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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, July 7, 2013

इंटरनेट माध्यम गढ़वळि-कुमाउँनी भाषौ बान भौति फैदामंद माध्यम

 भीष्म कुकरेती (s = आधी अ, आधी अ//s= क, का , की,, कु के ,को आदि)

    भाषा सम्बर्धनम माध्यम  भाषा-साहित्य  तैं विकसित करदन या पैथर धकेल्दन।
जब सिर्फ मुखजवानी माध्यम छौ तो स्थानीय भाषा-साहित्य पर उथगा बड़ो दबाब नि रै होलु।
फिर पत्थरों पर लिखणो बिगरौ आयि त भारतम वै बगतौ अंतर्राष्ट्रीय अर  राष्ट्रीय भाषाओं मा ही प्रशस्तिपत्र लिखे ग्यायि अर अडगैं ( क्षेत्रीय ), स्थानीय भाषाओं पर पैल दै धक्का लग।
लाट/स्तम्भ/ ताम्र पत्र/शाशन पत्रों मा संस्कृत या पाली (जो शाशन भाषा छे) मा ही लिखे ग्यायि अर यांसे बि अडगैं ( क्षेत्रीय ), स्थानीय भाषाओं को ही अणभरवस होई या नुकसान ह्वे।
गढ़वाल-कुमाऊं  मा अधिकतर अभिलेखों अर शाशन लेखों की भाषा संस्कृत छे जब कि संस्कृत समजण वाळ एक प्रतिशत से बि कम छा। 
इनि मुग़ल काल मा उर्दू या फ़ारसी, अंग्रेजुं जमानो मा अंग्रेजी प्रादुर्भाव से स्थानीय  भाषओं की अवहेलना ही होइ।
स्वतंत्र भारतम राज्यों अपणी स्थानीय बड़ी भाषाओं छोड़ी द्यावो तो अंग्रेजी अर हिंदी न माध्यमो पर कब्जा कार अर स्थानीय भाषाओं जड़नाश माँ बडो योगदान दे। 
कुमाउनी अर गढ़वळि जन भाषाओं पर त शिक्षा माध्यम भाषाओं को फर्क बि पोड़।
अखबार अर किताब छपणो रिवाज से बि नुकसान स्थानीय भाषाओं को ही ह्वाइ।हां अखबार -किताब प्रकाशन से यू फैदा ह्वे कि लोक या शिष्ट साहित्य की रिकौर्डिंग ह्वे सक। पण किताब , पत्र -पत्रिकाओं की सबसे बड़ी दिक्कत छे वितरण की। आज भी कुमाउंनी -गढ़वळि जन भाषाओं की सबसे बड़ी दिक्कत/समस्या साहित्य वितरण की ही च। एक उदाहरण च बल  पाराशर गौड़न अपण  गढ़वाली काव्य संग्रह कनाडा मा छाप पण या किताब अबि तक देहरादून -गढ़वाळ नि पौंछ। इनि मुंबई का कुमाउनी -गढ़वळि अपण भाषा साहित्य पड़ण चाणा छन पण उपलब्धि समस्या हूण से भाषा प्रेमी अपण भाषा मा साहित्य नि बांचि सकदन। 
इनि ग्रामाफोन माध्यम से बि जादा फैदा राष्ट्रीय या अन्तराष्ट्रीय भाषाओं तै फलण -फुलणो मौक़ा जादा मील।
रेडिओ माध्यम से बि बडो फैदा बड़ी भाषाओं तैं मील पण जब सरकारी संरक्षण मील तो रेडिओ माध्यम से कुमाउंनी -गढ़वळि जन भाषाओं तैं खूब फैदा मील। किताब अखबारोंs  वितरण समस्या को निदान रेडिओ मा छौ। किंतु रेडिओ की भी समस्या छौ सीमित क्षेत्र मा उपलब्धता । गढ़वाल -कुमाउं अडगैं/ क्षेत्र मा नजीबाबाद रेडिओ उपलब्ध छौ पण प्रवास्युं खुण रेडिओ उपलब्ध नि छौ। 
फिल्म माध्यम एक बडो बढिया माध्यम च किंतु इखम  बि सिनेमा हाल अर वितरण समस्या ही गढ़वाली -कुमाउंनी भाषाओं वास्ता  निपार पाण्या समस्या च। 
टेलीविजन बडो ही सशक्त माध्यम साबित ह्वे पण यांको सबसे बडो फैदा अधिसंख्य वाचक भाषाओं तै जादा मील।
असल मा औडियो अर वीडिओ माध्यम ही गढ़वळि-कुमाउंनी भाषाओं बान एक संजीवनी बौणि आयि अर आज भी औडियो -वीडिओ माध्यम कुमाउंनी-गढ़वळि भाषाओं प्रचार , प्रसार, संरक्षणो बान सबसे बढिया माध्यम च। आज बि प्रचार , प्रसार, संरक्षणो मामला मा गढ़वळि-कुमाउंनी भाषाओं तैं जथगा फैदा औडियो -वीडिओ से हूणु च उथगा फैदा दुसर माध्यम से नी  हूणु च।
मोबाइल माध्यमन बि गढ़वळि-कुमाउंनी जन भाषाओं तैं फैदा दे।     

                           इंटरनेट माध्यम क्रान्ति बीज 
    
 इंटरनेट  संचार माध्यमो मा  सबसे बडो क्रांतिकारी अर असरदार माध्यम साबित ह्वे। इंटरनेट माध्यमन जाति, स्थान अर समय की सबि सीमा खतम करी देन। 
ठीक च ये माध्यम से बि फैदा जादा लोगुं मा प्रचलित भाषाओं तैं  बिंडी ह्वे किन्तु कम लोगुं भाषाओं बान यो माध्यम एक अमृत बणिक ही आयी।  
अमर माध्यम - भौत सा म्यरा साहित्यकार पूछ्दन बल मि इन्टरनेट की इथगा बड़ाई किलै करदो तो म्यार बुलण च बल इन्टरनेट माध्यम अमर माध्यम च अर गढ़वळि-कुमाउनी जन भाषाओं तै इनि माध्यम चयाणु छौ। आज कै बि साहित्यकारौ कथगा किताब छपदन?  पांच  सौ प्रति अर फिर कुछ समय बाद लोग बिसरी जांदन पण इंटरनेट माध्यम मा रचना हजारों साल तलक बि ज़िंदा रालि। वर्चुअल माध्यम से यो फायदा च।  

बंचनेर/ पाठकों तैं फैदा - पाठकों तै इंटरनेट से भौत फैदा च - माध्यम  चौबीस घंटा उपलब्ध /खुलु रौंद तो आप अपण समय पर बांची सकद़ा। अपण पसंद या   नापसंदी  से साहित्यौ चुनाव करी सकदवां। साहित्य अधिकतर  मा उपलब्ध च। पाठक  साहित्यकार से सीधा सम्बन्ध बणै  सकुद। पाठक बेहिचक साहित्यौ बाराम रे दे सकुद जो पारम्परिक माध्यमों मा सरल नी च। पाठक अपण रूचि का साहित्य को प्रचार -प्रसार घर बैठि अर बगैर खर्चो करी लींदो। 

प्रवास्युं माँ भाषा चेतना - इंटरनेट से प्रावास्युं मा गढ़वळि-कुमाउनी चेतना आयि। इंटरनेट से ही हमन सन उन्नीस सौ बतीस मा रिकॉर्ड हुंयाँ गढ़वळि-कुमाउंनी लोक कथा सुणिन। 

पुरण साहित्य अर कला को संरक्षण मा इंटरनेट से लाभ - पुरण साहित्य अर कला तैं प्रचार , प्रसार अर संरक्षण का वास्ता इंटरनेट बडो बढिया माध्यम च।

  साहित्य वितरण समस्या को निदान - सबि  प्रकारौ  कुमाउंनी-गढ़वळि साहित्यौ सबसे बड़ी समस्या छे साहित्य वितरण। आज इंटरनेट, भौत हद तलक गढ़वळि-कुमाउनी साहित्यौ वितरण समस्या को निदान करी याल। आज मेरा गढ़वाली लेखुं पाठक लन्दन, डेनमार्क, कम्बोडिया अर साइबेरिया मा बि छन। नेट पर आण से पैल मेरा ही गाँव का लोखार नि जाणदा छा कि मि लिख्वार छौं पण इंटरनेट की सहायता से आज मेरो ही ना हरेक गढ़वाली-कुमाउंनी साहित्यकार जू नेट से जुड्याँ छन वूंका पाठक दुनिया भर मा छन। इंटरनेट माध्यम से ही जगमोहन जयाड़ा, पाराशर गौड़,  बालकृष्ण ध्यानी, विजय गौड़, गीतेश नेगी, दुबई को विजय, प्रभात सेमवाल, धनेश कुठारी , अनूप रावत, राजेन्द्र फरियादी, दिनेश ध्यानी, डा . नरेंद्र  गौनियाल, विजय मधुर, सुनीता शर्मा आद्युं की अन्तराष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक पछ्याण पारम्परिक माध्यमों का साहित्यकारों से भौत अधिक च। गढ़वाल -देहरादूनम काव्य सम्मेलनों मा हरीश जुयाल की हास्य कवितौं बान, ऊनि हास्य कवितौं बान  जैपाल रावत, सौम्य गीतुं बान गिरीश सुन्द्रियाल या वीरेन्द्र पंवार अर गम्भीर पण दिल छुवो कवितौ बान मदन डुकलाण आदि की बड़ी मांग रौंदी पण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यूं कवियों तै लोग नि जाणदन। डा गौनियाल पारम्परिक माध्यम मा बि प्रसिद्ध कवि छन पण ज्वा प्रसिद्धि धनेश कुठारी अर नरेंद्र गौनियाल तै इंटरनेट माध्यम से मील उथगा पारम्परिक माध्यमो से नि मील। विजय गौड़। गीतेश नेगी या प्रभात सेमवाल जन कवि पैल इंटरनेट माध्यमो मा प्रसिद्द ह्वेन अर अब पारम्परिक माध्यमों मा लोग यूँ कवियों तैं पुछण बिसे गेन।  गीतेश नेगीन नेट माध्यम तै सही मने मा समझी आर फिर गढ़वाली तैं फैदा दे। गीतेश नेगीन नेट को अर पारम्परिक माध्यम का बीच बडो बढ़िया सामंजस्य बिठाइ। विजय गौड़ बि अब वो ही रस्ता पर चलणु च।  
गढ़वळि-कुमाउंनी लोक गीतों तैं सबि जगा पाठकों वास्ता उपलबद्धि  मा बि इंटरनेट कारगार संजीवनी साबित ह्वे। आज पाठक गीत डाऊनलोड करी सकदन। 

प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा खतम - पारम्परिक माध्यमों सबसे बड़ी खामी छे कि कवि या साहित्यकार तैं  कथगा सालों तलक पता हि नि चलद छौ कि पाठकों प्रतिक्रिया या राय क्या च। अब त साहित्यकार पता लगै दींद कि अमूनन पाठक की क्या प्रतिक्रिया च। अब तो साहित्यकार  तैं पता चौल जांद कि वैका  कै जगा पाठक छन अर कें जगा पाठक कम छन। हर रोज आप जाणि सकदां कि आपकी पाठकों संख्या कथगा तलक पौंछि गे। मि तैं अनुभव च कि यदि विषय कामौ च त वै विषय पर बढिया बहस बि शुरू ह्वे जांद। मेरा द्वी गढवाली लेख -'जनान्यु बाथरूम' अर 'गाऊं मा हनी मून हाउस' से  काम की बहस शुरू ह्वेन। फेस बुक मा कथगा ही कुमाउनी अर गढ़वळि कवितौं न बहस खड़ी करिन। नरेंद्र सिंह नेगी का गीत 'कथगा खैल' पर बि बहस ह्वे।  

पाठकों की रूचि  - साहित्यकार  पता लगै सकद की पाठक को विषय पसंद करदन । 

कुमाउनी - गढ़वळि तै पछ्याणक दीणों सर्वश्रेष्ठ माध्यम - भूतकाल मा गढ़वाली साहित्यौ पर  म्यार अंग्रेजी लेखों बारा मा डा बिहारी लाल जालंधरी अर डा राजेश्वर उनियाल सरीखा साहित्यकार प्रश्न करदा छा कि मि गढवाली साहित्यौ बात हिंदी मा किलै नि करदो (यूंक सही मानण च की हिंदी गढ़वाली -कुमाउंनी जन जादा सरलता से समझदन ). पण मीन खराब -सही जनि बि ह्वावो गढवाली का लोक अर आधुनिक साहित्य की बात अंग्रेजी मा ही कार। मेरो ध्येय छौ  कुमाउनी अर गढ़वळि की बात दुसर देसूं लोग बि जाणन अर वास्तव मा मीरा यूं लेखुं तैं गैर गढ़वाली , गैर कुमाउंनी भाषी पढ़ना छन। म्यार एक लेख ' उकताट: अ सटाइरिकल पोएम बाइ  हरीश  जुयाल'लेक सबसे जादा पढ़े गे।  इख तलक कि विदेशी बाशी पाठक हरीश जुयाल की कवितौं अंग्रेजी मा अनुवाद की मांग करणा छन। इनी 'खबर सार' का बारा मा लेख बि विदेशी भाषी पाठक पढना छन। अंग्रेजी मा गढ़वाली -कुमाउंनी  मन्त्र -तन्त्र अर गोरखनाथी सहित्यौ लेख बि गैर कुमाउंनी , गैर गढ़वळि पाठक पढ़णा छन अर भौत सा गैर कुमाउंनी , गैर गढ़वळि लोग त तांत्रिकों का पता बि पुछणा रौंदन अर अन्वेषणकर्ता बि इ मेल भिजणा रौंदन। याने कि इंटरनेट गढ़वळि-कुमाउंनी भाषा तैं पछ्याणक दीणो सर्वश्रेष्ट माध्यम च। धीरे धीरे कुमाऊं अर गढ़वाल को इतिहास पर बि गैर कुमाउंनी गैर गढ़वाली लोगुं नजर पोड़ल ही।  

इंटरनेट से गढ़वळि-कुमाउनी एक हैंकाक नजीक ऐन -उत्तराखंड आन्दोलन का बाद इंटरनेट ही इन माध्यम च जु गढ़वळि-कुमाउन्यूं तैं एक हैंकाक नजीक लाइ। मेरापहाड़ अर मीन जब सुमित्रा नन्द पन्त की कुमाउंनी कविता 'बुरांस' नेट पर प्रसारित कार तो गढ़वाली पाठकों बि प्रतिक्रिया कुमाउनी पाठकों से कम नि छे। इनि जब मीन 'रामी बौराणी' गीत बैन करणों लेख नेट पर छाप तो त्याइस मादे उन्नीस प्रतिक्रिया कुमाउंनी पाठकों की ही छे। याने कि इन्टरनेट माध्यम गढ़वळि-कुमाउन्यूं तैं जुड़णो बडो माध्यम च।
   
पारम्परिक पाठकों से जादा पाठक - इंटरनेट मा गढ़वळि-कुमाउनी साहित्यौ तैं पारम्परिक पाठकों बनिस्पत जादा पाठक मिलेन।   

                                  हैविंग  इंटरनेट अर नॉट हैविंग इंटरनेट की समस्या 
             मि गढ़वाळ मा बस्यां या शहरों मा बस्याँ साहित्यकारों से फोन पर प्रार्थना करणु ही रौंद कि भै अपण साहित्य तैं इंटरनेट मा प्रकाशित कारो तो वो लोग या तो इंटरनेट उपलब्द्ध नि होणो या नेट चलाण नि आण या अन्य बहाना खुजे खुजेक बथांदन। असल मा यि साहित्यकार कुछ कुछ अळगसि  किसमौ साहित्यकार छन। यी गांवक साहित्यकार कोटद्वार -देहरादून आदि शहरों मा आणा ही रौंदन तो अपण साहित्य तैं इख बिटेन बि नेट पर प्रकाशित करी सकदन।  भौत सा शहरों मा बस्याँ साहित्यकार बि अळगसौ शिकार छन अर इथगा बढ़िया माध्यम तैं अस्वीकार करणा छन। यो बि ठीक च बल पारम्परिक माध्यम की अपणी खासियत च अर अपणो महत्व च पण इन्टरनेट माध्यम तैं छुड़ण या इंटरनेट माध्यम की अवहेलना अकलमंदी काम नी च।  इनि मि खबर सार अर रंत रैबार का संपादकों से बी प्रार्थना करदो कि अब समौ ऐ गे कि यी पत्रिका इंटरनेट एडिसन बि प्रकाशित कारन।

                             कवि सम्मेलनों अर भाषा विचार विमर्श सभाओं वीडियोग्रैफी 

आज हर मैना गढ़वळि-कुमाउनी कवि सम्मेलन या भाषा चिंतन सम्मेलन हूणा रौंदन पण खौंळेणो/आश्चर्य बात च बल यी साहित्यकार या साहित्यपैरवीकार सम्मेलनों वीडियोग्रैफी या तो करदी नि छन या वीडिओ तैं इंटरनेट पर प्रकाशित नि करदन। कवि सम्मेलनों अर अन्य सम्मेलनों वीडिओ इंटरनेट पर प्रकाशित करण आज समय की मांग च।

                       अपण कविता की वीडिओग्रैफी या ऑडियो टेपिंग 


    मोबाइल से आज अपण कविता या  साहित्य पाठ सरल ह्वे ग्याइ  तो अब समय ऐ ग्यायि कि गढ़वळि-कुमाउनी साहित्यकार अफिक अपण कविता या  साहित्य पाठौ वीडिओग्रैफी  या ऑडियोग्रैफी क्रिक इंटरनेट मा प्रकशित कारन।

                    बेडू पाको साइट की पहल 

             अमेरिकी प्रवासी शैलेश उप्रेती को व्यक्तिगत प्रयास से आज कवि या साहित्यकार अपणो साहित्य तैं रेडिओ को जरिया सरा संसार मा प्रसारित करि सकद पण हम साहित्यकार यी सुविधा नि उठाणा छंवाँ। मोबाइल  से बि साहित्यकार बेडू पाको तक अपण  टेप कर्युं साहित्य भेजि सकद।  

या बात सै च कि धीरे धीरे इंटरनेट माध्यम बलवान माध्यम बणि  गे अर जब इंटरनेट संगति उपलब्द्ध ह्वे जालो तो इंटरनेट माध्यम को हौर बि बोलबाला ह्वे जालो तो कुमाउनी अर गढ़वळि साहित्यकारों फर्ज बणदो कि ये माध्यम से भाषा आन्दोलन तै लाभ पंहुचाये जावो।  

                  
     

Copyright @ Bhishma Kukreti  7/7/2013 

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