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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, May 30, 2017

संदीप रावत की कविताएं ("एक लपाग "से)

संदीप रावत की कविताएं ("एक लपाग "से)
     ----- संदीप रावत ,न्यू डांग, श्रीनगर  गढ़वाल |
( तीन गढ़वाली पुस्तक - एक लपाग, गढ़वाली भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा, लोक का बाना प्रकाशित)
                  
             (1)   कविता :  "  उलटन्त "

गंडेळों का सिंग पैना ह्वेगैनी,
जूंको का हडगा कटगड़ा ह्वेगैनी
किताळों कि बैकबून मजबूत ह्वेग्ये,
अर! मच्छरौं का टँगड़ा सीधा ह्वेगैनी |
किरम्वळा अब तड़ाक नि देंदा, डंक मन्ना छन
सरैल मा जहर कि मिसाइल छ्वडणा छन
उप्पनोंन बि तड़काणु छोड़ियाळि
तौं पर अब डी डी टी अर निआन असर नि कन्ना छन |
संगुळा अर झौड़ा बज्रबाण बण्यां छन
न्योळा अर गुरौ अब दगड्या बण्या छन
बिरौळा कि बरात मा मूसा ब्रेकडांस कन्ना छन
अर! चौंर्या स्याळ बाघ ना, शेर बण्या छन |
भौंरा -मिरासि फूलों मा जहर छ्वळणा छन
बल उल्लू दिन मा द्यखणा छन
हंस, काणा अर गरुड्या चाल हिटणा छन
घूण, अन्न $ बदला, मनखि तैं घुळणा छन |
हूंदा खांदा गौं मा घेंदुड़ा पधान बण्या छन
जूंका अब ल्वे ना, इमान चुसणा छन
बिरौळा अब खौं बाघ बणी गैनी
अर!  कुकरौं कि दौड़ मा, भ्वट्या शेर बण्या छन |
          (2) कविता : जुगराज रयां
जुगराज रयां वू मनखी
जु अपणु फजितु कैकि अब्बि बि
गौं मा मुण्ड कोचिक बैठ्यां छन
अपणा पित्र कूड़ा
अर थर्प्यां द्यबतौं मा द्यू -धुपणो कन्ना छन |
जुगराज रयां वू
औजी, धामी -जागरी
जु अब्बि बि नौबत, धुंयाल बजौणा छन
घर -गौं तैं ज्यूंदो रखणा छन |
जुगराज रयां वू
मां- बैणी
जु  अज्यूं बि कखि दूर गौं मा
थड्या, चौंफळा खेलणा छन |
जुगराज रयां वू सब्बि
जु अपणि ब्वे तैं नि छ्वड़णा छन
जु जांदरौं तैं द्यखणा छन
तब बि अपणा गौं मा छन |
       
            ----- संदीप रावत, न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल |
                शिक्षक, गढ़वाली लेखक/ गीतकार
                  मो0- 9720752367