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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Sunday, May 28, 2017

शीर्षक....."ल्या जी चा"

(पूर्णत काल्पनिक लघुकथा स्वरचित द्वारा सुनील भट्ट दिनांक 24/04/2017)
पात्र : केवल चार (बूढ्या, बुढड़ी, ऊ छोरा अर ब्वारी)
कहानी  कु संक्षिप्त सार...बुढ्या जी दिल्ली सरकार  (सैद से जलनिगम) मा बटै एक छोटा से पद पर छा अब त खैर कै बरस पैली रिटैर ह्वैगैन । सिरफ बुढ्या जी कु नौनु बुढ्या जी दगड़ी दिल्ली मा पढै करदु छौ अर बकै तीन नौनी दगड़ी बुढड़ी कुछ साल पैली तक त घौर मै (पहाड़ गौं मा सैद से सतुपुली जनै ) रैंदी छै।।
जिंदगी भरै कमै धमै 3 नौनी अर 1 मात्र नौनु पढांण, तौकु ब्यौ अर रिस्तादरी निभाण मा खत्म ह्वैगै .....बकै जु थोड़ा भौत पैसा बची बी छन त नौनन जिद्द करि कि ना जी पहाड़ नी जाणु अर वन बी लुखौं सिक्यासैरी मा....तब बुढ्या जीन दिल्ली मा ही बुराड़ी, कै तंग गली मा 50 गजौ मकान खरीद ल्हे। अर बुढड़ीन जी क्य कनु छौ यखुली घौर मा बुढड़ी बी दिल्ली ऐगै छै । जिंदगी कटेणी चा, नौनु कबि ईं कंपनी त  कभी वीं कंपनी मा सुद्धी धक्का खाणु । ........(अग्नै पटकथा)
प्रथम दृश्य:
पर्दा पर पात्र तथा कलाकार परिचय दगड़ी द्वी जनान्यौं आवाज़ (बैक ग्राउण्ड) सुणैदी।
ब्वारी: ल्या जी चा..
बुढड़ी(सासु) : हे दूध आणी दे मिन नी पीण्या स्यू कालु पाणी।
(तब्यरौं रसोई मा बटै घड़म कप फुठ्याँ सी आवाज़ दगड़ी  पर्दा पर  बुढड़ी मुखड़ी  दिंखेदी)
बुढड़ी: क्य ह्वै ये ब्वारी
(ब्वारी रसोई मा बटै)
ब्वारी: जी कुछ ना....
(सब्बी दृश्य बुढ्या जी कु दिल्ली बुराड़ी 50 गजौ मकान भितरै छन जैमा एक कमरा से थोडा से अगनै लगीं रसोई छ, ब्वारी किचन मा काम धाम करदी झल झल सी दिखेणी छ।  टैम सुबेर, 8 बजे गर्म्यौं का दिन)
(तब्यरौं लैट भागी जांदी अर पुराणु सी टैबल फैन का पंखुड़ा धीरे धीरे रूक जांदन टेबल फैनै मुख पर कुर्सी मा बैंठीं बुढड़ी परेशान..... झुल्ला यानी क्वी कपड़ा हिंलाद हिंलाद)
बुढड़ी: दा कनी आग लगी रै ईं लैट पर, जप्प आणी छ अर जप्प जाणी च ....(बरड़ा बरड़ी) अर यू बुढ्या कख म्वरी होलु कबरि बटै जयूँ दूध ल्हीणौ, सुबेर बटै चा नी पे, चा की टपटपी लगीं, फक्या द्यखुदू छौं कै देश चलगे यू बुढ्या ....
(बुढड़ी कुर्सी मा बटै उठदी अर देली मा बटै भैर जनै तंग गली मा बुढ्या तै ह्यरदी तब्यरौं द्यखदी कि बुढ्या जी त दूधै थैली पकड़ी बीच गली मा खड़ा एक ज्वान छोरा(ऊ) दगड़ी गप्पों मा मिस्याँ त बुढड़ी गुस्सा मा जोर से देहली
मा बटै)
द्वितीय दृश्य : (बुढड़ी देली मा बटै गली का बीचोंबीच  गप्पौं मा मिस्याँ ऊँ द्वीयौं तैं देखी)
बुढड़ी: हे मिन त चितै जणी तुम वखी जुगा ह्वैग्याँ, हे ब्वै दस घंटा ह्वैगैन तुमतैं.....गप्प लगाणौ क्या छ ....बड़ा ट्रक चलणा छन जणी तुमरा 
( बुढड़ी आवाज़ सुणदी पर्वाण ऊ द्विया  बुढड़ी जनै औंदन)
बुढ्या:  ( घौर मा भितर जांदू , पिरूपरू मुख कैरी  ) आणु छौं क्य ह्वैगे, सुबेर सुबेर दिमाग़ खराब न कैर यार
बुढड़ी: बुढैग्या पर कबि नी सुधरण तुमन....
(तबर्यो बुढड़ी तै ऊ छोरा प्रणाम करदु)
(बुढ्या जी की भितर बटै आवाज सुणैदी ल्या ब्वारी यू दूध छ)
ऊ छोरा: बोड़ी प्रणाम ।
बुढड़ी: प्रणाम ब्यटा, खूब छै रै तू ...क्या छ रै भितर औण मा डैर लगणी त्वै......भैरै बटै हैं....कतग्यै  दिन देखी याली मिन त्वै यखु फुंड जांदी.....   पण एक दिन बी तू
ऐजा  भीतर द्वी घड़ी त बैठ...अरे तुम त ये परदेश मा बी परदेशी ह्वैंग्या रे .....
ऊ छोरा : न बोड़ी तन बात नी
तृतीय दृश्य : (घौरै भीतर)
(बुढड़ी दगड़ी ऊ छोरा बी भितर ऐ जांदू ....तबर्यो जप्प लैट ऐ जांदी .....बुढ्या जी एक किनारा बैठी पिरूपिरू  मुख कैरी अखबार द्यखणा)
बुढड़ी : दा बुबा दैणु ह्वैगे रै तु तेरा औण से लैट बी ऐगे । हे म्यरा गरमा....हे ब्वै उस्यै ग्यौं मी ईं दिल्ली मा...
अछै  तेरी ब्वै खूब च रे..कतग्या दिन बटै नी देखी मिन..तेरी ब्वै, अपड़ी ब्वै लेकी नी ऐ सकदी हैं तू यख... .कतग्या निर्दयी ह्वैग्याँ रै तुम भैर ऐकी......
(ऊ छोरा हरिबी झल्ल झल्ल किचन मा ब्वारी जनै द्यखुणू  ज्वा कदण्यौ मा फोन लगै छुयू पर मिंसी छ अर कबर्यों जोर से हंसणी सैद से ड्यूटी पर जयूं अपड़ु जवैं दगड़ी छ्वीं लगाणी )
ऊ छोरा: कख  बोड़ी मेरी प्राइवेट नौकरी, टैम ही नी मिलदू बुन्या । अर कैदिन छुट्टी होंदी बी च न..  त दुनिया भरै काम। अर माँ की तबियत बी खराब रैंद...तू त जणदी  ही छै न...
(बोड़ी जरा ब्वारी तै सुणै तै)
बोड़ी: हाँ बेटा अपड़ी ब्वैकु खूब ख्याल रखुणू रै...याद रखणु रे ईं बात तैं कि ब्वै नी मिल्दी दुबरा ....ख़ूब सेवा कन ह्वाँ ब्वैकी..अर ह्याँ ब्वारी बखैंया मा नी आणु ह्वाँ ......
(बुढ्या जी खौल्यां सी  द्यखणा त रसोई मा बटि ब्वारीन जणी हल्कु हल्कु सी सुणी द्या)
( ब्वारी कन्द्यूड़्यौ मा बटै  फोन हंटादी अर भैर बैठ्या सब्यौं जनै चुल चुल द्यखदी)
ब्वारी :(फोन पर)  एक मिनट ह्वाँ....
(सबी एक दूसरे जनै द्यखणा तब्यरौं बुढड़ी बात टाली देंदी)
बुढड़ी: अरे मी त पुछण ही भूली ग्यौं ..आज कख च तेरी दौड़ हुणी बैग सैग पकड़ी सुबेर सुबेर  ।
(ब्वारी  फिर से फोन पर .मिसे जांदी ..ब्वारी कु किचन मा बटै मुख दिखेंदू... फोन तैं खचर्वणू दिखेदू.)
ऊ छोरा: बोड़ी जरा  काम से जाणू छौं आज पहाड़ ।
(पहाड़ नौ सुणदी पर्वाण बोड़ी थकान दूर, मुखड़ी मा मौल्यार एक लालसा पहाड़ प्रेम की भावना उभरदी)
बोड़ी: अहा बेटा कनि जैलू रै तू मेरू मुलुक, (स्मृतियों मा सी ख्वै जांदी) पहाड़ै ठंढी हवा पाणी, साफ सुन्दर वातावरण, खाणी पीणी,भला लोग, भलु समाज अछै बुबा हम कुणै त हर्ची ग्या रै सब कुछ ......(अचाणचक बात पलट देंदी)
हे बाबा आजकल्यौं काफल पक्याँ होला, काफल ल्हैयै ह्वाँ,
ऊ छोरा: बोड़ी मी .......
(बोड़ी तब्यरौं वैतैं बीच मा टोकी देंदी अर बोड़ी कु मुखड़ी मौल्यार देखी ऊ छोरा बी कुछ नी बोली सकदू)
बोड़ी: बुबा हमरी कुड़ी पुंगड़ी, डाली बूटी देखी ऐजै ह्वाँ,
अर गौं गल्यौ मा सब्यौं कुणै मेरी सेवा सौंकी जरूर कै बोली दे ।

(वै छोरा मुखड़ी .......कुछ ब्वन चाणु पर बोली नी सकणु बुढ्या अखबार पढणा बहाना करि कबर्यों कबर्यौं मुख बी मड़काणु)
ऊ छोरा: बोड़ी ऊ ह्याँ.....
(तब्यरौं बोड़ी फिर शुरू)
बोड़ी: बुबा ह्याँ संजू ब्वै कुणै बोली दे कि बुन तदगै साल बटै कटणी  छै तू हमरू घास, डाल बूटी ...चार सौ रूप्या सालै देणा छ्या....वीन करार कैरी छै
सात साल ह्वैगैन आज सात साल,  अर सिरफ ह्याँ द्वी  बार भिज्याँ वीका चार चार सौ रूप्या ......
हाँ एक दफै पाथैक गैथ अर जरा कोदू पिस्युँ धौ भिजवाई  वीन जरा...वीकुणै बोली दे कि एक  द्वी माणी  घ्यू (घी) ही भेजी दे.बुन.....बतै दे बोड़ी की तबियत भौत खराब च .....भौत कमजोर ह्वैग्या बुन ।
(बुढड़ी की बात सूणी बुढ्या अर ऊ छोरा एक हैंकौ मुखड़ी देखी जरा ज़रा मुस्काणा)
बुढड़ी की बरड़ा बरड़ी ....: हे राम बाबा तिल बी सूण, बल औ। ह्याँ  मुड़्या खोला क संतोषी बाबा लमड़ीन बल परस्यौं फुन अर.अब झणी कन .छन धौं... रंत न रैबार.....न कैकु फोन न कुछ...जरा ऐजै बाबा ऊंतैं .देखी..
(बुढड़ी कु भौत देर बटै कड़कड़ाट सूणी तब्यरौं बीच मा बुढ्या तैं  चिंगै)
बुढ्या: अबे बुढड़ी कैबरी बटै एकछ्वड़ी  कचर कचर कचर कचर लगीं...निरभै बौल्याऊ औलाद, हैंकै जम्मा नी सुणदी .....अपड़ी अपड़ी लगांणी बस...नी जाणू ऊ गौं, अपड़ा काम से जाणू कखी।
(बुढड़ी फटकरै सी ग्याई)
बुढड़ी: त कख, कख जाणू यु....हे पैली त बोली वैन कि मी  पाड़ जाणू छौं
बुढ्या: अबे निरभगी  (तबरयौं बीच मा ऊ छोरा)
ऊ छोरा: ओहो बोड़ी जाणू त मी पाड़ ही छौं पर मीन घौर नी जाण बुनै, गौं नी जाणु  मीन त बस सतपुली तक जाण
माँ की पेंशन चक्कर मा, माँ की पेंशन गड़बड़ी हुईं जरा, बैंक मा पता कन, राति  कोटद्वार रैण मिन अर... सुबेर ल्याखम सतपुली काम करै अर  ब्यखुनै कैं बी हालात से वापिस ..
बुढड़ी: हे त पैली बटै नी बतै सकदू छ्या तु ....वैबरी बटै लाटु समझणु छै हैं  तू मितैं
बुढ्या: अर तिल ब्वलण बी द्या वैतैंई, बौल्या जन बरड़ बरड़ बरड़ बरड़, गिच्ची द्याखोदी तेरी कैंची से बी पैनी ....
बीच मा बोली की कैन कटैण च ...वन त खूब कणाणी रैंदी तू राति दिन हे ब्वै मीतैं यनु ह्वैग्याई तनु ह्वैग्याई, मुड़्याबीस्सी  ह्वैग्या....
(बुढड़ी गुस्सा मा)
बुढड़ी: हां त भौत पैंसा खर्च करिनी न तुमन म्यरा इलाज पर,  कैदिन बटै ब्वनु छौं कि मीतैं जरा गौं ल्हीजा गौं ल्हीजा....पर यनु म्वर्यू च तुमरू....(दांत कीटी की)
बुढ्या: अर छैं च त्वै पर बसागत, द्वी फलांग चलदी पर्वाण अब तेरी जीभ भैर ऐ जांदी, नखरा कन बैठी जांदी तू
बुढड़ी: (हल्की रूंणी सी़..... तू तड़ाका पर ऐ जांदी) हे यनु म्वरी ऐकु ...हे ब्वै म्यरा दुख ऐतैं नखरा दिखेदन....पैली त खाणी खुराक होंदी ...(गुस्सा मा) ह्याँ नखरा त तुमरी ब्वै करदी  छै, म्वरदी म्वरदी तक चुसणी रया मीतैं .....सेवा कना कुणै  तुमरी  नौकराणी कनी धरीं छ्या मी..
(ऊ छोरा तमशगीर बणी अपड़ा मुखौ हाव भाव बदलणु ....तबर्यो वैकी नजर फिर रसोई मा काम पर दगड़ी फोन पर बात करदी ब्वारी पर फिर से जांदी किलै कि ईं दा ब्वारी फिर से जरा जोर से हंसदी)
ब्वारी: (फोन पर) हा हा हा हैलो..हैलौ..  सुणणा छौ अपरी ब्वै कु करड़ाट .....
( फ़िर से फोन पर लगी जांदी)

(बुढ्या बुढड़ी कुणै)
बुढ्या:ब्वै की सेवा करि त क्वी ऐसान नी करि त्वैन,  पितृों कै (सासु की सेवा) प्रताप आज बचीं बी छै नथर कैदिन .....
(तबर्यो ऊ छोरा बीच बचाव)
ऊ छोरा: अरे बोड़ी किलै तुमरू इतरी सी बात मा इतरू बड़ू उफदरू खड़ू कर्यूँ, भैर परदेश च यू परदेश

(वैकी बाच सूणी बोड़ी और गरम)
बोड़ी: हैं क्य बोली त्वैन ऊफदरू ....मी कनु ऊफदरू हैं (गुस्सा मा) अरे उफद्यर्या  (उफदरया) तू छै तू , फजल ल्याखम ऐगे मेरा घौरम काल सी बणी, सर्या दिन खराब कैद्या हमरू
(ऊ छोरा फटकरै सी जांदु, ब्वारी सी जनै द्यखुदू त ब्वारी अणदिख्या कैरी फोन पर मींसी तब ऊ बोड़ा जनै द्यखुदू अर अपड़ी बेजती सी समझी खौल्यूँ सी)
ऊ छोरा:(थोड़ा गुस्सै सी) बोड़ा तुम लुखौं दिमाग़ न....
(तबर्यो बोड़ा तिलमिलै की)
बोड़ा: अबे क्या पागल चिताणी छैं हमतै हैं,  चल फुंड सटक यखमा बटै ...क्या रै  हमरू दिमाग.क्या...क्या बुन च्हाणी छै तू 
(ऊ छोरा बेचारू  फटकरै सी, एक नकली सी हंसदू,  दगड़ी घैर से भैर(बाहर) आंदू आंदू कुछ गिच्चा मा बड़बड़ांदु)
ऊ छोरा  (हरिबी घौर से भैर जांदु) हम्म(नकली हंसी) मीतैं त यनु कि तुम सब्या का सब्बी बौल्यै ग्या जणी, यु घौर ना तुमरू पागलखाना छ.....हट्ट कबि नी अण्या मी तुमरू घौर.....
(ऊ छोरा चली जांदू, बुढ्या जी दाड़ी बणौण मा लगी जांदन, बुढड़ी टेबल फैन अगनै बैंठी लम्बी लम्बी  सांस ल्हेणी अर अपड़ा आप ही बड़बड़ाणी)
बुढड़ी: हे ब्वै कनु जोग च म्यारू... हे भितरै त ह्वाई ह्वाई अब भैर का बी  प्वड़ी गैन म्यरा चाड़ी ....दा रै जोगा़. दा रै जोगा़ ..... (अपरू कपाल पर मरदी हथन)
(तब्यरौं ब्वारी थाली मा चार स्टील का गिलास्यौं मा चा लेकी नप्प बुढड़ी अग्नै)
ब्वारी: ल्या जी चा
(बुढड़ी  खोल्या सी चा गिलास द्यखदी त चा कु रंग कालु) बुढड़ी : हे दूध कख च
ब्वारी : जी ऊ त बितड़ीगे
(बुढड़ी पिरूपिरू मुख कैरी ब्वारी तै मुड़ी बटै माथा तक द्यखदी अर ब्वल्दी)
बुढड़ी: दा बुबा दूध क्या बितड़ी, मेरू जोग बिरड़िगे बुनै  जैंदिन  बटै......(इशारा ब्वारी जनै ही)...
(अर यनु ब्वल्दी ब्वल्दी हथ्यौन इशारा करदी कि फुंड ल्हीजा तैं चा तैं, अर मुख पर हथ लगै बैठदी ही च कि जप्प फिर टेबल फैन का पंखुड़ा धीरे धीरे  रूक जांदन अर बुढड़ी परेशान झुल्ला हिलांद हिलांद  हवा कुणै)
बुढड़ी: दा यनु बिजोग प्वड़ी रै ईं लैट खुणै .....हे ब्वै म्वरूदु छौं मी........ (बुढड़ी खुणै रकर्याट)
(इसी के साथ यह गढवली संक्षिप्त कहानी खत्म होती है)
पूर्णतः काल्पनिक स्वरचित/**सुनील भट्ट
24 /04/2017