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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, May 30, 2017

सुनील भट्ट - लाटी माया

      "लाटी माया"
हमरू चौक मा ढुंगु चुलै वा,
मी देखी सट्ट लुकी जाणी चा।
तुमरी ठंगरै की काखड़ी,
हमरू सग्वड़ु मा क्या ह्यनी (ह्यरणी) चा।।
देखा त सै क्वा होली घस्यारी,
कनु भलु बाजूबंद गाणी चा,
तुमरी मरख्वल्या गौड़ी भै अब त,
हथल्यौं मेरी चाटी जाणी चा।।
माया का ढुंगौं मा रड़ागुसी ख्यलणी,
मुखड़ी मयाली भली स्वाणी चा।
पण खांदी पेंदी क्या ह्वै होलु वींतैं,
हरबि हरबि ऊंद ऊंद जाणी चा।।
तुमरै ख्वालै की स्या घुगुती,
हमरू छजा मा बैठी टपराणी चा।
खूब छन म्यरा कन्दूड़ अज्यौं त,
सान्यौं मा वा कुछ बिंगाणी चा।।
मी त सदानी कु रैग्यौं लाटु,
मेरी समझ कुछ नी आणी चा।।
हमरू चौक मा ढुंगु चुलै वा,
मीतैं देखी सट्ट लुकी जाणी चा।।
स्वरचित /**सुनील भट्ट **
30/05/17
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"गढवली इश्किया"
तेरी हथ्यौं की रस्याण वाह,
हे छोरी च्या घुटांग,
अहा टपटपी सी लैग्ये।
तेरी ब्वैन आँखी घ्वुरैनी घुर्रर्र,
जमी नी बात भै तेरी ब्वैई कै सौं,
भौतै बुरू तेरू ब्वै कु सुबौ,
क्याफणी सी भै अटपटी सी लैग्ये।।
तेरू बाबान बल त्वै कूटी छक्वै,
सूणी मेरू पापी पराण भ्वरै ऐ,
क्या कन हे ब्वै जिकुड़ी मयाली,
मीतैं कऽलकऽली सी लैग्ये।।
त्यरा द्वी भयौंन, निरभै निहुण्यौंन,
मोऽल मा लपोड़्यु मी छक्वैई
तै दिन बटैई, छी भै मितैंई
निपट्ट कतैई झड़झड़ी सी लैग्ये।।
तेरी ब्वै पंद्यरा मा छुयौं मा मिसीं छै,
झणी क्या मेरी ब्वैमा ब्वनी छै
देखी द्वीयौं मी स्चचदु रैयौं कि क्या होलु छुचौं,
ज्या बी बात ह्वै होली,
पण ह्याँ मितैं जरा खटपटी सी लैग्ये।।
त्यरा बाबाजी मीलीनी,
ब्याली ब्यखुनी द्यखिनी,
पुछणा रैनी म्यरा हाल चाल,
कै गैनी ऊ कैई सवाल
देखी ऊंकु सुबौ मेरी जिकुड़ी घौ
त्यरा भै का सौं छुची सर्र मौऽलीगे,
ज्यू भ्वरै अर छपछपी सी लैग्ये।।
बेसुध छौ मी कै दिनौं बटैई,
फिर से गौला मा आज बडुली लैग्ये,
सची छुची हे मीतैं तेरी फिर से खुद लैग्ये।।
स्वरचित/**सुनील भट्ट**
28/05/2017
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      मेरू "दा" भैजी
वैका फिफनौं की तिड्वाल मा,
द्यखेणा छन साफ साफ
वैका दुख, वैका कष्ट,
वैकु सारू भ्वरोसु अर
वैक मेनतै रंग बी
त पहाड़ौ खातिर वैकु प्रेम अर
पहाड़ौ कष्ट बी!
मेरू "दा" (भैजी)
मितैं मिलणु अयुँ चा पहाड़ बटै,
म्यरा गौला भेंटेणु चा,
खूब खुदेणु चा, दुखेणु बी चा
भैर मा म्यरा कष्टौं देखी!!
स्वरचित/**सुनील भट्ट
09/10/16
शुभ संध्या मित्रों.....सबका भला करो भगवान्।
मेरी या गढ़वाली रचना आपकी समीणी।
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                             "तखुन्दू-यखुन्दू"
         ब्वै कु करड़ाट,
         कज्यणी कु किर्र किर्र।
         बुबा कु बरड़ाट,
         सदनी की झीक झीक....
         खिन्दैकी.......
         तखुन्दू चलिग्यूँ कुछ कमाणा कु।
         दुखों का वास्ता सुख खुज्याणा कु।।
         तखुन्दै की हवा पाणी
         फैक्ट्री मालिकै की झाड़।
         मकान मालिकै की झिड़क
         खाणी पीणा की हिरक।।
        सूणी देखी अर सै सै की
        किलसै ग्यौं मी,
        अर फिर ऐग्यों मि...अपणो का बीच
        यखुन्दै।
       यखफुन्डीऽऽ  मेनत मजूरी पर लग्यूँ छौं दिदौं
       सुखा की आस मा।
      अर अजी बी रोजगार की तलाश मा।।

              स्वरचित/**सुनील भट्ट**
              05/08/2016