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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, August 29, 2013

सैकड़ो साल पुरण बौड़ौ डाळ कटि गै

भीष्म कुकरेती  

              म्यार ददा बुल्दा छा बल यू बौड़ौ डाळ म्यार बूड ददा का पड़ददा का बि पड़ ददा से बि पैल बिटेन इखम छौ।  इखमा ददि ददा तैं दनकांदि छे बल सीधा ब्वाला ना कि गां बसण से बि पैल यु बरगदौ डाळ इखम छौ।  
ब्याळि वू ऐन अर ये सैकड़ों साल पुरण बौड़ौ डाळ, कथगा हि ग्वाळ ( तना ) वाळ डाळ काटि चलि गेन।  
यु बट वृक्ष नि कट हमर गांवक पछ्याणक, हमर गौं विशेषता हि कटि गे।  हमर गाँवक नौं हि बौड़ तौळक गाँ छौ अब बौड़ कटे गै त हमर गौंवक  नौ बटबिहीन गौं त नि ह्वे जालु ?

 सैकड़ों साल पैल जु कीड़-मक्वड़ ये बौड़म  ऐ होला अर अब उंकी नसल जो ये बौड़ पुटुक पऴदि -भरदि छे उ कख जाला ?
सैकड़ों किसमौ कीड़-मक्वड़ अलग अलग किसमौ चखुलों तै आकर्षित करदा छा अब जब वो कीड़ नि छन त क्या म्यार गाँ मा अलग अलग किसमौ चिड़िया आलि? अर आलि बि त जब बौड़ नि द्याखल त क्या वु  चखुलि निरस्याल ना ? 
जु ये बौड़ का वासिंदा चखुल छया वु अब कख जाला ?
जु अलग अलग समौ पर चीन -रूस बिटेन प्रवासी पंछी आंदा छा , अपण घोंसला बणान्दा छा , बच्चा जणदा छा अर फिर छुट छुट बच्चों तैं लेकि रूस -चीन का तर्फां उड़ि जांदा छा। बौड़ डाळ ऊँ प्रवासी परिंदों कुण प्रसूति गृह बि छौ अर बालबाड़ी बि छौ।  अब कख अपण घोल बणाला ?

वै बरगदौ परताप हमर गां मा सुबेर चार बजे से लेकि रात आठ बजि तलक अलग अलग तरां कि चखुलों बसणो संगीत बजणु रौंद छौ अब हम कखन वो प्राकृतिक संगीत सुणला ?
हर मौसम मा कुछ चिड़िया बदल्यांद छा अर हम तै अलग अलग मौसम मा अलग अलग चखुलुं अलग अलग गीत -संगीत सुणणो मिल्दु थौ अब कखन हम वै संगीत सुणला ?
हमर कथगा इ रिस्तेदार त ख़ास मौसम मा हमर गां इलै आंदा छा कि वो नया नया चखुल देखि साकन।  क्या वो रिस्तेदार अब बि हमर गां आला ?

ये बरगदौ पेड़ तौळ हमर संस्कृति बि पळदि छे -पुसदि छे।  अब कखन हम वीं संस्कृति तै वापस लौंला ?
ये बौड़ डाळौ बगल मा मथै सरा गां कौंक बुसड़ अर लखुड़ु कठघळ छया।  कीट -पतंगों-पंछियुं   कुण बरगद, बुसड़ अर लखुड़ु कठघळ बसेरा अर खाणकौ अटूट समीकरण बण्यु छौ अब वो समीकरण टूटि गै त हमर गांवक वातावरण नि बदल्यालु ? 
ये बरगद क ठीक तौळ बीस पचीस उर्खयळ छया जख हमर गांवक सबि जनानी सटी , कौणि , झंग्वर कुटदा छा । भौत सा चखुल इन्तजार मा रौंदा छा कि जनानी कुटणो आवन अर वो उर्ख्यळो आस पास चुग्गा चुगन ! सुबेर घाम आंदी कुटणो आवाज अर चखुलुं बसणम एक प्रतियोगिता शुरू ह्वे जांद छे।  पता नि चल्दो छौ चखुलुं बसणम जादा मजा च कि कुटणै आवाज मा जादा मजा च।  अब बरगदअ  पेड़ कटे गे त मनुष्य अर पक्षियों बीच जो सामजस्य बण्यु छौ वै प्राकृतिक सामंजस्यौ क्या ह्वाल ? 
ये बौड़ तौळ बच्चों प्ले ग्राउंड बि बणि गे छौ जख सैकड़ों साल से बच्चा खेल खिल्दा छा ? अब बच्चों कुण नयो प्ले ग्राउंड कु बणाल? 
हमर गोर बछर , कुत्ता, बिरळ  बि छैलौ  बान दुफरा मा ये बरगदौ डाळ तौळ बैठि जुगार लींदा छा।   
ये  बरगदअ  तौळ पथर घिसे घिसेक अफिक बैठक बणि गे अर सैकड़ों साल से बैक , बड़ा छुटा इखम उठदा- बैठदा  छया।  इख तलक कि पंचैत बि इखमि बैठदि छे।  ब्यौ बरात्युं कुण फौड़ बि इखमि बौड़ से हटिक  दस गज दूरम   पकदो छौ।   अब कखम लोग छैल लाला अर कखम दगड़ि  बैठला  ?

 अब यू बौड़ कटि गे।  सैकड़ो साल बिटेन जु गांवक इतिहासौ गवाह छौ , जो हमर गांवक विरासतौ पोषक छौ वो ब्याळि काट दिए गे।  
मोटर सड़को रस्ता मा यू डाळ आणु छौ त यू बौड़अ  कटे गेयि।  
पण दस मीटर तौळ बि त मोटर सड़क जै सकदी छे ? 
अब ये बौड़ तै जळैक क्वीला बणल। क्वीला बिचे जाला  अर वै पैसा से आधुनिक सुविधा संपन एक अति आधुनिक पंचैत घर बौणल।  सैकड़ों साल की विरासत जळैक विकास अर आधुनिकता लयाणि च ।     
      

Copyright@ Bhishma Kukreti 30/8/2013