उत्तराखंडी ई-पत्रिका की गतिविधियाँ ई-मेल पर

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Sunday, May 28, 2017

हे रात, जरा मेरि आंख्यूंं मा त देख

एक सिद्धहस्त कवि, लेखक,संपादक, पत्रकार अर रंगकर्मी होणा का साथ-साथ 
एक इना दुर्लभ जागरूक 
जन-कार्यकर्ता भी छया,
जु उत्तराखंड ही न बल्कि देश का 
तमाम छ्वटा-बड़ा जन-सरोकारु का प्रति 
अपणा समर्थन अर सक्रिय मदत का वास्ता 
हर समय तत्पर रैंदा छया 
अर जौं फर भरोसो करे सकेंद छयो ।
पुण्यात्मा धस्माना जी तैं 
सादर श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत छ 
स्वयं वूंको कर्यूं पंजाबी का 
क्रांतिकारी कवि अमर शहीद अवतार सिंह 'पाश' की 
द्वी पंजाबी कवितौं को गढ़वाली अनुवाद, 
जु हमुन् दिल्ली बटि सन् 1989-90 मा प्रकाशित गढ़वाली भाषा का मासिक अख़बार 'मंडाण' का संयुक्तांक अप्रैल-मई,1989 मा प्रकाशित करि छयो:
****************************************
हे रात, जरा मेरि
आंख्यूंं मा त देख
***************
--अवतारसिंह 'पाश'
क्वांसु मन झकझकु सरैल
बजुरु द्यखणू च अपणी जड़ु की तरपां
गैणा भी नि लगाणा छन क्वी छ्वीं-बात
ह्य भै, क्य ह्वे होलो ईं रात तैं
म्यारा बान नि ह्वेदि तु सुदि-सुदि उदास
तिल् क्या दीण म्यारु, हे चुचि रात !
रैण दे सुदि-सुद्या सोच
जुगार लग्यां गोर एक सोर छन बैठ्यां
अर सर्या गौं सेइ-सि गे जन सुपिन्यौं की खुचिलि
तु रैण दे रात,सुदि-सुद्या सोच नि कैर
मेरि यूं आंख्यूंंम् त झांक
जौंल् नि द्यखुणु अब उ दगड़्या
अखबारुम् छन जैकी सुर्खि आज
हे रात, तेरि वै दिनै रंगत कख गये
जै दिन उ छ्वाया को पाणि-सि 
ऐ छौ गद्-गद्-गद्
जुन्यल़ि रातम् पैलि पाढ़ा छौं दगिड़ि-दगिड़ि
फिर चोरु की तरां करणा रवां बहेस
अर बहेस कर्द-कर्द लड़ण बैठि ग्यों
एक-दुसरा दगड़
हे रात, जब तलक लड़णा रवां हम
त बड़ि खुश रै तु
अब ह्वे ग्यों जब एक-दुसरा से दूर
तब किलै छै तु इति माप उदास
त्वे तैं जाण वल़ा का सौं
नि खयेण चैंद त्यारु ज्यू
तिल् क्य दीण म्यारु
मी जि छौं त्यारु दीणदार
तु दे मी बधैई
मि दींदु पुंगड़्यूं तैं
यूं तैं सब पता च
आदिमौ ल्वे कखम् प्वड़द
अर क्य मोल हूंद वेको
इ सब जणदन्
इलैई ब्वनू छौं --- हे रात !
तु मेरि आंख्यूंंम् देख
अर मि भविष्य की आंख्यूंंम् द्यखुदु ।
------------
जेल से छुटण पर
*************
--अवतारसिंह 'पाश'
रिहा होण फर
जब आप भैर अंदन
त हिटणु सिखणा खुण 
फिर से नि लगौण प्वड़दन् ग्वाया
ना ही फिर बोलणु 
सिखण प्वड़द तुतलैकि
अर हिंगर गाडिकि
ब्वे को दूध कु ख्वजद !
बस असमान मा लिख्यां नामु मा
ढूंढदन आप अपणो नाम
हवा गवै देंद
अर डाल़ा-बूटा झूम उठदन स्वागत मा
ईं तरां शुरुआत होंद
फिर से जिंदगी की
फिर वी कशमकश, वी खैंचाताणी
आत्मा तैं बुथ्योण खुण 
मनख्यूं को फिर वी लक्खि-बक्खि बूण
हर्चि जाण खुण
फिर वी जितणा की उम्मीद....
इन होंद शुरू 
जिंदगी को सिलसिला नै सिरा से ।
---------
(द्विया पंजाबी कवितौं को 
गढ़वाली अनुवाद: राजेंद्र धस्माना, 
मंडाण, अप्रैल-मई, 1989 मा प्रकाशित)
-
Curtsey by Netra Aswal