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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 28, 2017

मेरू घौर

Garhwali Poem by Payal Uniyal 
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मेरा मन म बस्यूँ मेरू गौं
अर गौं का बीच मा मेरू घौर
व पठलिदार कूड़ि
तिबरि, डंडयलि अर ख्वळी
एक भितर द्यब्ता ठौ
दूसरा भितर नाज ल भ्वर्यां भकार
ओबरा रस्वड़ुबटि आंदि रस्याण
भैर लकड़ा फट्टू बन्यूँ जिंगला
आड़ा तिरछा ढुंगों न सज्यूँ चौक
मोल माटा ल लिप्यूँ म्यालु
कूणा फर घगरांदी जन्दरी
चौक मा व उरख्यलि
अर वखम सटि कुटदरों की
खट्टि मिठि छुंई।
एक कूणा पर
ढुंगा, माटा ल सज्यूँ चुल्हूँ
तिराल म व नारंगी डालि
अर वेम घिंडुणी घोल।
वलतरफ फुंगणौं खुण जयूँ बाटू,
अर बाटू किनरा पर सज्यूँ
 पलदरा ढुंगू।
इनू कबि छौ अपणू घौर
आज बदलैगे भौत, भीतर-भैर
मेरू घौर, गौं, देश, समाज
सबि कुछ बदलिगै
नि बदली ता बस मन की सोच
घर गौं की याद अर अपणो की खुद।
- पायल उनियाल।
अदालीखाल, पौढ़ी गढ़वाल
16/5/17
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