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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, July 17, 2012

जिकुड़ी मा लग्यूं तीर -a Garhwali Poem

कवि--डॉ नरेन्द्र गौनियाल

जिकुड़ी मा लग्यूं तीर अब त,प्राण लेकि ही रालो.
जब तलक चुभ्यूं च रैणि दे,इनि बूज सि छेद पर.
वींकी याद धरीं,जिकुड़ी का एक कूणा मा कुटरी सि.
अब  क्वी घचोर्याँ ना,फूटि जालि नासूर बणिकि.

मि बुनूं छौं त बुन दे,यु मेरो दिल कु गुबार च.
त्वे तै पीड़ च त सैले ज़रा,यु तेरो इम्तहान च.

इनु ना रुसै तू हमसे,कबि गलती से बि.
याद आलि जब त्वे,त तू सुरुक ऐ जै.

द्याखा छा जु सुपिना,ऊ सुपिना ही रैगीं.
जौंका बाना छौ खटेणू,ऊ आग बणिगीं.

य दुन्य बि कनि च,अपणोंन ही मारि लूट.
आंखि खुली पता चलि,माया जाळ यु झूठ.

          डॉ नरेन्द्र गौनियाल ...सर्वाधिकार सुरक्षित