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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, May 10, 2017

शादी के सात बचनों का छंदयुक्त गढ़वाली अनुवाद

भवानुवादक - कृष्ण कुमार ममगाईं 
-

ब्यो का 7 बचन गढ़वाली स्लोक :
=
जु शादिसुदा झन उ फेरौं का यूँ 7  बचनू थैं मनन कैरा अर जौंका ब्यो हूंणा छन उ रियलसल कैरा।  संस्कृत का मन्त्रु कु यु  गढ़वाली ड्राफ्ट रूपान्तर जन चा ।
प्रथम वचन:
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

                     याने   (गढ़वालिम)   

तीर्थुम बरतुम यज्ञोंम पाठुम, 
दगड़ी रखल्य जू अपणां हि साथम ।
वामांग मा औलु तभी तुम्हारा   
पैलू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥
द्वितीय वचन:
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
                     याने  (गढ़वालिम) 

अपड़ा ब्वै-बब्बु जन म्यारा भि मनल्या,
मर्यादा जन सब्बी कर्म कल्या । 
वामांग मा औलु तभी तुमारा    
दुसरू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥

तृतीय वचन:

जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
                     याने   (गढ़वालिम) 

जीवन कि तिन्नी अवस्थौं म मेरी, 
मेरु जु पालन करल्या त ब्वाला ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
तिसरू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥

 

चतुर्थ वचन:

कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!
                     याने  (गढ़वालिम) 

कुटुम्ब पालनकि सबि जुम्मेबारी, 
लींदा प्रतिज्ञ उठांणा कि सारी ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
चौथू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥

पंचम वचन:

स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
                     याने  (गढ़वालिम) 

घर-भैरा कामुम कै भी व्यवहारम,
खर्चा कनम जू मीं थैं भि पुछल्या ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
पांचौं बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥

षष्ठम वचनः

न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!
                     याने  (गढ़वालिम) 

अपमान नी कल्या दगड़्यों क बीचम,
जुवा आदि ब्यसनौ से रैल्या दूर । 
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
छट्टू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥

सप्तम वचनः

परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!
                     याने   (गढ़वालिम) 
बक्की जननौ थैं माँ जन्न मनल्या
अर हमरा प्रेमम हैंकै नि स्वचल्या ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
सातौं बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥

Of and By  कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म:: [जै भैरव नाथ जी की ]