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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 28, 2017

बालकृष्ण बहुखंडी की गढ़वाली कविता

Garhwali Poem by Balkrishna Bahukhandi 
(जन्म -1960 , बड्याण , सैंधार पट्टी , पौड़ी गढ़वाल ) 
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बज्र मुखी निसुड़ु ले क ,
  बांजि पुंगड़ि चल्दि काइ ।
     भन्ड्य पछा खेतिह्वेग्या ,
          रक्कोडिक छांट काइ  ।।

इखड़्य म्यारा बल्द बंध्यां ,
   मौ मदद कु किलै ब्वन ।
      बल्द गैल़ ह्वे जाला ,
          मदद कैल किलै कन ।।

छांटि छांटि सीं नि धैरि ,
    कनकु पुंगड़ि लाल  ।
       खैरि खांद़ गुजरि उमर ,
          बीता मैना साल   ।।

बांजु सरग  बरखु  नीच ,
    सुद्दि खाई खैरी  ।
       तबित पुंगड़ि बांजि ह्वेनि ,
          क्वी नि धरुदु पैरी  ।।

फलडाल्यों की खेति कारा ,
    र् वापा फलू डाली़ ।
       आज अब्बि शुरू कारा ,
           बिसरिजावा ब्याली़ ।।

बालकृष्ण बहुखण्डी

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