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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 28, 2017

पयाश पोखड़ा की गजलें

Gazhals by Payash Pokara 
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उगाड़ी रखदा छाया जब कूड़ों का द्वार खळ्याण जनै ।
हैंसि-खुसि कि भि लगीं रैंदि छाई लंग्यार खळ्याण जनै ॥
तिबरि-डंड्यळि खालि ह्वैगीं अब यख  क्वी नि रैन्दु ।
बिना मनख्यूं का घर-कूड़ा हुयां खन्द्वार खळ्याण जनै ॥
अब त जिकुड़ों फर भि बड़-बड़ा डाम दिखेणा छन ।
झणि कब बटैकि नि आई यूंफरै मौळ्यार खळ्याण जनै ॥
ब्वै थैं चलि गैन चारा अर बुब्बा थैं सन्निपात हुयूंच ।
भयूं ल झगड़ों मा जब चीण द्याई दिवार खळ्याण जनै ॥
कख हर्चिगीं वो छज्जा चौक अर गुठ्यार म्यारा गांव का ।
ख्वजणा छवां थड्या चौंफ्ळा लाड-प्यार खळ्याण जनै ॥
अब ठुंगणा कु भि किलै नि आंदि घुघूति- घिंडुड़ि आज ।
सेरेक कौणि झुंगरु छिटक तू वार-प्वार खळ्याण जनै ॥
बूण-परदेस घूळि गैन म्यारा गौं-गळ्या अर ख्वाळौं थैं ।
"पयाश" नीना प्याट ल्हिण लग्यूं डंकार खळ्याण जनै ॥

@पयाश पोखड़ा
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एक गज़ल "बगत" फर
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यो बगत भि कन चट-चटाक ह्वै जांद |
पैदा हूंण से पैलि पोट-पटाग ह्वै जांद ||
अज़ाण अपछ्याण उपुरि सि मेमान बणिकै |
पछ्यणकुल से पैलि यो झट-झटाक ह्वै जांद ||
मुण्ड फर बड़-बड़ा गुरमुळा दे ग्याइ यो बगत |
झणि कबरि यो खैड़ा कि कट-कटाग ह्वै जांद ||
भुक्करा पिळचीं त रुवै-बुथै भि ग्याइ यो बगत |
उछिण्डू बिळ्कैकि दूधकि घट-घटाग ह्वै जांद ||
मि जणदु छौं बगत आज त्यारु मुण्ड मलसणु चा |
भोळ-परबात बगत की कनि चोट-भटाग ह्वै जांद ||
अपणि खैरि कु पस्यौ कभि सुखणि नि देई तू |
छैल बैठदै हि यो बगत भि लट-लटाक ह्वै जांद ||
सर्या दुन्यां की आळि-झाळि नि कैर तू "पयाश" |
बगत का दगड़ा ज़िन्दगि झट-झटाग ह्वै जांद ||
@ पयाश पोखड़ा |