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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, July 24, 2012

म्यरों भै--वृक्षारोपण पर गढ़वाली कविता


[वृक्षारोपण पर गढ़वाली कविता]
 
कवि - डी डी सुंदरियाल "शैलज
जै दिन  पर मी हूंउ
म्यार बूबाजीन
अप्णा बूबजिकि खणी सग्वड़ी म
एक आरू की ड़ालि लगाइ
ब्वै न मी दुदी पिलाए
त बूबाजीन वीं ड़ालि पाणि द्याइ ।
जनि-2 मि जवान हूं
त व ड़ालि बि बड़ी हवाईं
मिन घौर-बोण सम्हाल,
ब्वै-बाबु स्यवा काय
त वीं डालिन हमू मिठा-मिठा आरू दीनि
म्यरा बुबाजी बोलदा छा
(अर म्वर्द-म्वर्द भि बोल्णा रेनी )कि
 म्यारा द्वी कमोत नोना छन, अर
एक दिन त मजा ही ऐग्या,
म्यारा ब्यो का सालो बसग्याल
मेरी “व” आरू तोडनों चलिग्या
बल “हे ये डाला पर बिलकी मेरी चदरी फटिगे,
मीन बोली  “ डालु नि, त्यारू द्यूर छ वो
क्या ह्वै जो वैन जरा  मज़ाक करी दे॰।“
अर वो दिन भि ऐनी,
जब म्यारा द्वी नौना
रात दिन काकाकि
धोणइम चढ़ीआन रेनी
अर आज तिन या डालि काटि द्याइ,
डालि नि काटि दिदा
तिन म्यरू भै मारि द्याइ।
सर्वाधिकार - डी डी सुंदरियाल "शैलज