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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, August 23, 2012

पाणि कु पैसा पाणिम

एक गढ़वाली ननि लोक कथा

                डॉ नरेन्द्र गौनियाल 

 एक गूजर दूधिया दूर जंगळ बिटि बड़ी-बड़ी ठेकी दूध कि ल्यांदु अर गौं का नजदीक बाजार मा दूध बेची रोज वापिस चलि जांदू छौ.वैकि रोज कि दिनचर्या यही छै.पैलि-पैलि त ऊ दूध ठीक-ठाक ल्याई पण हर्बी गड़बड़ शुरू करि दे. गूजरों कु दूध खूब गाढु हूंदू छौ.वैन कुछ दिन मा ही दूध मा पाणि मिलाणु शुरू करि दे.पैलि कम अर बाद मा ठीक दुगुणा.अधा दूध अर अधा पाणि..बाजार का नजदीक गौं वल़ा द्यब्ता कि केर का वजह से दूध नि ब्यच्दा छाया..ये वास्त गूजर दूधिया अपणि मनमर्जी करदु छौ..दुकानदार अर हौरि दूध लीण वल़ा कबी कुछ ब्वल्दा बि पण वैपर क्वी फरक नि पड़ी.

            एक दिन दूध बेचिकी ऊ एक गदेरा का किनर दिशा-फरागत चलिगे.वैन फिर नाणि-धूणि बि करणि छै.अपण लारा-लत्ता,दूधकि खाली ठेकी अर रुपयों कि कुटरी एक ढुंगा का किनर पर धैरी दे.रुपयों कि कुटरी वैन अपणा लारों का पुटग लुकै दे. एक यक्वा बंदर डालि का टुख मा बैठ्युं सब द्यखणु छौ.जनि दूधिया फुंड गै ऊ भुयां ऐगे.वैन रूप्यों कि कुटरी निकाळी अर ढुंगा मा बैठि गे.कुटरी खोली कै वैन एक सिक्का ढुंगा मा अर एक गदेरा का पाणि मा खैति दे.बस ऊ इनु करदु गे.एक ढुंगा मा अर एक पाणि मा.सरि कुटरी खाली कैरि दे.इतगा मा दूधिया वापिस ऐगे.बांदर वै देखिकी फिर डाळी मा चलि गे.दूधियान जब देखि त वैकि खोपड़ी चकरे गे.ढुंग मा बैठिकी कपाळ मा हाथ धरि ऊ बाकी बच्यां रूप्या गिणन लगीगे.कई महीनों कि कमै कुटरी पर धरीं छै..गिणी कि वै पता चलि कि ठीक अधा रूप्या बांदर पाणि मा बोगै गे.ऊ बात समझी गे कि दूध का पैसा मैंम ऐगीं अर पाणि का पैसा पाणि मा बोगी गीं...ई संतोष कैरिकी वैन ठेकी पकड़ी अर अपणा बाटा लगी गे. अब हैंका दिन बिटि वैन दूध मा पाणि धरणु बंद करि दे.      
                      
                    डॉ नरेन्द्र गौनियाल.. सर्वाधिकार सुरक्षित  narendragauniyal@gmail.com