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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, April 23, 2014

कुर्सी का जागर लग्यां छन /(गढ़वाली गजल )

(गढ़वाली गजल )
गजलकार -जगमोहन सिंह बिष्ट

कुर्सी का जागर लग्यां छिन सुणद जा ,
वोट का खांकर बज्यां छिन सुणद जा।
बैठ दादा क्वी नि निकाळी सकुद भैर ,
गिगड़ा गागर मा भर्यां छिन दिखद जा।  
घुंणडु कीलु लगौन्दन प्रीती की ,
कपाळ का टांका बुना छिन सुणद जा।
अाग गंगा मा लगीं रै सरा साल ,
माछा सब डांडा भग्याँ छिन दिखद जा। 
हथगुळयुं मां धैर यूं ज्यूंदाळु तैं,
द्यब्ता सब दैण हुयां छिन दिखद जा। 
जीतू की बंसुळी बणी च विधान सभा 
भाग अंछर्युं का खुल्यां छिन  दिखद जा।   
भैजि कनकै स्यार साला पांच साल 
भरणा झांझर बज्यां छिन सुणदा जा।
हिंवळी कांठ्यूं मा लगीं च यख बणाक,
देबी -दिब्ता दिल्ली मा छिन दिखदा जा। 
हौळ तांगऴ नी च , घास का ढेर छिन ,
गैळु का कन दिन   अयां छिन दिखद जा। 
बिष्ट डिग्री फेल छिन कॉलेज की ,
ढाई आखर कुर्सी का छिन रटद जा।


खांकर =  घुंघुरू    
स्यार साला- धान की रुपाई के लिए पानी भरा खेत तयार करना 
झांझर -पाजेब 
बणाक - वनाग्नि 
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