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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, August 26, 2012

मंगलेश डबराल अर माहि धोनी महाकवि कालिदास क इंटरव्यू बीच मा किलै ऐन ?


 भीष्म कुकरेती
- महाकवि कालिदास श्री ! समनैन

-वत्स अल्ल्ट स्वामी ! प्रणाम करणा इ त संस्कृत भाषा मा प्रणाम कारो .प्राकृत भाषा मा प्रणाम असंस्कृत मनिखूं काम च .

- अब क्या कौरु माराज ! आप सरीखा महान ग्यानी ध्यानी अपणि बोलि तै पैथर धकेल सकदन पण में सरीखा आम मनिख कि प्रकृति मा अपण दुध बोलि छुड़ण कठण च अर हम आम मनिख इन समजदवां बल अपणि दुध बोलि तै पैथर धक्यलण माने ब्व़े बाबु तै लत्याण

- बत्स तुम मा मी मा यो इ अंतर च. त्यरो ज्ञान में से भौत बिंडी ह्वालू सैत. . पण सम्राट विक्रमादित्य में तै बिंडी महत्व दीन्दन. अर मि अफु तै उज्जैन कु नागरिक माणदो . मेरो हरेक काम अर कर्तबुं उज्जैन प्रेम इ दिख्यांद .लूण खाओ जखाक गुण गाओ तखाक.

- पण रघुवंशम रचयिता श्री ! क्या तुमारु मातृभूमि क प्रति क्वी कर्तव्य नी च ?

-वत्स अल्लट ! मातृभूमि भूमि महत्वपूर्ण होंदि या कर्म भूमि महत्व पूर्ण होंदि ? यू बड़ो गूढ़ विषय च .आज बि मर्मग्य याँकि छाण निराळ नि कौरी सकिन कि को महत्वपूर्ण च - मातृभूमि या कर्म भूमि !

-पण कवि श्री ! मातृभाषा अर मातृभूमि क बि त क्वी उधार हूंद क्वी पगाळ हूंद . अर यूँ दुयुंक पगाळ बौड़ाण बि त उथगा इ आवश्यक च जथगा कर्मभूमि तै महत्व दीण ?

-प्रिय निर्णयामृत कु रचयिता अल्ल्ट ! जैकी जथगा पुन्यात हूंद वै तै उथगा इ खुट पसारण चयेंदन. पुन्यात से भैर खुट पसारण से इहलोक बि नि सुधरदो अर परलोक लैक बि नि रौंदो

- पण हे अभिज्ञान शाकुंतलम कु रचयिता ! क्या कर्म भूमि तै सुदारदो सुदारदो मातृभूमि तै बिसरण उचित च?
- संस्कृत कु महान गढ़वाली लिख्वार अल्लट श्री ! कबि कबि मातृभूमि तै कर्मभूमि को पृष्ठभूमि मा रखण इ उचित होंद
-विक्रमोर्व्सियम रचयिता कालिदास श्री ! पण क्या कर्मभूमि क रखरखाव कु दगड मातृभूमि चिंतन बि त ह्व़े सकुद ? अर प्रवास मा कर्मभूमि मा कर्म करद-करद , प्रख्याति पांद पांद मातृभूमि चिंतन अर मातृभूमि दर्शन बि त ह्व़े सकुद कि ना?

-वत्स अल्ल्ट ! तुमन पातंजलि योग संहिता बांची इ ना वांक मर्म बि बींगी ह्वाल ? उखमा योगी बणणो बान ध्यान को कथगा महत्व च ?
- ऋतुसंहारम का महाकवि श्री ! ध्यान से इ क्वी बि साधारण मनुष्य महान योगी बौण सकुद .

-त वत्स ! जु मै सरीखा उज्जैन मा रौण वळु प्रवासी जु मातृभूमि तै बीच मा लौलु त क्या मि अपण करमु मा व्यवधान नि लौलु? अर अफिक व्यवधान लाणो मतबल च ध्यान भंग अर ध्यान भंग माने अपणी आजीवका वृति क दगड शत्रुता करण . वत्स अल्लट ! क्या आजीविका वृति क दगड व्यवधान नामौ शत्रुता क्या उचित च ?

- हे मेघदूत को लिख्वार ! आजीविका त पशु कर्म च पण आप त मनिख छन , आप कवि छन

- वत्स ! आजीविका इ मनुष्य कि कोटि मा भेद लांद . उच्च कोटि, मध्य कोटि या निम्न कोटि का भेद सौब आजीविका से इ बणदन . त कै बि प्रवासी क कर्तव्य च कि वो अपण आजीविका पर पैल ध्यान से बि बिंडी ध्यान द्याओ . कै बि प्रवासी तै हमेशा उच्च कोटि पद प्राप्ति क बान श्रम , परिश्रम करण ही उचित च .

- मलिकाग्निमित्रम का रचंदेर ! तुमारो मन्तव्य च कि चाहे मातृभूमि चिंतन, मातृभूमि प्रेम तै पैथर धकेले जाओ क्वी बुरो नी च .

-देखो वत्स अल्ल्ट ! तुम गंगा बद्रिकाश्रम निवासी इख उज्जैन मा ऐक सौब से बुल्दवां कि .मि अलकनंदा तीरे कविल्ठा ग्राम को छौं त यि तबी बुल्द्वां जब मि उच्च पदासीन होऊं . इख अलकनंदा छालो भौत सा प्रवासी छन अर वो निम्न पद पर छन. क्या तुम उंकी सुद बि लीन्दा? उल्टा जब वो निम्न पदासीन लोक मिल्दा बि छन त तुम गंगा निवासी बथान्दा बि नि छंवां कि इ निम्न पदासीन लोक तुमारो क्वी सम्बन्धी छन . त प्रवासी तै पैल उच्च पद कि कामना करण ही अधिक श्रेयकर च अर यांक बान आजीविका पर अति ध्यान दीण आवश्यक च.

- हे कुमारसंभव का कवि कालिदास श्री ! आप बार बार यो ही बताणो प्रयत्न करणा छंवां कि प्रवास्युं तै कर्म भूमि कि बिंडी चिंता करण चएंद अर मातृभूमि तै पृष्ठ भूमि मा रखण बि उचित नी च
- प्यारो अल्ल्ट ! द्याखो यू अपण अपण विचार भेद कि बात च

- महाकवि ! फिर तुमन अपण क्वी बि काव्य या नाटक मा कखि बि यू भेद बि नि द्याई कि तुम अलकनंदा छाल पर कविल्ठा गाँ क छ्या.

- प्रिय संस्कृत ग्यानी ! जब मनिख भौत इ ऊँचो पद पर चलि जांद त वैकुणि यू असम्भव ह्व़े जान्दो कि वो अपण जीवन तै कै स्थान से ज्वाड़ो . वो विश्व कुटुंब से इ जुड़न चांदो . समस्त विश्व इ वैको जन्म भूमि ह्व़े जांद
- महकवि ! अच्छा एक बात बथाओ क्या तुम तै नि लगद कि हिमाला तुमारि जन्म भूमि च . क्या तुम इथगा निष्टुर ह्व़े गेवां ?

- वत्स ! जिकुड़ी मा जन्म भूमि से दूर रौणौ घाव अवश्य छन अर वूं घाव भरणो बान मीन हरेक काव्य या नाटक मा हिमालय कु प्रकृति चित्रण अवश्य कार. हिमाला मेरी जिकुड़ी से कबि नि ग्याई अर मेरी त्रासदी या च कि मि चैक बि अब नि बथाई सकुदु कि म्यरो जन्म कविल्ठा मा होय . हाँ मीन इथगा अवश्य कार कि अपण गाँ तै हरेक महत्वपूर्ण काव्य या नाटक मा पूरो स्थान द्याई

यू आकाशवाणी च .अब आप हिंदी के महान कवि मंगलेश डबराल के साथ रमण कुमार सिंह की बातचीत सुनिए .
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ब्रेकिंग न्यूज ! ब्रेकिंग न्यूज ! महेंद्र सिंह धोनी के छक्के से भारत क्रिकेट का बादशाह बन गया है. भारत ने महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में विश्व कप पर कब्जा कर लिया है .

मेरि निंद झट्ट से खुली गे. हाँ ! मि अबि बि नि समजी सौक कि कालिदास कु इंटरव्यू क बीच मा मंगलेश डबराल अर महेंद्र सिंह धोनी किलै ऐन ?

Copyright@ Bhishma Kukreti 27/8/2012