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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 28, 2017

गढ़वाली कविताएं

"ब्वे "
   मेरि उच्छेद्यूं पर जब चिड़रेंदि छै ब्वे
   हे छुछा ,अंक्वेकि रै ! ब्वल्दि छै ब्वे |
  आज दुन्या मा नि रयीं मेरि  ब्वे 
  पर मेरि आंदि-जांदि सांस मा ज्यूंदि च मेरि ब्वे |
   अर ह्यां! 
   मेरि ब्वे कि मी खुणी बोलीं हर बात 
   मेरि जिकुड़ि $ उड्यार मा छप्प बैठीं च ,
  अर  बगत- बगत फर मि तैं बाटु बतौणी,
   हिटौणी अर कतिबेर त अढ़ौणी बि च |
  14/05/17  @संदीप रावत ,श्रीनगर गढ़वाल  |
=

हे ब्वै/इजा !

======डॉ बिहारीलाल जलन्धरी
हे ब्वै/इजा !
हे ब्वै/इजा !
त्वै पैलागुन
यों आंख्योंल त्वै द्याख
ये दिलाल त्वै जाण
ये मनाल त्वै पछ्याण
तु छै म्येरु स्वपिण्य
म्येरि प्रेरणा ।
पर ब्वै/इजा
जब न सोच छै न समझ छै
न बुद्धि न विवेक,
छौ त एक बाुिं मन
एक कुंगुिं दिमाग
जु त्यारु दिखायां बाटा मा
जाणू छ सुरक से सरका तक।
हे ब्वै/इजा !
त्वै पैलागुन ।
बाािं मनम
रतब्याणम जन्दर पिसंद
कर्यूौिंं कि छाप
बुवजि कि मौत पर विलाप
आठ भै-भैण्यों कि गुठ्यारम
तु अडिग रै
कामधेनु बणिक ।
फिर भि, हर रस्ता म
तु र्वकदि रै, ट्वकदि रै,
डरान्दि रै, डरदि रै
मरदि छै फिर रून्दि छै
खवान्दि छै फिर खान्दि छै ।
सच ब्वै/इजा
मेरि दिल मा मूर्ति बणी
दिल मा, जीभ मा, आख्यों मा
अर दिमाग मा
विद्या कि देवि छै
बाटु दिखान्दि रैन्दि।
खुट्यों मा पैलागुन बोलिक
एक बिनति
हर ब्वै/इजा
दीणी रयां
अपणा बाोिंं थैं
बाटु लगौणा कि सीख
जु कबि
जु कखि
कै भि रस्ता म
हार नि मनी
रार नि मनी ।
हे ब्वै/इजा !
त्वै पैलागुन ।
सर्बाधिकार सुरक्षित
डॉ बिहारीलाल जलन्धरी
-- 
हाय हाय
====रमेश हितैषी

हाय हाय
स्यो सलाम ख़तम हैगे.
बस अब हाय हाय रहैगो.
भै रया जानू क्वे नई कुनु.
बस ओ के बाय बाय रहैगो.
आण जाण त बिल्कुलै बंद छा.
बस टेलीफोनी मेल मिलाप रहैगो.
व्यौ काज में लोग कभतै मिलि गयत.
प्यार प्रेम सिर्फ एक फ़ोटूक तक रहैगो.


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