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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, January 22, 2014

पटवार्युं कुछ किस्सा

 चुनगेर ,चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती        


(s =आधी अ  = अ , क , का , की ,  आदि )
                  पटवार्युं बाराम जख जावो तख कुछ ना कुछ किस्सा मीलि जाला ।  आज बि पटवारी हमर समाजौ  कुण  आवश्यक अर महत्वपूर्ण बीमारी च।  सयेद बि नी च अर फिकेंद बि नी च। समाज पटवारी तैं भ्याळ जोग करण चांद अर सरकार चांदी बल बजट ह्वावो तो हरेक गां मा एक पटवारी चौकी खुले जावो।
                        पुरण जमानो ना म्यार जमानो मा बि पटवारी चपड़ासी कु रुतबा डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर  से जादा छौ।  नाक से अधिक महत्व नाक का बाळ होंदन ।
              चपड़सी जी क लाठ  छुम छुम आवाज करदो छौ।  लाठ पर बंध्यां जौं घुंघरू आवाज से नचणा ज्यु बुल्याण चैंद छौ वु घुँघर लोगुं तैं डरांदा छा। 
लोग बुल्दा बि छा हमर गां मा ज्यूंरा भेजि देन पण पटवारी जीक चपड़ासी जी तैं नि भेजिन।  ज्यूंरा त एक मनिख उठैक लिजालो पण पटवारी चपड़ासी खेत -पुंगड़ अर इज्ज्त ली जांदो छौ।  पटवारी चपड़ासी की भली सूरत बि डरांदी छे।  सुल्तानु डाकू से लोग इथगा नि डरदा छा जथगा पटवारी क चपड़ासी से डरदा छा। 
               एक दैं बल हमर गां मा पटवारी जीक चपड़ासी हर हफ्ता भामा दाजिक इक  आणु राइ।  ना तो पटवारी जीक चपड़ासी जीन बवाल ना ही भामा दाजिन ब्वाल कि पटवारी जीक चपड़ासी जी बार बार किलै आणा छन। गां वाळ परेशान छा।  परेशानी बात ही छे।  कैक इक यमराज आवु अर कैक जान नि लीजावो इन ह्वैइ नि सकद ऊनि कैक इक पटवारी जीक चपड़ासी जी इथगा दिन आवन अर कूड़ी पुंगड़ी नीलाम नि ह्वावो इन नि ह्वे सकुद छौ। लोगुंक  समज मा नि आणु छौ कि भामा दाजीक क्वा पुंगड़ी नीलाम होलि धौं । खैर  जौंक टक्क भामा दाजीक स्यारुं पर छे ऊन पटवारी चौकी जाण शुरू कार पर तबी बि पता नि चौल कि भामा दाजीक क्वा पुंगड़ी नीलाम हूणी च।  आखिरैं जब पता चौल कि भामा दाजीक पुंगड़ी नीलाम नि हूणि च त सरा गां वाळ निरसे गेन।  करुण रस का  रसिया बि दुखी ह्वेन अर इर्स्या  से पैदा हुयुं रस का जळतमार रसिया बि निरसे गेन कि भामा दाजिक पुंगड़ी नीलाम नि होणि च।  असल मा पटवारी जीक चपड़ासी जीक डूंडो स्याळ छौ अर भामा दाजिक बबराट से भरपूर स्याळि छे।  भामा दाजिक ससुर जी बेटिक हजार रुपया मांगणा छा अर चपड़ासी जीक ससुर जी पांच सौ रुपया से अळग एक धेला  बि दीणो तयार नि छा।  अर चपड़ासी जी निगोसिएशन का वास्ता भामा दाजिक ड्यार आंद छा।  अंत मा इथगा निगोसिएशन का बाद भामा दाजिक कामगति स्याळि क कीमत सात सौ रुपया फिक्स ह्वे अर पटवारी जीक चपड़ासी भामा दाजिक साडो भाइ बणी गेन।  गां वाळ खुस ह्वे गेन कि अब पटवारी जीक चपड़ासी हमर बि रिस्तेदार ह्वे गेन।  पण गां वाळु कुण  या खुसी जादा दिन नि रै।  अब भामा दाजी कै तैं बि चपड़ासी जीक नाम से डराइ दींद छा।  जब तलक पटवारी जीक चपड़ासी नौकरी पर रैन भामा दाजिक बि अडगैं (क्षेत्र ) मा रौब रैन।  तब बुले जांद छौ कि राजा का कुत्ता का साडो भाइ हूण बि बड़ी बात हूंद।  
     अजकाल बुले जांद कि पुलिस वाळ अपण टारगेट पूर करणो बान गुनाहगारों तैं त नि पकडदी पर बेगुनाहों तैं पकडदी।  या बात ब्रिटिश काल मा पटवार्युं पर बि लागु हूँद छौ।  स्वतंत्रता आंदोलन का बगत मथिन बिटेन पटवार्युं कुण अंग्रेज साबुं ऑर्डर आंद छौ कि ये मैना इथगा कॉंग्रेसी पकड़ण जरुरी च तो पटवारी लोग कै तैं बि कॉंग्रेसी बतैक पकड़ लींद छा।  वै बगत बि पहाड़ का कॉंग्रेसी शहरूं मा आंदोलन करदा छा जन कि उत्तराखंड क्रांति दल या परिवर्तन पार्टी ग्रामीण कृषि विकास का आंदोलन देहरादून का घंटा घर का तौळ चलांदन।  हमर क्षेत्र मा पटवारी जी तैं खुज्याण से बि कॉंग्रेसी नि मिलेन त पटवारी जीन दसेक इन लोग पकडिन जु हौळ लगाणा छया अर सब तैं पौड़ी लीगेन।  यूं हळयों पर ब्रिटिश सरकार का विरुद्ध साहित्य बँटणो , कुप्रचारो अभियोग लगायुं छौ।  पौड़ी मा  मजिस्ट्रेट साबन कैदियों तैं पूछ कि तुम ब्रिटिश राज का विरुद्ध छवां तो तब सबि  कैदियूं तैं पता चौल कि गुरख्याणि ख़तम ह्वे गे। 
          अबि हमर छ्वाड़ एक घटना ह्वे गे एक पटवारी शिल्पकार छा।  असलम पटवारी या पुलिसमैन की जात नियुक्ति का बगत ही हूंद बाकि तो पटवारी या पुलिस की जात नि हूंद।  हां त एक आदिमन चिरडेक पटवारी चौकी म ऐक पटवारी तैं गाळि देदेन।  पटवारी वै आदिम तैं लेक लैंसडाउन ली गे  अर वैपर जातिगत   शब्दों गाळि दीणो अभियोग मा बंद करै दे।  मजिस्ट्रेट का समिण पता चौल कि अभियुक्त बि शिल्पकार छौ।  राज कैक बि ह्वावो पटवारी अर पुलिस कु काम बेग़ुनाहूं तैं गुनाहगार बणाणो बि च।

***  भोळ कुछ हौर किस्सा 



Copyright@ Bhishma Kukreti  23  /1/2014 



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