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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 28, 2017

शिल्पी , समाज और सरकार साथ मिलकर ही गढ़वाली नाटकों को पुनर्जीवित कर सकते हैं - डा .डी.आर. पुरोहित

(गढ़वळि नाटक पुनर्जीवितिकरण पप्रसिद्द लोक नाट्य सक्रिय शिल्पी डा .डी.आर. पुरोहित दगड़ भीष्म कुकरेतीअ   टेली -छ्वीं ) 
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भीष्म कुकरेती  - जी डा साब ! अजकाल दस बारा सालुं बटिं गढ़वळी नाटकुं मा सुन्नपट्ट हुयुं च।  
डा .डी.आर. पुरोहित- हाँ दिखे जावो तो राष्ट्रीय स्तर पर बि इनि कुछ  .. 
भीष्म कुकरेती  -ना पर मुंबई , पुणे मा मराठी नाटकों मा दुबर रंगत ऐ गे , मुंबई मा अब गुजराती नाटक खूब चलणा छन अर मुंबई म हिंदी नाटक बि अब ठीक ठीक चलणा छन। 
डा .डी.आर. पुरोहित- हाँ वो तो च किन्तु गढ़वळि नाटकों की सबसे बड़ी परेशानी च बल इखमा नाटक का समझदार नाट्य लिख्वार नि छन , एकाद अपवाद हो  तो हो। 
भीष्म कुकरेती  -मतलब जड़ नाट्य लिख्वार की सबसे बड़ी समस्या च। 
डा .डी.आर. पुरोहित- बिलकुल सबसे पैल नाटक की समझ वाळ नाटक ल्याखन तो नाटक विधा अगवाड़ी बढ़णो बाटो साफ़ होलु। दिखणेर  तो तबि आकर्षित होला कि ना ? 
भीष्म कुकरेती  - माना कि नाट्य लेखक मिल बि जावन तो मंचन की समस्या तो उख्मी च कि ना ?
डा .डी.आर. पुरोहित- जी आज मंचन खासो मैंगो ह्वे गे तो इखमा सामाजिक संस्था , समाज अर धनी वर्ग तै समिण आण पोड़ल। 
भीष्म कुकरेती  -जी कन ?
डा .डी.आर. पुरोहित- सामाजिक संस्थाओं व धनी वर्ग तै मंचन व्यवस्था करण पोड़ल अर समाज तै अपण खीसा से कंळदार खर्च करिक नाटक दिखण पोड़ल। 
भीष्म कुकरेती  -जी हाँ जनता तै पैसा लगाणो ढब डळण पोड़ल।  
डा .डी.आर. पुरोहित- अर उत्तराखंड सरकार तै याने संस्कृति विभाग तै विजनरी ह्वेका नयो  शिरा से आधुनिक नाटकों का संवर्धन , संरक्षण का वास्ता योजना बणाण आवश्यक च।  आज  की स्थिति तो भयानक च।  संस्कृति विभाग बस एक तुर्री बजाण वळ विभाग बणी रै गे।  
भीष्म कुकरेती  -याने कि नाट्य शिल्प , समाज व संस्कृति विभाग तै एक दगड़ी ह्वेका काम करण से ही नाटक विधा माँ सुधार आलो। 
डा .डी.आर. पुरोहित- बिलकुल तिन्नी स्तम्भ जब तक मीलिक काम नि कारल  नाटकों विकास असंभव च। 
भीष्म कुकरेती - जुगराज रयाँ।