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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, July 15, 2012

घुघूती का आंसू *********एक गढवाली कथा

कथाकार - डॉ नरेन्द्र गौनियाल
हमर घर का नजदीक एक भ्यूंळ कि डालि छै.वैमा घुघुतु अर घुघूतीन एक घोंसला बणायु छौ,पण कैते बि भनक नि लगी.हम लोग घर का चौक मा झुल्ला कु गिन्दू ख्यल्दा छाया.एक दिन ख्यलंद दा गिन्दू डाळमा अटगी गे.रामू डाळ मा गे अर वैन गिन्दू निकाळी दे,पण इतना मा वैकि नजर एक दुफौन्क्य भौंटु पर पड़ी,जैम घुघूतकु घोसला बन्यूं छौ.घोसला मा चार अंडू छाया.ऊ जनि घोसला का नजदीक गे,घुघुतु अर घुघूती डाळी का टुख ऐकि गुटुर-गुटुर कन लगी गीं.
        रामू भुयां ऐ अर वैन सबि छोरी-छोरों तै बताए दे.तब एक-एक कैकि सबि डाळमा गैनीं अर अंडू द्यखण लगिगीं. क्वी-क्वी हथल्य़ाणा बि रईं..वैदिन खेलिकी सबि रुमुकीदा अपणा घर चलिगीं..हैंका दिन ऐतवार छौ.सबि ख्यलणा कु जल्दी ऐगीं.घोसला मा अंडू द्यखणे रौंस लगीं रैंदी छै.झाबर सिंह बि डाळमा गै.वैन द्वी अंडू हाथ मा पकड़ी,पण एक हाथ बिटि छूटिगे अर भुयां पड़ीकै फूटिगे.दग्ड़योंन बोलि कि क्य कैरि तिन यु.वैन बोलि कि मिन जाणि-बुझिकी नि फोड़ी.तुम कैमा नि बोल्यां.पल्य़ा ख्वाळ बोडी मा बि ना अर म्यारा ब्वे-बाब मा बि ना.
         लोक परम्परा मा चखुलों का प्रति विशेष प्यार-प्रेम,दया,अहिंसा कु भाव रैंदु छौ.सब बड़ा इनि समझांदा छाया कि घुघूता,घिनुड़ा,सटुला य  कैबि चखुला का अंडू नि फ्वड़न चएंद.जु फ्वड़दू च,वैकि आंखि फुटि जन्दिन.झाबर सिंह कि जिकुड़ी मा बि धमाक लगीगे कि कनि गलती ह्वैगे.मेरि मांजी उर्ख्यल़ा मा धान कुटणी छै.रोज कुटंद दा चखुला चौंलों का बियां टिपनौ ऐ जांदा छाया.आज बि घुघुतों कु घुर-घुराट अर घिनुड़ों कु चिंचाट हुयों छौ,पण एक घुघूती छ्वाड पर चुप, उदास सि बैठीं छै.वींकी आंख्यों अंसधरी लगीं छै.
          ब्यखुन्द दा मांजीन खांद दा पूछी,''ये तुम छोरी-छोरा चखुलों का घोसला मा छेड़खानी त नि करदा.'' मिन बोलि ,''ना मि त नि करदू,पण भ्यूंल़ा डाल मा घुघता कु घोल च.वैमा पैलि चार अन्डू छाया,ब्याळी झबरू से एक फुटिगे,अब तीन रैगीं''.मांजिन  बोलि कि,''ओहो ! तबी त मि स्वचनूँ छौ कि एक घुघूती चुप किलै बैठीं छै अर वींका आंख्यों मा अंसधरी बि अईं छै.''
            हैंका दिन जनि ब्यखुन्या छोरी-छोरा ख्यलणकु ऐनी,मांजी चट्ट एक कंडाळी कि मोटी ढींग लेकि ऐगे अर बोलि कि,''आज बिटि यख मा ख्यलना कु नि अयाँ.कैन बि घुघूती का घोल पर छेड़खानी करि त कंडाळी कि ढींग देखि लियां तब. कंडळी देखि कै सबि भाजि गीं.हैंका दिन बिटि वखमा क्वी बि ख्यलना कु नि आया. ना ही घोसला पर छेड़खानी करि.कुछ दिनों मा ही अण्डों से फतेला ह्वैगीं अर बाद मा बड़ा ह्वैकी फुर्र्र उडी गीं.

       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित