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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, August 11, 2015

गुरा हुयां छन रंगमता, घुगती ह्वैनी गोळ (नव कविता )

हरीश जुयाल 'कुटज '
दुन्या डिगचिंद थड़कूणु , भ्रष्टाचारी गाज ।
कुटकी कळजुग कन कंडे, कनक्वै होला काज ।।
सच की सांग लिजाण मा, पाप बजाणू ढोल ।
गुरा हुयां छन रंगमता, घुगती ह्वैनी गोळ ।।
क्वदड़ौं जमणी बासमती , रज्वड़ौं जामी भांग।
टुटिगे हमरु समाज मा, नैतिकता की टाँग ।।
रामसिंह कू कांध मा, रावण हुयूं सवार ।
गाळी ह्वैनी टकटकी, ट्वटगा बेद बिचार ।।
कुटकी होलु निसाब क्या होलू कब संजोग ।
आश्वासन का जिल्कौं मा, भ्याळौं अडग्यां लोग ।।
गूणी कु घुग्गा बाघ धर्यूं , कुकरा कु घुग्गा स्याळ।
गौलु गुरा थैं स्यवा लगांद, चुसणा चूस जुयाळ ।।
फीती उतरीं नीति की , कळजुग मरणू जोर ।
कृष्ण चराणा भैंसौं तै, कंस चराणा गोर ।।
लोगुं कु दिल मा बबरिगे, कूटनीति कू चोप ।
प्रेम प्यार की बात ह्वैनि, द्यबतौं जसी अलोप ।।
कुटकी = कुटज
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Copyright Harish Juyal Kutaj 2015