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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, August 26, 2012

*एक गढ़वाळी ननि लोक कथा.*--***खिरबोज बरोबर आमु***

 डॉ नरेन्द्र गौनियाल 

एकदा एक मन्खी अपणा गौं बिटि भौत दूर एक हैंका गौंमा ठुला बल्दों कि खोज मा गै.अषाढ़ का मैना  चड-चड़ो घाम मा हिटदा-हिटदा ऊ लपसे गे.रस्ता मा एक आमु कि डाळी छै.कुछ देर सुस्ताणा का बाना ऊ डाळी का छैल मा बैठि गे.आमु कि डाळी का समणी ही पुंगड़ी का ढीस खिरबोजा कि लगुली खूब फैलीं छै.लगुली पर खूब बड़ा-बड़ा खिरबोज लग्यां छाया.आमु कि डाळी पर बि खूब आमु का झुंटा लग्यां छाया.
           डाळी का छैल मूड़ बैठिकी ऊ स्वचा ण बैठिगे कि भगवान बि क्या च ?खिरबोजा का छवटा सा लगुला पर खूब बड़ा-बड़ा खिरबोज अर आमु कि इतगा बड़ी डाळी पर छ्वटा-छवटा आमु ? इनी स्वच्दा-स्वच्दा वैन डाळी का मूड़ झड्याँ पक्याँ द्वी-चार आमु टीपिकी ऊंतई चूसी अर अपणी भूख-तीस मिटे.आमु चुस्दा-चुस्दा वैन मन ही मन मा सोचि कि ''अहा ! खिरबोज बरोबर आमु हूंदा त कतगा मजा ऐ जांदू.''आमु चूसिकी ऊ डाळी पर अपणी पीठ लगैकी सुस्ताण बैठि गे.डाळी का छैल मा ठंडी-ठंडी हवा मा वै तै आनंद ऐगे अर थ्वड़ी देर मा ही ऊंघ ऐगे.
             अचणचक डाळी का टुख बिटि एक पक्यूं आमु झैड़ी की दडम वैका मुंड मा पड़ी..बरमंड मा जोर कि कटाग लगण से पैलि त ऊ अजक्ये गे.वैन सोचि कि यु क्य ह्वै.?कपाळी मा दम्म गुर्मुलू उपड़ी गे छौ.भुयां देखि त एक आमु कि बीं झडीं छै.वैन मुंड मा उप्ड़युं गुर्मुलू हाथन मलासी अर मन ही मन मा बोलि कि ,''हे भगवान !जुगराज रै.! तिन त भौत समझदारी करि.जु आमु का बियां बड़ा नि कारा.ये छ्वटो सि आमु का बियां से मेरि कपाळी फूटी गे छै.अर जु खिरबोज बरोबर आमु हूंदा त ,तब क्य हून्दो ?''इनि स्वच्दा-स्वच्दा मुंड मलस्दा-मलस्दा ऊ गौं का तरफ चलि गे.

                डॉ नरेद्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित..narendragauniyal@gmail.com