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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, July 15, 2012

बिन कांडों का नि खिल्दा गुलाब****** गढ़वाली कविता

कवि नरेंद्र गौनियाल
बिन कांडों का नि खिल्दा गुलाब,मि जणदु छौं.
पण अपणा नसीब मा फूल ना,सिर्फ कांडा छन.

सुपिना त सुपिना ही च,असलियत से दूर.
ऊ नि आंदा असल मा त,स्वीणों मा सही.

वक्त की रफ़्तार तै,समझणु च जरूरी.
यु कमवख्त वक्त,कैका बाना रुक्दू नी.

कब तक रैलि इनि दूर,अन्ध्यरा का सहारा.
उज्यल़ा मा त मि दगड़ी रौंलू,छैल बणिकी.

कुछ बुना कि सजा,इन ना दे तू चुप रैकि.
सजा जु बि दीणे तिन,दे दे तू चट बोलिकि.

चुप रैकि बि सब कुछ,बोलि जन्दिन आंखि.
दिल कि बात दिल मा,दिखै जन्दिन आंखि.

आंखि चिट गुलाब सि,जनि कि धूल जईं होलि.
सच किलै नि बुन अपणी त, निंद ही हर्चि गे.

उंकी याद कबि दिल मा चुभदी,कबि कुतग्यळी लगान्द.
 वक्त-बे वक्त इनि कबि रुवांदी च,त कबि ख़ित्त हसांद.

डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित.
Modern Garhwali Literature Series
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