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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, May 30, 2017

आचार्य डा शिव प्रसाद डबराल

आचार्य डा शिव प्रसाद डबराल 
मथुरा दत्त मठपाल
आचार्य शिव प्रसाद डबराल का नाम स्मृति में आते ही हमें उत्तराखण्ड के एक इतिहास का स्मरण हो आता है। परन्तु आचार्य मात्र एक इतिहासकार ही नहीं थे। उन्हांेने अपने अध्ययन काल में ही बड़ी मात्रा में कविताओं और वीरतापूर्ण नाटकों की रचना की थी, जो बाद में ‘महर्षि मालवीय इतिहास परिषद्’ के माध्यम से प्रकाशित हुई थीं। अपने गृह-प्रदेश में आकर उनका ध्यान उन लोगों की ओर गया जो अपने बेहद कष्टपूर्ण भूगोल से जूझते हुए जीवनयापन कर रहे थे। सरहदी क्षेत्र में निवास करने वाली भोटान्तिक जाति का उन्होंने गहराई से अध्ययन किया। इसी विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनके परीक्षकों ने इस थीसिस की खूब तारीफ की। आगे चलकर उनकी थीसिस तीन भागों में छपी। इनमें सीमान्त में निवास करने वाली जनजातियों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। सन् 1960 में उनके पहले महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘श्री उत्तराखण्ड यात्रा दर्शन’ का प्रकाशन हुआ, जो विद्वानांे द्वारा प्रशंसित हुआ। नवम्बर 1948 ईं में डीएबी इण्टर काॅलेज दोगड्डा के प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्ति से नवम्बर 1999 में अपनी मृत्युपर्यन्त डाॅ. डबराल का पाँच दशाब्दियों का काल पूर्ण रूप से विभिन्न प्रकार के सारस्वत आयोजनांे में बीता था। विद्यालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने के बाद उन्हें जितना अवकाश मिला, उन्हांेने उस पूरे समय का एक-एक क्षण साहित्य रचना करन,े उत्तराखण्ड के इतिहास के लेखक उत्तराखण्ड में महत्तवपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों के अन्वेषण उत्खनन, गढ़वाली लोक-साहित्य के संकलन और डेढ़ दर्जन से अधिक रचनाओं की विस्तृत भूमिका लेखन-सम्पादन और प्रायः बीस हजार पृष्ठों के अपने कार्य के प्रकाशन-वितरण बड़ी संख्या में पत्र-पत्रिकाओं में आलेख लेखन जैसे कार्यों में लगाया। सन् 1935 ई. में मेरठ काॅलेज से बीए करने के प्रायः दस साल बाद उन्हंे महामना मदन मोहन मालवीय की संस्तुति पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बीटी में प्रवेश मिला। इसी अवधि में महामना ने उन्हंे उत्तराखण्ड के इतिहास भूगोल पर गहराई से कार्य करने का परामर्श दिया था, जिसका उन्हांेने आजन्म पालन किया। मेरे इस आलेख का विषय आयार्च प्रवर द्वारा लोक-साहिल के पुनरुद्धार हेतु किये गये कार्य से सम्बन्धित है। अस्तु डा. डबराल ने लोका-साहित्य सम्बन्धी कोई डेढ़ दर्जन से अधिक रचनाआंे को दुर्लभ काव्यमाला के अन्तर्गत सन् 1993 से 1996 के बीच पुनर्प्रकाशित करवाया। इनमें से अधिकांश तो सन् 1993 से ई0 में प्रकाशित करवाई गई थी। अप्राप्य हो चुकीं इस प्रकार की पुस्तिकाओं को खोज निकालना एक दुष्कर कार्य था। इन रचनाओं को निम्नलिखित वर्गों में रखा जा सकता है।
(1) पहले वर्ग में गढ़वाली नाटक आते हैं। पण्डित भवानी दत्त थपलियाल गढ़वाली नाटककारों के अग्रदूत थे। उन्होंने ’’जय-विजय’ नामक नाटक लिखा-जो अब अप्राप्त है। उनका बड़ा नाटक ’प्रहलाद-नाटक’ गढ़वाली भाषा का दूसरा नाटक हैं। इसमें नृसिंह अवतार की कथा दी गई है। इससे सम्बन्धित तीन नाटकों का भी थपलियाल जी ने लेखन किया, ’फौजदार जी की कछड़ी’, ‘कलिजुग्यानन्द की पाठशाला’ और ‘बाबा जी की कपाल क्रिया’। वस्तुतः तीनांे नाटकांे के विषय और वस्तु क्रमशः हिरणाकश्यप के राजकाल में कानून की स्थिति पढ़ाई की स्थिति और समाज में माता पिता की स्थिति हैं। ये नाटक अनेक दशाब्दियों बाद विस्तृत भूमिकाओं के साथ आचार्य जी द्वारा पुनर्प्रकाशित किये गये। पाँखु नामक नाटिका का भी प्रकाशन किया गया ।
(2) दूसरे वर्ग में पं. तोता कृष्ण गैरोला की ’प्रेमी पथिक’ (पूर्वाद्र्व) ’सदेई’ जाग्रत स्वप्न (पं-तारा दत्त गैरोला) मलेथा की कूल (भोलादत्त देवारानी ) जैसी रचनायें आती हैं। प्रायः परिनिष्ठित खण्ड काव्य रचनायें हैं। ये पूर्णतया छन्दबद्ध रचनायें हैं।
(3) तीसरे वर्ग में कुछ आख्यान आते हैं। भोलादत्त देवरानी का ’नल-दमयन्ती’ श्री धर जमलोकी का ’रूक्मा’ बलदेव प्रसाद दीन का ’सती रमा’ जैसी रचनायें हैं। ये अधिक विस्तृत नहीं हैं।
चैथे वर्ग में राष्ट्र प्रेम और गढ़देश से सम्बन्धित रचनायंे हैं-राष्ट्र रक्षा (श्री धर जमलोकी) गढ दुर्दशा (श्री धर जमलोकी) उढ़ा गढ़वालियों ( सत्य शरण रतूडी) इसी प्रकार की रचनायें हैं। (5) पाँचवे वर्ग में अनूदित रचनायें आती हैं। इनमें सदानन्द जखमोला द्वारा किया गया ’मेघदूूत’ का अनुवाद ’रेबार’ और धर्मानन्द जमलोकी का गढ़वाली मेघदूूत आता है। (6) छठे में गढ़वाल में प्रचलित दो भड़ (पँवाडे-वीर गाथा में) आती हैं। इनमें पहला ‘सूरिज नाग’ का भड़ौ है। और दूसरा शिव नारायण सिंह बिष्ट द्वारा संकलित गढ़ सुम्याल भड़-वाती हैं। (7) सातवें अन्तिम वर्ग में -ढोल सागर संग्रह हैं। जिसमें पं भवानीदत्त धस्माना ब्रहमानन्द थपलियाल और प्रेम लाल भट्ट द्वारा ढोल-दमाऊ के बोलो पर संग्रह की गई सामग्री हैं।
इन रचनाओं के प्रकाशन की सबसे बड़ी विशेषता हैं आचार्य डबराल द्वारा इनकी विस्तृत व्याख्यापूर्ण भूमिकाओं का लेखन। जहाँ इन भूमिकाओं में सैकड़ों संदर्भ ग्रन्थ विद्यमान रहे, वही छोटी बात को भी उन्हांेने नजरअन्दाज नहीं किया हैं। अधिकांश भूूमिकाएँ तो मूल रचना के बराबर या उससे अधिक विस्तृत हैं। प्रह्लाद नाटक की पच्चीस पृष्ठों की भूमिका में लेखक ने प्रह्लाद- हिरण्यक शिशु, होलिका आदि चरित्रांे के पौराणिक से लेकर आधुनिक काल तक के संदर्भ दिये हैं। तोताकृष्ण गैरोला की रचना प्रेमी-पथिक ( पूर्वार्द्ध ) प्रायः एक सौ पृष्ठांे की है, जिसमें कोई 50 पृष्ठांे पर विद्वान सम्पादन की भूमिका है। पं तारादत्त गैरोला की भावपूर्ण रचना ’सदेई’ जाग्रत रचना 54 पृष्ठों की रचना में सम्पादक द्वारा लिखित ये भूमिकायें पुराने गढ़वाल के मानव-समाज पर तथ्य परक एवं गवेषणात्मक प्रकाश डालती हैं। लेखक रचनाकारों का परिचय, रचना की कलात्मक विशेषता पर भी विस्तृत रूप से हमारे सामने इस देवभूमि की रचनात्मक मेधा पर विस्तृत रूप में प्रकाश डालने में समर्थ हैं। इस संक्षिप्त व्याख्या के पश्चात हमें यह देखना है कि आचार्य शिवप्रसाद डबराल के इस महत्वपूर्ण कार्य का क्या महत्व हैं। इस कार्य का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण कार्य तो अपनी लुप्त होती विरासत को बचाना कहा जायेगा। विरासत अतीत का मोह नहीं। बल्कि अतीत को समझने का प्रथम साधन हैं दुर्भाग्य से हम अभी भी अपनी धरोहर के महत्व को अधिक नही समझ पा रहे हैं। मित्रवर ताराचन्द्र त्रिपाठी जी ने बताया है कि इग्लैण्ड के किसी पुस्तकालय में इस प्रकार की कोई एक सौ कुमाउंनी-गढ़वाली रचनायें आज भी संजोकर रखी हुई हैं। यहाँ तो इनमें से अधिकांश अब लुप्तप्रायः जातियों में ही गिनी जायेंगी। उन्होंने मुझे वहाँ से लाकर प्रायः सवा सौ वर्ष पूर्ण लीलाधर जोशी वेरिस्टर द्वारा किये गये मेघदूत के सुलेखत कुमाउंनी अनुवाद की एक प्रति दी है जिसमें अंग्रेजी में विस्तृत भूमिका दी गई है। क्या हमारा यह दायित्व नहीं कि स्वदेश एवं विदेशों में पड़ी हुई अपनी धरोहर को हम खोजें और उसके प्रकाशन की व्यवस्था करें। आचार्य के जीवन का एक उजला पक्ष उनका सादगी पूर्ण ग्रामीण जीवन भी है। किसी प्रकार की वाह्य सहायता के उन्होंने पचास वर्षों तक अपने हाड़-मांस से ज्ञानग्नि को प्रज्जवलित रखा। उन्होंने न जाने कितनी खोज यात्रायें की लेखन किया और बीस हजार पृष्ठों के कार्य का प्रकाशन किया। उन्हांेने अपने और परिवार के व्यय में से एक-एक पैसा बचाकर यह कार्य किया। रिटायरमेंट के बाद सिर्फ 270/-रु की मासिक पंेशन स्वीकृत हुई थी। अपनी अन्तिम पुस्तकों को छपवाने के लिये उन्हांेने अपने मकान के छवाई के पत्थर तक बेच डाले थे। क्या आचार्य की यह साधना आज के हमारे प्रोजेक्टियों को जो अपने हगने-मूतने की क्रियाओं का भी हर्जाना वसूल करते हैं धन व समय की कमी के बहाने न बनाने के लिये उदाहरण का कार्य कर सकते हैं । डा. डबराल के अनेक ग्रन्थंों की भूमिका में एक आदमी के रूप में भारी पीड़ा उभर कर सामने आई हैं। परन्तु इन दुःख कष्टों के बीच भी वे निर्बाध रूप में अपना काम करते रहे। उन्होंने न कभी सरकारी धन की कामना की न समाज या सरकार द्वारा दिये जाने वाले सम्मान की। इसीलिये उन्हांेने अपने ग्रन्थ राहुल सांकृत्यायन, चन्द्रकँुवर बथर््वाल, श्री देवसुमन, मौलाराम, डा पीताम्बर दत्त वर्थवाल जैसी मेधाविओं को समर्पित किये हैं- तीन टके के किसी भी नेता को नहीं। हमें आचार्य प्रवर के मेधात्मक-रचनात्मक कार्य के साथ-साथ उनके ऋषितुल्य जीवन से भी-शिक्षा लेने की आवश्यकता है कि आखरों को सजोने वाला कारीगर गर्मी-शीत भूख-प्यास, निन्दा-प्रशंशा आदि से ऊपर होता है। उनका मंत्र था-’’नहि दैन्य नहि पलायनम्’’-न दीनता दिखाऊँगा, न पलायन करुँगा। क्रिया सिद्धि सत्वे भवति महतां नोपकरणे। हमारे युग में आचार्य डबराल ने यह सिद्ध कर के दिखाया।
@ नैनीताल समाचार से साभार