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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, October 27, 2014

गौं मा हम नेतृत्व गुण कनै सिखदा छा !

आपकी , अपणी  आत्मकथा , खुदेणो कथा , भाग -2        
                                              खुदेड़  :::  भीष्म कुकरेती 

             हमर टैम पर सरकार नेतृत्व गुण सिखाणो बान चिंतित नि छे , फिकरमंद नि छे , शायद कॉंग्रेसी जवाहर लाल नेहरू से बड़ो नेता पैदा नि करण चाणा होला।  इलै नेतृत्व गुण सिखणो , लीडरशिप क्वालिटी  सिखणो या हेडशिप सिखणो क्वी संस्थान , संस्था , सभ्यता हमर गौं इ ना पौड़ी , टिहरी,  मा बि नि छे अर  कमिश्नरी कुमाऊं मा बि नि छे । चूँकि ब्वे-बाब अर काका -बाडा स्वतंत्रता का बाद बि राजा ,  पधानचारी अर पटवारीगिरी मा विश्वास करदा छा तो समाज मा नेता पैदा हूणों द्वार बंद ही छया। 
     बचपन मा हमन जु बि गुण सीखेन वु सब दैब दत्त प्रकृति से ही सीखेन। 
             हमर कूड़ो  चार पांच फांग तौळ एक बड़ो याने गांकी चवद्दी मा सबसे बड़ो डाळ सिमळौ डाळ छौ।  हर समय यु डाळ हम तैं याद रौंद छौ।  त म्यार दादा जी से लेकि अर मेरी साखी /जनरेसन तलक का बच्चोंन सिमळौ डाळ से अफिक सीख कि यदि तुम बड़ो ह्वेल्या तो लोग तुम तैं 
हर समय याद कारल।  इलै हमर गांवक बच्चा अपण ऊंचाई बढ़ाणो बान रोज सुबेर बि अर श्याम बि कामना करदा छा कि गां मा सबसे ऊंचो मनिख ह्वे जौं।  चूँकि क्वी इन नि सिखांद छौ कि केवल इच्छा से ही मनिख ऊंचो नि ह्वे जांद अर इच्छा पूर्ति वास्ता काम करण पोड़द तो चैक बि हमर गांमा कैक बि उंचाई छै फिट तो छवाड़ो पांच फिट आठ इंच से अळग नि गे।  
     पल्ली सारि ना उल्ली सारी मा ही एक बेडुक  बड़ो ऊंचो डाळ छौ पर वै डाळ पर बेडु दाण आदि नि लगद छा अर थोड़ा दूर एक छुट बेडुक डाळ छौ जैपर झक्क फल लगदा छा।  वीं जगाक नाम छौ बेडुक सारि अर यु नाम वै बड़ा बेडुक डाळौ नाम पर ही पोड़ , किन्तु यु बेडुक डाळ रोज गाळी बि खांद छौ कि इथगा बड़ों डाळ ह्वैक बि हमर काम नि आंद।  अर जु छुट बेडुक डाळ छौ वैक प्रति सब्युंक आदर छौ कि छुट ह्वैक बि हमतैं फल खूब दींदु।  हम बच्चों मध्य ये पर बड़ी बहस हूँदि छे कि फलहीन ऊंचो /बड़ो हूण अधिक फायदामन्द हूंद कि छुट ह्वैक फलदार हूण अधिक सही हूंद।  या बहस हमेशा अंतहीन बहस हूंदी छे , किलैकि वै बेडुक ऊंचा हूण से वीं जगाक नाम बेडुक सारि पोड़ किन्तु सब लोग बड़ै तो छुट बेडुकी ही हूंद छे जु फल दींदो छौ।  पर कुछ समय बाद हमर समझ मा ऐ गे कि फल द्यावो ना या द्यावो किन्तु बड़ो हूण जरूरी च।  डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की सड़क छे तो हमर गाँसे दुसर गां तक कु रस्ता का नाम रखे गे फिरोज गांधी मार्ग।  हमर बुबाजी तो छोडो हमर नात्यूं तैं बि नी पता कि फिरोज गांधी कु छौ अर फिरोज गांधीन हमर गाँवकुण कार क्या च कि जु वैक नाम से हमर गांवक सड़कौ नाम फिरोज गांधी मार्ग धरे गे ? फिरोज गांधी मार्ग से हम मानी गेवां कि फल द्यावो या नि द्यावो किन्तु यदि तुम बड़ा छा तो तुमर नामसे सारिक नाम या सड़क कु नाम पौड़ी जालो।  अब ऊंचो हूण चयेंद कि फलदार हूण चयेंद की बहस नि हूंदी।  
         फिर हमन पौढ़ कि वै ताड़क डाळक क्या फैदा जु पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर।  किन्तु सच्ची बताऊं तो में सरीखा गढ़वाळी तैं या कविता बिलकुल समज मा नि आंदी , बिलकुल पसंद नी च , कुज्याण किलै या बेकार कविता स्कूलों सिलेबस मा रखे गे धौं ! चूँकि हम तैं ,परिवार  समाज नेतृत्व गुण पैदा करणो गुर नि सिखान्द छा तो हम प्रकृति से ही नेतृत्व का गुण सिखदा छा।  हमन प्रकृति से ही सीख कि  फल जथगा दूर ह्वावन , फल तुड़न मा जथगा मसुकिल हो , फल पाण माँ भयंकर परेशानी हो तो हम वै डाळ अर फल तैं अधिक महत्व दींदा छ।  जरा तुमि घड्यावदी , स्वाचदी , विश्लेषण कारदि कि   हम अखोड़ , बेडू , तिमलू , किनग्वड़ , हिसर , काफ़ळ , लिम्बु आदि फलों तैं अधिक तबज्जो , महत्व , इज्जत इलै दींदा किलैकि यूंक फल तुड़न , कट्ठा करण सरल नी हूंद।  फलों का सरताज श्रीफल की पूजा ही इलै हूंद कि श्रीफल तुड़न अति कठण हूंद।  जब कि खैणुक फल ग्वाळ पर ही लगदन अर डम्फु (बेरी ) तैं तुम भीम बैठ्याँ ही तोड़ सकदा तो आज तक हमर लोक गीतों , लोक कथाओं अर आधुनिक काव्य -कथाओं मा खैणु , डंफु कु उदाहरण नि मिलद। त हम बच्चौं तैं बचपन से ही पता चल गे छौ कि यदि तुमन बड़ु आदिम बणन तो कैक बि सौ सहायता सुद्दी , सरल , बेवजह ढंग से नि करण चयेंद अपितु अहसान दिखैक , जोर जोर से हल्ला कौरिक , लज्जित करिक ही सहायता करण चयांद।  तबि त आजकल बड़ो नेता वी माने जांद जु गायब रावो,जु कार्यालय, घौर या कखिम बि मुश्किल से मीलो,  अर जु बहुत देर से आपकी मांग पूरी कारो।  

अजकाल कॉंग्रेसी मोदी की काट , मोदीकी आलोचना करदन  , मोदी तैं फंडधुळया बतौंदन किलैकि मोदी छुटि से छुटि घटना तैं इवेंट मैनेजमेंट का द्वारा बड़ो सिद्ध करी दींद।  कॉंग्रेस्यूं का मोदी पर आरोप च , उंकी नरेंद्र भाई पर भगार लगाईं च , अर कॉंग्रेस्यूंन हार बि मान याल  कि नरेंद्र मोदीकी मार्केटिंग प्रभावकारी च।   हमन अपण बचपन मा मोदी स्टाइल मा मार्केटिंग सीखि आल छे पर हमर कॉंग्रेसी जन कि अपणा हड़क सिंग आदि अब बिसरी गेन।  हमर आस पास छोया या झरना फुटदा छा।  बहुत सा झरनौ मा पाणि भौत बगद पर हल्ला भौत इ कम हूंद किन्तु अधिकतर झरनों मा पाणी थोड़ा ही बगद किन्तु स्वीँसाट , फुंफ्याट इथगा जादा हूंद जन बुलया यु झरना ही असली गंगा हो।  जरा देव प्रयाग मा जावदी तो भगीरथी क्या आवाज करदी अर अलकनंदा बिलकुल शांत पर अर इनमा भगीरथी की पूछ अधिक हूंद।  त हमन बचपन से ही सीख ऐ छौ कि पाणी कम बि हो तो बि स्वीँसाट -फुंफ्याट , हल्ला गंगा से अधिक कारो।  मार्केटिंग का यी गुर हमन अपण झरनो से ही सीखि आल छौ।  चूँकि राहुल बाबा देवप्रयाग नि गेन तो ऊंन नि सीख कि पॉलिटिकल मार्केटिंग मा हल्ला बि जरूरी च।
रिक , बाग़ , स्याळ आदि जानवरों से बि हमन नेतृत्व की आवश्यकता जाणी।  
 हमन प्रकृति से ही नेतृत्व गुण सीखेन , प्रकृति से अग्नै आणो गुर सीखेन किन्तु फिर भी हम पिछलग्गू ही छंवां। 


*** भोळ पढ़िए कि हमें नेतृत्व गुण न पनपें हेतु क्या क्या आवश्यक कार्यवाही या सवधानी बरती जातीं थीं 

Copyright@  Bhishma Kukreti  27  /10 /2014       
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लेख में  घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख  की कथाएँ चरित्र व्यंग्य रचने  हेतु सर्वथा काल्पनिक है



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