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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, October 14, 2014

दस हजार की लूट

स्किट स्क्रिप्ट ::: भीष्म कुकरेती 


 द्वी झण बुड्या -बुडड़ी खुसी खुसी बैंक से भैर आंदन।
एक गिरहकट - यार ! सि द्वी ऐगेन हमर मुर्गा ! सि  पैसा गाडिक बैंक से भैर आणा छन। अर तौंक खुसी बताणि च बिंडी पैसा निकाळ तौन !  
हैंक गिरहकट - हाँ ! हाँ पक्का मुर्गा इ छन।  जरा सुणदा  क्या बुना छन। 
पैलो गि . - हाँ उन बि तौंतैं कै कुण्या पर हि दबकाण। 
बुड्या - एक लाख मादे दस हजार आज निकाळ ऐन तो बि नौ एक लाख तक त बैंक मा छै छन। 
बुडड़ि - हाँ भौत छन।  अपण साल भर तक खुसी खुसी काम चल जाल। 
बुड्या - दस हजार छन।  अक्वैक सम्भाळ हाँ !नवा कखि !
बुडड़ि - नै नै सम्बाळिक धर्यां छन। 
बुड्या - अच्छा सूण ! जरा ब्वारी तैं समझाये कर कि जब बि बुलण त ठीक से बुलण। 
बुडड़ि-कनो ?
बुड्या -अरे ब्वारी तैं बुलण चयेंद तैं सुनहली थाळी गाडो , रजत कलर की प्लेट निकाळो आदि आदि 
बुडड़ि-हाँ ! समझाई च पर तैंक समज मा नि आंद कि कन बुलण चयेंद। लखपति छंवां तो लखपति जन बात करण चयेंद 
बुड्या -समझा ! समझा ! निथर मि तैं इ समझाण पोड़ल।  
बुडड़ि- न ना ! मि समदै द्योल। 
पैलो गिरहकट - सुनसान कुण्या ऐ गे।  दबका तौं मुर्गों तैं पूरा दस हजार छन तौमां 
दुसर गिरहकट - ऐ बुड्डी  ! निकाळ तौं दस हजार रुपया !
 बुड्या - अरे हम त गरीब -गुरबा छंवां !
पैलो गिरहकट छुर्रा दिखैक - हाँ हमन सुणि याल तुमरि छ्वीं।  सुनहली थाली , रजत रंग की प्लेट ! 
दुसर गिरहकट -बैंक माँ नौएक लाख रुप्या जमा    … 
बुडड़ि (अपर ब्लाउज पुटकन रुप्या निकाळिक गिरहकट का हाथ मा धरदी )-  मुकदान लगल तुमर !
पैलो गिरहकट - सौ रुप्या ! बस ?
दुसर गिरहकट - बेवकूफ समज क्या तुमन हम तैं ? तुमन  बैंक से दस हजार निकाळिन 
बुड्या - तो पूरा दस हजार इ त  छन। 
पैलो गिरहकट - अबे बुड्डे ! ये तो सौ रूपये हैं।  बाकी नौ हजार नौ सौ भी निकालो। 
बुड्या - हाँ पर सि सौ रुप्या इ त दस हजार पैसा छन कि ना ?
द्वी गिरहकट - क्या मतबल ?
बुड्या - हाँ दस हजार पैसा।  हम हमेशा खुस रौण चांदा तो हम रुप्या नि गणदा बल्कि नया पैसा का हिसाब से गणत करदां।  
गिरहकट - मतलब तुम लखपति नि छंवां ?
बुडड़ि - किलै ना ? पैसा तैं  इकाई मानो तो वै  हिसाब से हम लखपति  छंवां कि ना ? 
बुड्या -  खुस हूणो बान हम धन तैं रुपया मा ना पैसों मा  गणदा ! हम इन नि बुल्दां कि हम पांच रूप्याक टमाटर लवां बल्कि बुल्दां कि हमन आज पांच सौ का टमाटर खरीदेन 



Copyright@  Bhishma Kukreti  14/10 /2014       
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लेख में  घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख  की कथाएँ चरित्र व्यंग्य रचने  हेतु सर्वथा काल्पनिक है



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