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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, August 12, 2012

गढ़वाली कविता--त्यलथ्वपा

कैदिन
जब क्वी मन्खि  
हर्चि जांदू छौ 
अर 
ढूंढ -खोज का बाद बि 
कुछ पता 
नि चल्दु छौ
तब 
कुटुम्दरी का लोग 
त्यलथ्वपा    
 करदा छया
अनुमान 
लगान्दा छया
ज्यूंदु होलु कि ना
बौड़लु कि ना
आज 
मनख्यात हर्चिगे 
खोजि-खोजि कै बि
नि मिलदि    
सांचा मन्खि 
सदनि 
त्यलथ्वपा कर्दिन 
ईं फिकर मा कि 
मनख्यात 
ज्यूंदी च कि ना 
मनख्यात 
बौड़लि कि ना..

       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित ...narendragauniyal@gmail.com