चा मा च कि ढोल दमाऊ उत्तराखंड का राष्ट्रीय वाद्य यंत्र ह्वालो।  हरीश रावत जीन अपण ढोल पिटणो बान इ सै पर सुखद कदम उठाई। 
      भौत सा गढ़वाली -कुमाउनी बिठ, सवर्ण संस्कृति खतम हूणै बात करणा रौंदन।  यि सबि बिठ गढ़वाली -कुमाउँनी संस्कृति खतम हूण पर बाल्टी भरिक आंसू बगांदन।  जब संस्कृति का रचनाकारों याने गढ़वाल -कुमाऊं का शिल्पकारों से मि पुछ्दु कि  संस्कृति बचाओ आंदोलन का बारा मा आप लोगुं क्या ख़याल च ? तो ऊंक जबाब हूंद - भाड़ में जाए आपकी संस्कृति , गुदनड़ जाए ये आपकी संस्कृति ! मतलब तुम सवर्ण चाहते हो कि आपकी संस्कृति बचाने हेतु हम अब भी अछूत ही बने रहे ?
 शिल्पकारुं बात मा दम च बल गढ़वाल -कुमाऊं की संस्कृति बचाणो मतलब जाति प्रथा तै ज़िंदा रखण।  मेरी समज मा संस्कृति जाये भाड़ मा पर जाति प्रथा खतम हूणि चयेंद। 

संस्कृत बचाण पर आपक क्या विचार छन ?



16/8  /15 ,Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।

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