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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, August 26, 2012

एक गढ़वाळी ननि कथा -***रैबार ****

 कथाकार-डॉ नरेन्द्र गौनियाल 

सानन्दी दीदी अपणा उर्ख्यळ मा बैठीं धान कुट्याणी छै.ब्यखुन्या कु टैम ,करीब ५ बजीं होलि.मि घुमदा-घुमदा ऊंका घार चलि गयुं.भौत दिनों बाद मि बि अपणा गौं मा गै छौ.बुढड़ी दीदी करीब चार बीसी से कुछ जादा उम्र कि होलि.धान कुट्याण मा पल्या ख्वाल़ा कि सन्ति दीदी मदद करणी छै.मिन दीदी तै सिवा लगे अर वींका ही समणी बैठि गयुं.पूछी कि ,''क्य हाल छन दीदी ?'' दीदीन बोलि ,''क्य हूण भूलू,ठीक छौं.'' 
         ऊंका नौना-ब्वारी अर नातीण सब दिल्ली मा छन.द्वी नातीणों कु ब्यो ह्वैगे.ऊ त कबी-कबी दादी का दगड़ गौं मा ऐ जांदा छाया,पण द्वी छवटी नतीण ऊ नि आंदा अर ना ही ऊंका ब्वे-बाब.बूडा दीदी तै नाती नि हूणा कु भारी दुःख दिल मा च.पण क्य कन.ना त वा ही दिल्ली जांदी अर ना ही लड़िक-ब्वारी गौं आंदा.बस यकुलो पराण..जनि-तनि दिन कटीणा छन.दीदी का जिकुड़ी मा एक सबसे बड़ो दुःख हौरि छा.वींकू छ्वटु नौनु अजीत अधकाळ मा ही दुन्य छोडि गे.दस साल पैलि सिर्फ २४ साला कि उम्र मा ही कैंसर से वैकि मौत ह्वैगे छै.तब बिटि दीदी कि जिंदगी मा क्वी हर्ष नि रैगे.बस जनु कि ढुंगु होलि..न दुःख न सुख, 
           मिन पूछी,''दीदी, भैजी-बौजि तेरि खबर-सार लींदा छन कि न?त्वे द्यखणो किलै नि आंदा ?तू ऊंका दगड़ ही दिल्ली किलै नि जांदी ?बुढापा मा यख यखुली किलै रैंदी ? क्वी रन्त-रैबार ?  सूणिकि दीदी कु हस भरिकै ऐगे.आंख्यु मा पाणि ऐगे.अन्सधरी फून्जिकी दीदीन बोलि,''मि त अब कखि नि जण्या.सरि जिंदगी ये झ्वपडा मा काटी यालि.अब कख जाण.? लड़िक-ब्वारी नि आंदा त मिन क्य कन..जब तक मि छौं,ईं कूड़ी तै जग्व्ल्दी रौंलू.वैका बाद म्यार तरफ बिटि ज्या बि  हूंद. मि चांदु कि म्यार म्वरण पर म्यारू लड़िक गति-मति कैरिकी ठीक-ठाक क्रिया कर्म कैरि द्या.मेरि आत्मा तै शान्ति मिलि जालि.बस मि बाकी कुछ नि चांदु. भूलू हौरि न क्वी रन्त न क्वी रैबार.'' 

                  डॉ नरेन्द्र गौनियाल ....सर्वाधिकार सुरक्षित. narendragauniyal @gmail.com