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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, July 15, 2016

क्या फबस , लीवर , गुर्दा भी कछबोळी का हिस्सा होते हैं ?

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                           क्या फबस , लीवर , गुर्दा भी कछबोळी  का हिस्सा होते हैं ?
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                               बखर भड्याणो अनुभव  
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                        हौंस  ही हौंस  मा हिंसात्मक  संस्मरण  :::   भीष्म कुकरेती 
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                            हमर गाँव बामणु अर शिल्पकारुं गाँव च , अद्धा -अद्धा  जनसंख्या , अब शिल्पकारूँ जनसंख्या अधिक च।  बौण -जंगळ ? बेटी ब्वार्युं तैं दुसर गांवुं जंगळु चोरी विशेषज्ञ बणन  जरूरी छौ घास हो , लखड़ हो या माळु  लाब  ह्वावन सबुं कुण दुसर गांवुंक मेहरबानी  आवश्यक छे।  तो इन मा घ्वीड़ -काखड़ु अयेड़ी खिलण  अर कुखड़ु मरणो बान जिवळ लगाण  इतिहासुं  से त ना पर हमन अपण गांवक लोककथाओं से इ जाण।  द्वी चार मौं का बखर छया अर बाघ चित्रों मा पाये जांद छौ तो बखर्या  केवल स्याळु से डरदा छा । याने बखर मरण हमर गांवक संस्कृति छै त छे अवश्य  किन्तु सौ साल पैली। गदनम माछ ? रगड़ तैं हम गदन बुल्दां आज बि।  मतबल !  हमर वरिष्ठ सहचर , वरिष्ठ मनिख अर वरिष्ठ नागरिक डौख ( टैडपोल ) दिखैक माछुं जानकारी दींदा छा।  इन मा हमर गाँव वळ बलपूर्वक शाकाहारी रौंद छा।  इख तलक कि दिबतौं पूजा बि रोट या प्रसाद काटिक हूंदी छे , कबि कबि सालों मा  यदि बक्की गांव वळु पर मेहरबान ह्वे जावो तो चार पांच सालम एक बुखट्या ही शहीद हूंद छौ।  हमर गाँव बिटेन मवरां मुंबई का सेठ छन किन्तु  भौत कम इ मुंबई का सेठ बखर कटद छा।  याने जब मि दर्जा  पांच या चार मा रै होलु तबि मीन बखर कटद देखि , तबि बखर भडेंद देखि अर तब ही कछबोळी  बणद  देखि। 
                     पचास -पिचपन सालै पैलकि बात च।  नागराजा का मंदिर का समिण तीन फुट्या जगा मा  अळप्या बूडान बखरौ मुंड धळकै।  कुछ ऊर्जावान युवाओंन मुंड अर धड़ का तौळ फटाफट थाळी लगैक ल्वै जमा कार। फिर पूजा अदि ह्वे ह्वेलि अर फिर कट्यूं बखर विशेषज्ञों तै सुपुर्द करे गे।  
          बलवान युवा  बखर , स्यूं मुंडक  धरडौ पास लैन अर उखम एक बखर विशेषज्ञन अंदड़ -पिंदड़ फत्तू दा  सुपुर्द कर देन।  मीन कुछ देर तलक फत्तू दा तैं अंदड़ पिंदड़ पाणी धरड़ तौळ धूंध द्याख।  तब पता चल कि अंदड़ो पुटुक एक एक रति भर बि बकर्वेळ रै गे  त सरा कछबोळी कड़ो ह्वे जांद।  मीन फत्तू दा तैं अंदड़ पुटुक पाणी भरद द्याख ,  अंदड़क एक छोर  पर हाथ धरद द्याख  अर फिर दबैका खैंचद द्याख जांसे बकर्वेळ भैर ऐ जावन।  यु अनुभव कई साल बाद मि तैं मुंबई मा काम ऐ जब मि तैं अपण घौरम  अंदड़ साफ़ करण पोड़िन।          जब विशेषज्ञों हिसाब से अंदड़ साफ़ ह्वे गेन त एक थाळी पर  अंदड़ उख लाये गेन जखम बखर भड्याणो आयोजन छौ।  या एक सन्नी /छन्नी छै। 
          घास , लखड़ , क्याड़ -स्याड़ का मथि आंत विहीन बखर अर  मुंड विराजमान छौ।  फिर  घास , लखड़ , क्याड़ -स्याड़ पर आग लगए गे। छुरा -चक्कू -गंडसु -बसूला सब तैयार छौ।   विशेषज्ञ सब तैं समझाणा छया कि बखर भड्याण न्यूक्लियर बम्ब हैंडल करण से अधिक संवेदनशील च।  कम भड़ेल्या तो लुतकी खाण से करास बि ह्वे सकद अर बाळ बि रै जाला।   अर यदि बखर अधिक जळि गे तो बाळ त जळ जाला किन्तु खाल अधिक जळि  जाली अर तब कछबोळी  कड़ी ह्वे जाली। फिर जब विशेषज्ञों का  विश्लेषणनुसार बखर भड़ये गए तो अस्त्र -शस्त्र का खेल चल। खाल  खरसोडे गे ,  खाल  उतारे गे , आदि  आदि।    कछबोळी तै उखमि तळे गे , कुछ कछबोळी हम सब्युंन  चाखि जौं जौंन कार्य मा अपण श्रमदान कार या दर्शक की भूमिका निभाई।  कटीं शिकार, भड़यां डौण अर कछबोळी  ऊंक ड्यार भिजे गे जौंक नागराजा पूजै छे।  
    चार पांच घड़ी तो लगी होला सैत ये पूरा कर्मकांड करणम  ।  एक बात  आज बि याद नी आंद कि  फबस , गुर्दा, लीवर   आदि बि कछबोळी का हिस्सा हूंदन क्या ? आप बथै दियां जरा। 
                             

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16/7/2016 ,Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।

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