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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, April 3, 2014

पाड़ मां बसन्त

Uma Bhatt , Rudraaprayag Jila 

बिना पते चिट्ठी मां रैबार जन
ऐगी मेरा पाड़ मां बसन्त यन
बण -बणो का वोंठ ह्वेग्या अति -मति लाल
बुराँसि ललाङ सुलगे ग्ये यन
जीतू बाँसुली इन भोण लगे ग्ये
छेंड -छेंड जिकुड़ी ऊंकी
जोंका स्वामी परदेश

रोंचुलियों बि हिलाँस न्यूतू आयूं च
परदेशयों घोर आवा यीं भोण कै बींगों ?
निकमा ह्वेग्या यख का पो - पराणी सब
फुल्यारी ब्स्न्याल मां टप्प - टपरिगयाँ
सेरू बथों यख फूलों न हुरसेलि
बगछट हुयुं यनों डाँडी -काँठी सरमेली
बुरांसों न बणों दगड़ करि यनु मजाक
कि सरमैक बणों की गल्वड़ी ह्वेन लाल

माया की गाड यख हुईं च अतर
कुजाणि कतगा पार कतगा बगि गैन यख
लाज का पोहरा अज्काल टूटणा अचणचक
जिकुड़ियों की माया का सौदेर आयाँ छन
रूप ,रस ,गंध सब लूछि लिगिन
यीं उमेली बार का इन द्वार खोल्यां छ
घिंदुड़ी बी बिंगाण बैठी अपणी रीत -भाँत
कि आंडरू की आस मां अबि घ्वाल रीता छन