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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, July 22, 2012

सौगात-- पाराशर गौड़ की कविता


कवि - पाराशर गौड़
सौगात
सौगात
कई सालो के बाद
गया था भारत - सोचा
कुछ रेस्ट करूंगा
मिलकर पुराने मित्रो से
पुरानी यादे ताजा करूंगा !
उन दिनों वहा
शादियों का था मौसम
बातावरण सुवाहने थे
ऐसे में हमको शादियों में सम्मलित होने
इनविटेशनो पे इनविटेशनो आ रहे थे !
एक शादी में तो हमको
विषेशरूप से था बुलवाया गया
ये है विदेश से .......
इनका विशेष ख्याल रखा जाया
एसा सब से कहा गया !
दोस्तों .............
वो शादी येसी हुई
जिसमे सब कुछ गडबडा गया
हम - हम ना रहे .......
हमारा थोबडा तक बिगड़ गया !
जैसे पहुंचे वहा
बोले सब आओ आओ
अम्मा बहुत दिनों के बाद आये हो
शादी का लुफ्त उठाओ !
पाच बजे से पहले तक
मिल रहे है थे एक दूजे से गले
कुसल छेम पूछ पूछ कर
नहीं वो थकते थे
है कितनी चिंता उनको उनकी
येसा प्रेम जता ते थे
जैसे ही सूरज ढला
बाराती बोले.......
अरे .., कहा है दुल्हे का बाप
पूछो उससे कहा है इंतजाम
कहा है .... बोत्तले !
बैठक में था खाने-पिने का
आयोज़म ......
रंग-बिरंगी बोत्तालो के साथ
था रखा तरह तरह के ब्यंजन !
ढकन उखड़े ...
बोत्तले खुली
पैग पर पैग चले
मुर्गी की टाँगे हिल्ली !
एक दो पैग तक तो
सब ठीक थे ....
दो चार के बाद तो
कोइ आडा , तो कोइ तिरछे हो रहे थे
कि, तभी ...
जाने बातो बातो में क्या बात होई
बाक युद्ध होते होते
हात्ता पाई सुरों हो गयी
देखते देखते ....
बैठक बन गयी अखाडा
किसीने किसी कि तोडी बहे
तो किसीने किसीका जबडा उखाडा !
पैंट पतलून और कुरते कि
हालत देखते बनती थी
किसीका कालर गायब
तो किसी कि बाहा फट्टी थी !
कही चावल बिखरा था
तो कही बिखरी थी दही
ऐसे में कुर्ता कुर्ता न रहा
पतलून पतलून न रही !
थे सराबी छुम रहे थे सब
चडा नासा था गाडा.....
एक हाथ से थामे गिलास
तो दुसरे से पकडे नाडा !
खैर .................
जैसे तैसे बरात चली
होते होते मोहला- गली-गली !
पहुँचते ही दुल्हन के घर
फिर शराबी फ़ैल पड़े
मार मार के भडके
एक दुसरे पर टूट पड़े !
हाथ जोड़ दुहाले का बोला बाप
अर्र रे .. ये क्या हो रहा है
कुछ तो शर्म करो
क्यूँ हमारी इज्ज़त का तुम
सर आम फलूदा बना रहे हो !
रुको रुको ये भाई ....
हम बदनाम होजायेगे
रुके बात हमारी मान जाइए
तभी एक शराबी बोला
.".अछा.............. "
ये बात है तो हमें
एक पावा दो हम चोप होजायेगे !
किसी तरह मामला सुलझा
सब सुस्ता ये
पाणिग्राहन के समय
कोइ सज्जन हमें अंदर ले आये !
बैठे थे चुपचाप सभी
कि अचानक ..
एक आवाज़ आई तभी
" कोई हमें छेड रहा है "
बाराती कोइ शरारत कर रहा है !
इतना कहना था कि ...
दुल्हन्वाले बारातियो पर टूट पड़े
जिस को जो मिल्ला वो
उसी पर पिल पड़े
हम भी लपेट में आये
घुसे लात भाया ...
खूब बरसे- खूब खाये !
मै -- बोला भाई
ज़रा छमा करो
हम विदेश से आये है
तिनिक रहम करो !
मारके घुसा हमें दबोच लीया
मचाके शोर कहने लगा ..
किथी जिसने शरारत
पकड लिया... पद लिया !
हमें दे कितनी सफाई
पर वो एक न माने
जो भी आता हमें
धुन के जाते !
किसी तरह हम
बच बच्चा के वहा से निकले थे
मुह पर हाथ लगाया तो
ओंठ फटा , दो दांत गायब थे
भारतीय शादी का लुफ्त
गए थे किसी तरह झूटे
टूटे दांतों कि सौगात लेकर
भया वाह से लौटे !
सर्वाधिकार @ पाराशर गौड़ , कनाडा , जुलाई २०१२